जमनोत्री का यात्रामार्ग अत्यंत विकट है । रास्ता काफि चढाई और उतराईओं से भरा है । मार्ग में धर्मशाला आती है मगर आठ-नौ मिल की दूरी तय करने के बाद । मार्ग की चारों ओर कुदरती सौंदर्य भरा पडा है । उँची-उँची पहाडियों से लिपट कर निकलने वाला पैदलमार्ग प्राकृतिक सौंदर्य से हमारे शरीर की थकान दूर करता है, और मन को प्रफुल्लित करता है ।
उत्तरकाशी से जमनोत्री के रास्ते पर, जहाँ जमुनाजी का प्रथम दर्शन होता है, एक धर्मशाला है । हम वहाँ ठहरे थे । चांदनी के कारण रात की शोभा देखते ही बनती थी । आसमान में चंद्र की चाँदनी, बगल में नदी का प्रवाह, चारों ओर बर्फिले पहाड और दूर तक फैली हरियाली के बीच अगर किसी संतपुरुष का संग मिल जाय तो क्या कहेना – मानो धरती पर स्वर्ग उतर आये । एसे-ही स्वर्गसुख में स्नान करके हम अपने कमरे में आराम करने के लिये गये ।
जमनोत्री की वह धर्मशाला और वह रात मुझे हमेशा याद रहेगी । जैसे आसमान में चंद्र का उदय हुआ था, बिल्कुल वैसे ही मेरे साधनात्मक जीवन में पूर्वजन्म के ज्ञान का उदय हुआ । कमरे में कुछ देर तक विश्राम करने के बाद मैं ध्यान में बैठा । कुछ ही क्षणों में मेरा देहभान चला गया । देहातीत अवस्था में मैंने देखा की मैं किसी अन्य लोक में हूँ । एसी जगह मैंने अपने जीवन में पहले कहीं देखी नहीं थी । क्या वो ब्रह्मलोक था या सिद्ध महापुरुषों का निवासस्थान कहा जानेवाला सिद्धलोक था ? क्या वो तपस्वीओं का भ्रमणस्थान था या सुप्रसिद्ध और बहुचर्चित सत्यलोक था ? या फिर पृथ्वी का ही कोई अनजान स्थान था ? जो भी हो, मैंने अपने आप को वहाँ पाया । नजर के सामने एक सुविशाल और सुशोभित सभागृह था । सभागृह में विभिन्न रूपरंगवाले करीब सो महात्मा पुरुष बैठे हुए थे । किसीने भगवा वस्त्र धारण किये थे तो किसीने श्वेत; किसीने केवल कौपीन पहना था तो कोई झब्बाधारी था; किसीका वर्ण गौर था तो किसीका श्याम; कोई जटा तथा दाढीधारी था तो कोई बिल्कुल साफ । सब महापुरुष अपने-अपने स्थान पर शांतिपूर्वक बैठे थे । मगर जैसे ही मैं वहाँ पहूँचा, सब खडे होकर एकसाथ बोल उठे: 'आईये ... , आप ... है ।' उन्होंने मेरा सत्कार करके इस तरह मेरे दो पूर्वजन्मों का रहस्योद्घाटन किया । मेरे आसपास जो महात्मापुरुष थे, वे मुझे धीरेधीरे सभा की मध्य में स्थित व्यासपीठ पर ले गये । उन्होंने मेरे उपर पुष्पवृष्टि की । यह अनुभव कुछ देर तक चलता रहा । ध्यान की लयदशा से जब मैं जागृत हुआ तो मैंने अपने आप को धर्मशाला में पाया । यमुनाजी का कलकल नाद रात की नीरव शांति में स्पष्टरूप से सुनाई दे रहा था । सुबह होने में अभी देर थी । ध्यानावस्था के इस अनुभव को याद करते-करते सुबह हुई । सुबह जब हम जमनोत्री के लिये निकले तो मेरा हृदय अवर्णनीय शांति से भरा था । ईश्वर की परमकृपा से पूर्वजन्म का ज्ञान पानेकी मेरी ईच्छा पूर्ण हुई ।
ईश्वर की कृपा से क्या नहीं होता ? मेरे जैसे साधारण बालक की बात उसने सुन ली तो जो साधनारत है, ज्ञानी है, तपस्वी है, सही मायने में कृपा के अधिकारी है, उनकी क्यों नहीं सुनेगा ? उन पर प्रभु की पूर्ण कृपा अवश्य होगी । अधिकार और बलहीन साधक अगर श्रद्धा और प्रेम से ईश्वर का शरण लें तो उसका दु:खदारिद्रय मिटेगा, उसका जीवन उज्जवल और धन्य होगा । फिर जन्मांतर का ज्ञान तो क्या, वो स्वयं ईश्वर का दर्शन कर पायेगा । मगर अफसोस, लोगों ने अपने आप में और प्रभु की करुणा में विश्वास खो दीया है ।
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पूर्वजन्म के ज्ञान का प्रथम अनुभव मिलने के कुछ ही दिनों में मैं सुप्रसिद्ध यात्राधाम गंगोत्री गया । वहाँ भी मुझे एसा अनुभव मिला । मेरे दो पूर्वजन्मों के बारे में मुझे ज्ञान मिला । आश्चर्य की बात है की जो महापुरुष का जीवनचरित्र पढते हुए मुझे अंतःप्रेरणा हुई थी की यह मेरी जीवनकथा है, यह बात सच निकली । आज, जब मैं यह लिख रहा हूँ तब, उस अनुभव को हुए कई साल बीत गये है । आज तक, मुझे पूर्वजन्म का ज्ञान कई दफा मिल चुका है । पिछले दस साल में भिन्न-भिन्न अवस्था में, विभिन्न महापुरुषों द्वारा तकरीबन पचास से भी ज्यादा बार मुझे यह ज्ञान मिला है । ई.स. १९४४, १९४५ और १९४६ के तीन सालों में मुझे एसे कई अनुभव हुए । उसमें से एक प्रसंग के बारे में यहाँ बताना मैं मुनासिब समजता हूँ ।
पूर्वजन्म-ज्ञान के ज्यादातर अनुभव मुझे ध्यानावस्था में हुए मगर ई.स. १९४६ में प्रथम बार, एक जीवित महापुरुष के द्वारा मुझे यह ज्ञान मिला । ई.स. १९४६ में, जब मैं दूसरी दफा बदरीनाथ गया तब मेरे साथ कुलानंद नामक महात्मा पुरुष थे । वे देवप्रयाग में लंबे अरसे तक रहे थे, और तब मेरी उनसे जानपहचान हुई थी । वे अनुभव-सिद्ध महात्मापुरुष थे । बदरीनाथ जाते हुए हम दो दिन के लिये श्रीनगर रुके थे । वहाँ पर हमारे बीच वार्तालाप हुआ ।
उन्होंने कहा: 'काशी में सच्चे बाबा नामक सिद्ध महात्मा हो गये । वे मेरे गुरु हैं । वो तो अब नहीं रहे मगर उनकी समाधि के बाद मुझे लगता हैं की उनकी शक्ति मेरे अंदर कार्यरत हुई हैं ।' फिर उन्होंने कहा: 'मुझे कई सिद्ध और अवतारी महापुरुषों से मिलने का सौभाग्य मिला हैं । उन महापुरुषों की वजह से मुझे लगता है की भारत का भविष्य उज्जवल और सुरक्षित हैं ।'
मैंने अपने साधनात्मक अनुभवों के बारे उन्हें बताया । ये भी कहा की मुझे अपने पूर्वजन्म का ज्ञान हुआ है ।
मेरे आश्चर्य के बीच उन्होंने कहा: 'मेरा हृदय कहता है की आप पूर्वजन्म में .... थे ।'
उनकी बात सुनकर मैं दंग रह गया । मैं सोचने लगा की मेरे पूर्वजन्म के बारे में उनको कैसे पता चला ! आश्चर्य तो इस बात का था की उनकी बात मेरे अनुभव से मिलती थी । साधना के कारण उनमें कुछ विशेष शक्तिओं का प्रादुर्भाव हुआ था । मैंने अपने पूर्वजन्म की बात अन्य किसीसे न करने की उनसे बिनती की । मेरी बात का उन्होंने सहर्ष स्वीकार किया । किसी व्यक्ति के द्वारा प्रत्यक्ष ज्ञान का यह विशेष प्रसंग था । ध्यानावस्था में मुझे हुए अन्य अनुभवों के बारे में मैंने आगे जीक्र कर दिया है ।
किसी भी बात को जाँच-परखकर स्वीकार करने का मेरा स्वभाव रहा है । साधनापथ पर हुए अनुभवों को भी मैंने स्वीकार करने से पहले तर्क के तराजू में तोला है, और एसा एक दफा नहीं, बार-बार किया है । स्वयं विवेचक बनकर साधनात्मक अनुभूतिओं का तर्कबद्ध और वैज्ञानिक विश्लेषण करने से मुझे बहुत लाभ हुआ है । एसा करने से मेरी श्रद्धा अत्यंत दृढ हुई हैं । मेरे पूर्वजन्म के अनुभवों के बारे में भी मैं यह कह सकता हूँ ।

