किशोरावस्था से मेरा झुकाव ईश्वर की ओर था । दुन्यवी भोग-पदार्थो तथा विषयों में मुझे कोई दिलचस्पी नहीं थी । न जाने क्यूँ, मुझे उच्चोच्च आध्यात्मिक विकास करके समर्थ और सिद्ध संतपुरुष बनना था । मैं अक्सर ये सोचता रहता था की अपने पूर्वजन्म में शायद मैं संत या तपस्वी रहा हूँगा; शायद मेरी साधना अपूर्ण रही होगी । तभी जाके मुझे यह जन्म लेना पडा है । मेरे कर्मसंस्कार, मेरी अभिरुचि, मेरा जीवन देखकर किसीके मन में भी एसा खयाल आना वाजिब है । मगर मुझे खुद पता नहीं था की मैं अपने पूर्वजन्म में क्या था । अब पूर्वजन्म का ज्ञान मिला तो मेरी विचारधारा स्पष्ट हुई की मैं पूर्वजन्म में एक महान संतपुरुष था । मुझे यह भी ज्ञात हुआ की मैं कोई योगभ्रष्ट पुरुष नहीं हूँ और ना ही मैं पूर्वजन्म की किसी अपूर्ण साधना को पूर्ण करने के लिये अवतरित हुआ हूँ । मैं पूर्वजन्म में ही मुक्त और सिद्ध महापुरुष था । पूर्वजन्म में ही साधना के फलस्वरूप मैंने परमात्मा की प्राप्ति की थी, आत्मिक शांति, संसिद्धि और पूर्णता के शिखर सर किये थे । इतना ही नहीं, मैंने स्वयं प्रकाश की प्राप्ति करने के बाद बहुत सारे लोगों को प्रकाश का मार्ग दिखाया था । इसलिये मेरे मन में जो बात चल रही थी की मैं इस धरती पर किसी बंधन से मुक्त होने के लिये आया हूँ या अपूर्णता से पूर्णता की ओर जाने के लिये आया हूँ, अब शांत हो गई ।
आप कहेंगे, जब आपको पता है की आप पूर्वजन्म में कौन थे, तो फिर हमें बताते क्यूँ नहीं हैं ? एसा करने में आपको क्या तकलिफ है ? आपको तो सिर्फ अपना अनुभव-ज्ञान बाँटना है, फिर इतराते क्यूँ हो ? आपका पूर्वजन्म जानकर हमें भी खुशी होगी ।
मेरे प्यारे जिज्ञासु स्नेहीजनों को मैं यह बताना चाहता हूँ की पूर्वजन्म के बारे में जानकर आपको खुशी होना स्वाभाविक है मगर केवल आपकी खुशी के लिये मैं एसा करना मुनासिब नहीं समजता । कुछ ओर मुद्दें भी है जिसके बारे में मुझे सोचना चाहिए । सबसे पहले, पूर्वजन्म का ज्ञान मेरे व्यक्तिगत लाभ के लिये मिला है । मेरी जिज्ञासा को शान्त करने के लिये तथा साधनापथ पर प्रेरणा और प्रोत्साहन देने के लिये ईश्वर ने कृपा करके मुझे यह ज्ञान दिया है । इससे अगर किसी अन्य व्यक्ति को लाभ पहूँचता है तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है । मगर मुझे नहीं लगता की इसके लिये यह उचित वक्त है । इससे विवाद उठने का पूरा संभव है । मेरा पूर्वजन्म एक सुप्रसिद्ध महापुरुष का था, लोग इन्हें अवतारी महापुरुष मानते थे और आज भी उसे पूजते हैं । भारत में ही नहीं, विदेशों में उनके अनगिनत प्रसंशक भक्त है । मेरा यह कहना की, मैं पूर्वजन्म में वो महापुरुष था, उनकी भावनाओं को ठेस पहूँचा सकता है । संभव है, कुछ लोग मेरी बात न मानें और इससे बेवजह विवाद हो । इसका मतलब ये कतै नहीं है की मैं लोकोपवाद से डरता हूँ । मगर ईश्वर मुझे अभी प्रेरित कर रहा है की इस ज्ञान को मैं अपने तक ही सिमीत रखूँ । अन्य लोग मेरे व्यक्तिगत आध्यात्मिक अनुभव को माने या न माने इससे मुझे कोई फर्क नहीं पडता लेकिन इसे वक्त से पहले बताना उचित नहीं है । विवेकी पुरुष मेरे ये रवैये से भलीभाँति संमत होगे एसा मेरा मानना है ।
अगर ईश्वरनी ईच्छा रही और वक्त सुयोग्य रहा तो मैं इसे अवश्य प्रकट करूँगा । फिलहाल तो मैं उसे अपने पास रखने में ही समझदारी है । मेरे ये कहने से की मान लो, मैं पूर्वजन्म में ईसा मसीह था, शंकराचार्य था या अन्य कोई महापुरुष था तो लोग इसे स्वीकार थोडा करेंगे, इसे शक की नजरों से ही देखेंगे । लोग जो भी समझे, उन्हें समझने दो । वे मुझे साधारण आदमी समझे या अवतारी महापुरुष, मुझे क्या फर्क पडता है । वैसे भी, पूर्वजन्म के बारे में लोगों को बताकर मुझे कुछ हासिल नहीं करना है । मुझे ना तो कोई नाम कमाना है, ना ही किसी लाभ की अपेक्षा है । मेरे लिये मेरा वर्तमान जीवन ही सबकुछ है । मैं पूर्वजन्म में कौन था इसका महत्व मेरे लिये इतना नहीं है जितना मैं वर्तमान जीवन में कैसा हूँ और किस भूमिका पर हूँ । पूर्वजन्म के बारे में लोगों को बताकर मैं अपने वर्तमान जीवन से उन्हें गुमराह नहीं करना चाहता । और यही कारण है की मैं अब भी वर्तमान जीवन को उपर उठाने में, साधनापथ पर प्रगति करने में लगा हूँ ।
आप ये कहेंगे की अगर मैं पूर्वजन्म में मुक्त पुरुष था तो फिर इस जन्म में मुझे साधना क्यूँ करनी पड रही है ? कर्म के साधारण नियम के मुताबिक मैं जन्म से ही मुक्त तथा पूर्ण होना चाहिए, एसा क्यूँ नहीं है ? इसके प्रत्युत्तर में मैं कहना चाहूँगा की यह सब ईश्वर के हाथ में है । सभी मुक्त या अवतारी पुरुष जन्म से मुक्त हो ये जरूरी नहीं है । वैसे तो भगवान बुद्ध को ईश्वर का अवतार कहा जाता है मगर उनको तीव्र तपस्या के बाद ही बोधिज्ञान मिला था । ईसा मसीह, चैतन्य महाप्रभु, समर्थ रामदास या तुलसीदास, जिसे लोग वाल्मिक का अवतार मानते हैं, सबको साधना का आधार लेना पडा था । हाँ, शंकराचार्य, शुकदेव या ज्ञानेश्वर जैसे महापुरुष बचपन से ही मुक्तावस्था का अनुभव करते थे ।
अवतारी महापुरुष दो हेतु से शरीरधारण करते हैं: एक, व्यक्तिगत साधना से औरों का मार्गदर्शन करने तथा दूसरा, आध्यात्मिक पुनरुत्थान के लिये । जब आध्यात्मिक पुनरुत्थान के हेतु से अवतारी पुरुष जन्म लेतें हैं, तब शंकराचार्य और ज्ञानेश्वर जैसे महापुरुष अवतरित होते हैं । जब दोनों हेतु की पूर्ति करनी होती है तब ईसा मसीह, बुद्ध, तुलसीदास या चैतन्य महाप्रभु के जैसे महापुरुष जन्म लेते हैं । जन्म से ही वे अगर मुक्त होते तो लोगों को साधना में विश्वास कैसे होता ? लोग तो यही मानते की महापुरुष जन्म से ही मुक्त होते हैं, हम चाहे लाख कोशिश क्यूँ न कर लें, उनके जैसे कभी नहीं बन सकते । महापुरुषों के जीवन से आम लोगों को साधना की प्रेरणा मिलती है । हाँ, ये सही है की सिद्ध महापुरुष संसार के विषयों में नहीं फँसते और अपना जीवनध्येय हासिल कर लेते हैं ।
मेरे कहेना का तात्पर्य है की मैं पूर्वजन्म बेशक मुक्त-पुरुष था, मगर इस जन्म में मुझे साधना करनी पडी है । मैं ईश्वर का साधारण बालक हूँ । वो जिस तरह मुझे बनाना चाहे, बना सकता है । मैं गुजरात में क्यूँ पैदा हुआ, पूर्वजन्म की भाँति भारत के अन्य क्षेत्र में क्यूँ पैदा नही हुआ, ये सिर्फ ईश्वर ही जानता है । हिमालय में जाकर साधना करना पूर्वजन्म में नहीं था, साहित्य और लेखन की रुचि भी पूर्वजन्म में नहीं थी । बाह्य रूप से देखा जाय तो दोनों जीवन में काफि अंतर है ।
पूर्वजन्म का ज्ञान मिलने पर मुझे कई प्रश्नों के उत्तर मिल गये । जैसे की, बचपन से ही मुझे आध्यात्मिक अभिरुचि क्यों थी, आम लोगों की तरह भोगपदार्थो में मेरा मन क्यूँ नहीं था, वगैरह । विशेषतः, पूर्वजन्म जानकर मेरी आत्मश्रध्धा बुलंद हुई । मुझे यकिन हो गया की मैं अपने पूर्वजन्म की तरह वर्तमान जन्म में भी सिद्ध और समर्थ संत बन सकता हूँ । मैंने प्रभु से प्रार्थना की ताकि मैं वर्तमान जीवन में सिद्धि के शिखर सर कर सकूँ ।
जन्मांतरों की बात निकली है तो मेरे मन में एक खयाल आ रहा है । मैं पूर्वजन्म में मुक्त महापुरुष था, परमात्मा का प्रतिनिधि था । वर्तमान शरीर धारण करके मैंने ईश्वर का फिर एक बार प्रतिनिधित्व किया है । मानो प्रकाश की एक किरण वो (पूर्वजन्म) थी और एसी ही एक किरण ये (वर्तमान जीवन) है । एसा सोचने पर दोनों जन्मों के बीच दिखाई देनेवाली बाह्य भिन्नता पर पर्दा लगेगा और आंतरिक अभिन्नता उभरकर सामने आयेगी ।
वेदव्यास ईश्वर के अवतार माने जाते हैं । अब मान लो की किसीको एसा ज्ञान होता है की वो पूर्वजन्म में वेदव्यास था, तो इसे दो तरह से समज सकते हैं । एक, वर्तमान शरीर वेदव्यास के पूर्वजन्म की प्रतिकृति है । दूसरा, वेदव्यास ईश्वर के अवतार थे इसी तरह वर्तमान शरीर भी ईश्वर का अवतार है । एसा सोचने पर विशेष प्रकाश वेदव्यास पर नहीं मगर उनके द्वारा व्यक्त होनेवाले तत्व – ईश्वर पर जाता है । मेरे बारे में भी एसा सोचने पर आपको समजने में सरलता होगी । अपने पूर्वजन्म की तरह वर्तमान जन्म में भी मैं ईश्वर का एक साधारण बालक हूँ, सूर्य का एक ओर किरण । ईश्वर अपनी इच्छा से एसे कई किरण प्रकट करने की क्षमता रखता है । एसा मानने से मन में उठे विभिन्न प्रश्नों का समाधान होगा । वैसे भी देखा जाय तो समस्त संसार ईश्वर के प्रकाश का पूँज ही तो है ?
अब मैंने अपने आपको ईश्वर के किरण के रूप में बताया, इसका अर्थ ये नहीं है की मैं ईश्वर का अवतार हूँ । मैंने जो विचार प्रस्तुत किये वो ज्ञान की दृष्टि से समजने में सरल है इसलिये बताये हैं, यह स्पष्टता करना जरूरी है ।

