देवकीबाई धर्मशाला का त्याग करके मैं चंपकभाई के साथ देवप्रयाग गया था । तब से लेकर आज तक मैं ज्यादातर साधनारत रहा था । माताजी को खत लिखने का काम चंपकभाई ही करते थे । जब मैं देहरादून में चंपकभाई से मिला तब उन्होंने मेरे साथ बदरी-केदार तथा गंगोत्री-जमनोत्री की यात्रा करने की इच्छा प्रकट की थी । लेकिन मैं यात्रा के लिये अन्य साधुओं के साथ निकल पडा । यात्रा करने की ईच्छा से चंपकभाई ने दहेरादून छोडने का निश्चय किया । उन्होंने मेरी माताजी को खत लिखकर दहेरादून बुलाया । दिल्ली से दहेरादून कैसे आना और दहेरादून आकर कैसे मिलना यह सब उन्होंने माताजी को खत में लिखा था ।
कहाँ गुजरात का एक छोटा-सा गाँव सरोडा और कहाँ हिमालय की गोदी में बसा दहेरादून ? सरोडा की कुटिया में बैठकर जब माताजी ने चंपकभाई का खत पढ़ा तो उनको समज नहीं आया की कैसे हिमालय जायें ? यात्रा की बात तो दूर, उनके लिये तो दहेरादून पहूँचना भी एक प्रश्न था । कौन उन्हें वहाँ तक छोडने का कष्ट करेगा ? गाँव के लोग कहने लगे, हिमालय जाने की क्या जरूरत है ? बदरीनाथ की यात्रा तो अत्यंत कष्टप्रद है । वहाँ जाकर बहुत कम लोग सकुशल वापिस आते हैं । महात्माजी (अर्थात् मैं) वहाँ गये हैं यह तो ठीक है, तुम्हें जाने की क्या जरूरत है ? आपकी तबियत ठीक नहीं है, अगर वहाँ जाकर बिमार हो जाओगी तो मुसिबत हो जायेगी । आपकी देखभाल कौन करेगा ?
लोगों की बातें सुनकर माताजी दुविधा में पड गये । उस वक्त उनकी तबियत अच्छी नहीं चल रही थी । उनकी आशाएँ मुझ पर थी मगर मैंने हिमालय का रास्ता चुना इसलिये उनकी समस्या अत्यंत विकट हो गई थी । ये कुछ महिने या साल बीताने की बात नहीं थी, उन्हें तो एसे हालात में सारी जिन्दगी बीतानी थी । चिंता उनको खाये जा रही थी मगर वो समजदार थी । धीरज धरने के अलावा वो भला क्या कर सकती थी । जब भी वो कथा-कीर्तन में जाती तो भजन सुनकर भावविभोर हो जाती और कभीकभा होश खो देती थी । कथा में आनेवाली ध्रुव या प्रहलाद जैसे भक्त-तपस्वीओं की बातें उन्हें मेरी याद दिलाती थी । गाँव के लोग उनकी यह अवस्था समज नहीं पाते थे । वे कहते थे की माताजी पर भूतप्रेत का साया है । कई लोग उन्हें दोराधागा करने की तथा वैद्य-भूवे के पास जानेकी सलाह देते थे । माताजी उन्हें प्यार से समजाते थे की एसा कुछ नहीं है, फिर भी गाँव के लोग उन्हें समजाते रहते थे ।
गाँव में एसे हालात थे । अब इन हालात में हिमालय जाने के लिये कौन उन्हें हाँ कहेगा ? फिर भी उन्होंने यात्रा के लिये तैयारी की क्योंकि उनके दिल में मुझसे मिलने की तीव्र इच्छा थी । चंपकभाई ने उन्हें आमंत्रण दिया तो वे झट-से आने के लिये तैयार हो गई । मगर हिमालय कैसे जाया जाय ?
लोगों की बातें अनसुनी करके वो अहमदाबाद आई । शादी के बाद मेरी छोटी बहन, ताराबहन अहमदाबाद रहेती थी । वहाँ जाकर माताजी ने अपने दिल की बात बताई । ताराबहन ने माताजी का हौसला बढाया और हिमालय के लिये तैयार किया । ताराबहन भले उम्र में भले मुझसे छोटी थी मगर काफि समजदार थी । उनके प्रोत्साहन से प्रसन्न होकर माताजी बडौदा आई । रमणभाई ने माताजी को समजाने की कोशिश की मगर उनका दृढ निर्णय देखकर उन्होंने अपने पुत्र मनुभाई को दहेरादून तक छोडने के लिये राजी किया । मनुभाई उम्र में छोटे थे मगर चतुर और समजदार थे । उनके साथ प्रवास करने में माताजी को कोई आपत्ति नहीं थी ।
ईश्वरेच्छा से माताजी और मनुभाई दहेरादुन आये । वहाँ से चंपकभाई उन्हें मसूरी घूमाने ले गये । वहाँ मसूरी के सुविख्यात जलधोध के बर्फिले पानी में माताजी ने स्नान किया । ये देखकर चंपकभाई ने माताजी को कहा: 'अब आप हिमालय की यात्रा के लिये तैयार है । ठंडे पानी में स्नान करने से आपकी हिंमत की कसौटी हो गई ।'
मनुभाई मसूरी से बडौदा के लिये वापिस लौटे । चंपकभाई माताजी के साथ यात्रा के लिये चल पडे । उनके साथ सामान उठाने के लिये एक मजदूर भी था । मैंने चंपकभाई को जमनोत्री होकर उत्तरकाशी आने के लिये कहा था, इसके मुताबिक वे जमनोत्री की कष्टमय यात्रा समाप्त करके माताजी साथे उत्तरकाशी आ पहूँचे । चंपकभाई की सेवा और प्रेम असाधारण था ।
चंपकभाई और माताजी उत्तरकाशी में प्रवेश-ही कर रहे थे की मैंने उनको दूर से देख लिया । उस वक्त मैं क्षेत्र से भिक्षा लेकर गंगाजी की ओर जा रहा था । भिक्षा को गंगा के किनारे रखकर मैं उनको मिलने गया । मैंने माताजी के चरणों को छूआ तो उनकी आँखो से प्रेमाश्रु बहने लगे । चंपकभाई कुछ ही वक्त पहेले मुझ को मिले थे मगर माताजी तकरीबन देढ साल के बाद मुझे मिल रही थी । मेरी तबियत ठीक थी मगर मेरे बाह्य रुपरंग में काफि बदलाव आया था । ऋषिकेश धर्मशाला में आने के बाद मैंने तैयार कपडे पहनने बन्द किये थे । दाढी के बाल बढे हुए थे । मेरा बाह्य परिवेश तपस्वी या साधु जैसा लगता था ।
भिक्षा पूर्ण करके मैं उनको मिलने बिरला धर्मशाला गया, जहाँ वे ठहरे थे । योगानुयोग उसी धर्मशाला में नारायण स्वामी ठहरे हुए थे । वे सिर्फ लंगोटी पहनते थे और मौनव्रत रखते थे । गीताप्रेस, गोरखपुर की ओर से उनकी एक किताब 'एक संत का अनुभव' प्रसिद्ध हुई थी । मैंने वो किताब पढी थी इसलिये मुझे उनके प्रति स्नेह हुआ । वे उच्चकोटि के अनुभवी संतपुरुष थे । उन्होंने नर्मदातट स्थित करनाली के पास हनुमंतेश्वर में बरसों तक साधना की थी । माताजी और चंपकभाई को उन्होंने प्रसाद दिया । फिर माताजी मेरी कुटिया में आई । वहाँ आकर उन्होंने ताराबेन और रमणभाई को खत लिखा ।
चंपकभाई के प्रेमाग्रह से वश होकर मैंने उन्हें यात्रा में साथ चलने की संमति दी । अगले दिन हम गंगोत्री के लिये रवाना हुए । उत्तरकाशी से देढ मील की दूरी पर मंगलस्वरूप नामक गुजराती ब्रह्मचारी रहते थे । वे फलाहारी थे । उनकी कुटिया पर कुछ देर तक विश्राम करने के बाद हम गंगोत्री के लिये चल पडे ।

