जमनोत्री-यात्रा के प्रारंभ में मुझे अपने पूर्वजन्म का ज्ञान मिला । इससे मेरी यात्रा सार्थक और चिरस्मरणीय हो गई । एसा कोई अनुभव न मिलने पर भी अपने प्राकृतिक सौंदर्य के कारण जमनोत्री की यात्रा हमेशा याद रहेती । जिसने भी जमनोत्री की यात्रा की है, वे सभी मेरी बात से पूरी तरह से सहमत होंगे । पैदल मार्ग की एक ओर भगवान कृष्ण की मधुर याद दिलाती हुई जमनाजी का प्रवाह चलता रहता है । रास्ते में कहीं-कहीं बर्फ पर भी चलना पडता है । तब जाकर अंत में जमनोत्री के दर्शन होते हैं ।
जमनोत्री में सख्त ठंड पडती है क्योंकि आसपास हिमालय की बर्फिली चोटियाँ है । यहाँ एक ओर धर्मशाला और जमुनाजी का मंदिर है तथा दूसरी ओर छोटी-सी गुफा है । जब हम वहाँ गये थे तब वहाँ एक तपस्वी महात्मा मिले थे । उन्होंने अपने शरीर पर केवल लंगोटी पहनी थी । कडाके की सर्दी में लंगोटी पहनकर रहेना आसान बात नहीं, इसके लिये दृढ संकल्पशक्ति चाहिए । महात्माजी की मुखाकृति अत्यंत तेजस्वी थी । उनको देखकर लगता था की वे एक उच्च कोटि के महात्मा है । उन्होंने मौनव्रत धारण किया था । उनके दर्शन करके हमे बड़ी प्रसन्नता हुई ।
गुफा के बिल्कुल पास जो पहाड की चोटी है, वहाँ से जमुनाजी का जन्म होता है । शुरु में यह प्रवाह अत्यंत अल्प दिखाई पडता है मगर जैसे-जैसे हम आगे बढ़ते है, प्रवाह चौडा होता है । मानो जमनोत्री में जमुनाजी का जन्म होता है, वहाँ से आगे चलते हुए बाल्यावस्था और फिर यौवनावस्था में प्रवेश होता है । मैदानी इलाकों में आने के बाद जमुनाजी का प्रवाह धीर-गंभीर, प्रौढ-सा हो जाता है फिर भी उसकी सुंदरता तथा मधुरता देखते-ही बनती है ।
नदी के तट पर चलते चलते उसके उदगम तक चले जाने में प्राचीनकाल के महापुरुषों को बडा आनन्द मिलता होगा । वे सरिता को परमात्मा की शक्ति का साकार स्वरूप समजते थे, इसलिये नदीओं का स्तवन-पूजन करते थे । नदी के उदगम-स्थान पर उन्होंने मंदिर बनाये तथा सरिता-तट पर कई तीर्थधामों का निर्माण किया । आज भी ये तीर्थधाम लाखों लोगों के आकर्षण का केन्द्र बने हुए हैं ।
जमनोत्री की भयानक ठंड और जमुनाजी के बर्फिले पानी में स्नान करने का साहस कौन करेगा ? यहाँ पानी इतना ठंडा है की हाथ पानी में रखते ही जूठे पड जाते हैं । मगर कुदरत का करिश्मा देखो । जमुनाजी के तट पर गर्म पानी के कुंड है । गात्रों को थीजानेवाली बर्फिली जगह में उबलते हुए पानी के कुंड अपने आप में एक अजूबा है ! ईश्वर की बनायी हुई इस अदभूत दुनिया में एसे अजुबों की कमी नहीं है । कुंड में स्नान करके यात्री अपनी थकान और ठंडी – दोनों को दूर भगाते हैं और चुस्त-फुर्तीले हो जाते हैं । एक कुंड में खाना पकाया जाता है । कपडे में चावल रखकर पानी में थोडी देर रखने से चावल पक जाते है । आलु भी इसी तरह पकाया जाता है । यात्री फिर उसे प्रसाद मानकर अपने घर ले जाते हैं । जमनोत्री का स्थान सचमुच अनोखा है ।
जमनोत्री से उत्तरकाशी के मार्ग में झहरीली मक्खी पायी जाती है, जिसके काटने से बहुत दर्द होता है और पैर सूजता है । लोग इससे बचने के लिये पैरों में मोजे पहनते है ।
जमनोत्री की यात्रा पूर्ण करके हम उत्तरकाशी आये । उत्तरकाशी आने पर मैंने अपना पूर्ण ध्यान साधना में केन्द्रित किया ।
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उत्तरकाशी में मेरी साधना अच्छी तरह से चल रही थी । मौसम खुशनुमा रहेता था । मैं जीवनमुक्त और धन्य दशा का अनुभव कर रहा था, इसलिये मेरा हृदय सदैव आनंदित रहता था । मनुष्य देह धारण करके जो हासिल करना था, वो मैंने कर लिया था । इसका मधुर एहसास मुझे नित्य निरंतर हो रहा था । मेरा तन, मन और अंतर सनातन शांति के समंदर में डूबा था । आत्मानुभव के कारण अंतर में जब आनंद के फव्वारे फुटने लगते तो मैं शंकराचार्य के सुप्रसिद्ध स्तोत्र 'चिदानंदरूप: शिवोङहम् शिवोङहम्' का गान करने लगता था । उत्तरकाशी के वो दिन मेरे जीवन में धन्यता के मधुर उत्सव समान थे ।

