ऋषिकेश में एक दिन जब मैं शाम को गंगातट पर घुमने निकला तो मेरी मुलाकात एक सदगृहस्थ से हुई । उन्होंने कहा: 'मेरा विचार उत्तरकाशी या देवप्रयाग जाकर किसी संत-महात्मा के दर्शन करनेका है । मैं हिमालय इसी लिये आया हूँ । मैंने सुना है की वहाँ बहुत सारे सिद्धपुरुष निवास करते हैं ।'
मैंने कहा: 'देवप्रयाग में कोई महात्मापुरुष होने की मुझे खबर नहीं है । हाँ, उत्तरकाशी में आपको संत-महात्मा के दर्शन का लाभ मिल सकता है । आजकल वक्त कैसा है यह तो आपको मालूम है । एसे हालात में शुद्ध, संयमी और प्रभुपरायण जीवन व्यतीत करनेवाले बहुत कम लोग बचे हैं । हिमालय-क्षेत्र में अभ्यासु तथा विद्वान संतपुरुष दिखाई पडतें हैं, मगर अनुभव-संपन्न तपस्वी महापुरुषों की कमी हैं । वे अगर हैं भी तो उनको पहेचान पाना मुश्किल है । आपकी ईच्छा है तो आप उत्तरकाशी जा सकते हैं । बारिश की मौसम है, इस वक्त वहाँ कुदरती सौंदर्य भरपूर होगा ।'
मेरे कहने पर वे उत्तरकाशी गये या नहीं ये मुझे नहीं पता । मगर संतपुरुषों की बात से उत्तरकाशी में मुझे जो संत-महात्मा मिले थे उनकी याद ताजा हो गई । मैंने उत्तरकाशी के बारे में जो कुछ भी कहा उसके पीछे मेरे अनुभव कारणभूत है । जब मैं उत्तरकाशी गया था तब मैंने सुना था की वहाँ उच्च-श्रेणी के कई विरक्त और तपस्वी महात्मा-पुरुष निवास करते हैं । मगर वहाँ जाने के बाद मुझे पता चला की यह बात कुछ हद तक अतिशयोक्ति से भरी थी । उत्तरकाशी या गंगोत्री में निवास करने से कोई तपस्वी या विरक्त नहीं हो जाता, केवल कौपीन और कंथा धारण करने से या भिक्षा पर निर्वाह करने से कोई जीवनमुक्त नहीं हो जाता । विरक्ती या जीवनमुक्ति के लिये मन परमात्मा में सदैव डूबा रहेना चाहिए । बाह्य रूप से आदमी चाहे कैसा भी हो, उसका मन संसार के विषयों में नहीं, परंतु परमात्मा में लगा रहेना चाहिए । किसी भी व्यक्ति के विचार और वृत्ति को पहचाने बिना, वो अहंता, ममता तथा विषयासक्ति से पर हुआ या नहीं यह जाने बिना, उसके बारे में धारणा करना गलत होगा । ऋषिकेश की तरह उत्तरकाशी में विद्वान लोग बहुत सारे थे, मगर साधना में अभिरुचि रखनेवाले तथा आत्मानुभव से संपन्न, शांतिप्राप्त महापुरुष बहुत कम थे । फिर भी जो गिनेचुने महापुरुषों से मेरी मुलाकात हुई, उनके बारे में यहाँ बताना अनुचित नहीं होगा ।
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उत्तरकाशी के विश्वनाथ महादेव में एक छोटी-सी कुटिया में वे रहते थे । उनके शरीर पर कौपीन और भस्म के अलावा कुछ नहीं था । लोग उन्हें नागाजी के नाम से बुलाते थे । उनके सर पर जटा थी, और शरीर कृशकाय था । किसीने मुझे उनके बारे में बताया इसलिये मैं उनके दर्शन के लिये गया । उन्होंने सस्मित मेरा सत्कार किया और ईशारों से मेरे साथ बातचीत की । बरसों से उनका मौनव्रत था इसलिये अधिक बातचीत नहीं हो पायी, मगर उनके प्रति दिल में सम्मान की भावना अवश्य पैदा हुई । वे भी मुझे स्नेहभाव से देखने लगे । वे अन्नक्षेत्र से भिक्षा लाकर भोजन पकाते थे । क्षेत्र में जाते वक्त अन्य साधुमहात्माओं की तरह मैं भी उनके पास जाता था ।
मैंने उनके बारे में सुना था की वे पूरी रात सोते नहीं है और साधना करते हैं । मुझे यह सुनकर हैरानी नहीं हुई क्योंकि पिछले कुछ महीनों से मैं भी पूरी रात जागकर साधना करता था । नागाजी की मुखाकृति शांत और प्रसन्न थी । उनकी तेजस्वी आँखे देखकर यह पता चलता था की उन्होंने साधना में अच्छी प्रगति की है । मेरे प्रति उनके प्रेम में वक्त के साथ बढोतरी होती रही । हम दोपहर को भी मिलते थे, कई दफा दूध पीने के लिये मैं बाजार में जाता तो वे मुझे देखकर मिलने आते थे । न जाने क्यूँ मगर मुझे देखकर उन्हें प्रसन्नता होती थी । हमारे बीच जो थोडी-सी सांकेतिक बातचीत होती थी, उससे मैं अनुमान लगा सकता हूँ की वे उत्तम कोटि के संतपुरुष थे । एक दफा उन्होंने जो बताया, अब भी मुझे याद है: 'साधुपुरुष को दो चीज सम्हाल कर रखनी हैं : जीभ और उपस्थ । जीभ और उपस्थ के संयम बीना साधुजीवन का कोई महत्व नहीं है ।'
आज काफि साल बीत जाने के बाद भी नागाजी की अनुभववाणी मुझे ठीक तरह से याद है । जैसा की उन्होंने बताया था, साधु ही नहीं, उन्नति की महेच्छा रखनेवाले किसी भी व्यक्ति के लिये यह बात सत्य है । जीभ के विषय में रसास्वाद तथा वाणी – दोनों का समावेश होता है । ब्रह्मचर्य अथवा संयम की महत्ता प्रत्येक धर्म के महापुरुषों ने बतायी है । ब्रह्मचर्य का पालन स्त्री तथा पुरुष – दोनों के लिये आवश्यक है । जीभ तथा उपस्थ का संयम श्रमसाध्य है । जागृति, आत्मनिरीक्षण और प्रार्थना से ब्रह्मचर्य के पालन में सहायता मिलती है । सत्पुरुषों का संग, सदग्रंथो का पठन तथा तीर्थयात्रा भी संयम की साधना में सहायक होतें है । हरएक साधक को चाहिये की वो संयम का व्रत ले । संयम के बिना आत्मिक उन्नति की साधना अपूर्ण रहेगी ।
नागाजी की ईच्छा थी की मैं हमेशा के लिये उत्तरकाशी में रहूँ । मेरी ईच्छा भी कुछ एसी थी क्योंकि मुझे उत्तरकाशी अच्छा लगता था । मगर ईश्वर की योजना कुछ ओर थी इसलिये मुझे उत्तरकाशी छोडना पडा । आज भी नागाजी की स्मृति मानसपट पर यथावत है, और साथ में उनके लिये बना आदरभाव भी । उनको मिले बरसों बीत गये हैं मगर उनकी स्मृति में कोई फर्क नहीं आया । संतो का स्नेह उनके समागम की तरह सदैव सुखकारक तथा शांतिप्रदायक होता है । वक्त के चलते हुए वह कम नहीं होता, बढता ही है ।
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उत्तरकाशी में एक अन्य उच्च कोटि के साधक का समागम हुआ । उनका नाम मोतीलाल ब्रह्मचारी था । गंगा के दूसरे छोर पर स्थित छोटे-से गाँव में वे रहते थे । वे जब भी उत्तरकाशी आते थे तब मुझे अवश्य मिलते थे । उनकी उम्र तकरीबन चालीस साल होगी मगर योगाभ्यास के कारण वे सिर्फ पच्चीस साल के दिखाई देते थे । उन्हें योगसाधना में प्रबल दिलचस्पी थी । योग की प्रारंभिक तालीम लेकर वे हिमालय आये थे और उत्तरकाशी में स्थायी हुए थे । उनके जैसे उत्साही और पुरुषार्थी साधक मैंने बहुत कम देखे हैं । रात को दो बजे उठकर वे आसन और प्राणायाम की साधना में लग जाते थे । दोपहर को वे स्वयं चावल और दूध पकाकर भोजन करते थे । उत्तरकाशी से थोडी दूरी पर ब्रह्माजी नामक योगीपुरुष रहते थे । उन्होंने मोतीलाल को प्राणायाम की विधि बताई थी, खास करके कुंभक । इससे उन्हें कुंभक करने में यानि की साँस को अंदर रोकने में असाधारण सफलता मिली थी । उनके कथनानुसार वे एक घण्टे तक कुंभक कर सकते थे । अगर प्राणायाम का उनका अभ्यास यथावत रहा होगा तो एक-दो साल में वे तीन घण्टे तक कुंभक करने की क्षमता हासिल करना चाहते थे । उनको मिले काफि साल हो गये । आज वो कहाँ है, मुझे पता नहीं मगर इतना जरूर कहूँगा की अगर उनकी साधना निर्विघ्न चलती रही होगी तो आज उनकी अवस्था अत्यंत सम्मानजनक होगी । ई.स. १९४४ में मुझे मिले मोतीलाल ब्रह्मचारी आज शायद एक समर्थ अनुभवी योगी होगें ।
साधना का मार्ग कष्टों से भरा है । उसमें भारी उत्साह, लगन, श्रद्धा और पुरुषार्थ आवश्यक है । योगसाधना का मार्ग अत्यंत कठिन माना गया है । योगमार्ग में सिद्धि हासिल करने के लिये बरसों तक महेनत करनी पडती है । जो साधक सतत एवं दीर्घ महेनत करने की क्षमता नहीं रखते वे योगसाधना में सफल नहीं हो पाते ।
उत्तरकाशी में मुझे गंगोत्री में रहनेवाले सुप्रसिद्ध महात्मा श्री कृष्णाश्रम के दर्शन का लाभ मिला था । कृष्णाश्रमजी उत्तरकाशी में मेरे बगलवाली कुटिया में रहें थे । वे अवधूत अवस्था में रहते थे और मौनव्रत रखते थे । वे संस्कृत के विद्वान थे एसा कहा जाता था । जब मैंने उनकी मुलाकात ली तब वे कुटिया में नीचे घास पर बैठे थे । उनकी मुखाकृति जटा और दाढी के कारण प्रभावशाली दिखती थी । मुलाकात के कुछ ही दिनों में वे गंगोत्री के लिये रवाना हुए थे । उनकी सेवा में एक पर्वतीय स्त्री थी, जिनके बारे में विशेष उल्लेख मैं आगे के प्रकरणों में करूँगा । कृष्णाश्रमजी के अलावा मुझे स्वामी तपोवनजी, देवगिरिजी तथा प्रज्ञानाथजी के दर्शन का लाभ मिला था । प्रज्ञानाथजी को योगसाधना में विशेष अभिरुचि थी ।

