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Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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मेरे उत्तरकाशी-निवास के दौरान मिले एक ओर अनुभव के बारे में यहाँ बताने जा रहा हूँ । नित्यक्रम अनुसार मैं रात को ध्यान में बैठा । ध्यान की अवस्था में मेरा देहभान चला गया और मुझे जमीन के नीचे दर्रा दिखाई दिया । वहाँ एक हराभरा पेड़ था और पेड़ के नीचे बैठने के लिये चौराहा बना था । चौराहे पर एक युवान महापुरुष पद्मासन में आँख बन्द करके बैठे थे । उन्होंने श्वेत वस्त्र धारण किये थे । शरीर के नीचे का वस्त्र घूँटनों तक था इसलिये उनके आधे पैर दिखते थे । उनके बाल लम्बे थे, दाढी बिल्कुल नहीं थी, तथा मुख अत्यंत तेजस्वी, सुवर्णमय और शान्त था ।

उनके दर्शन करने पर मेरे मन में विचार आया, कुमार अवस्था के यह महापुरुष कौन हो सकते हैं ? यूँ तो भारत में बहुत सारे बालयोगी हुए है - अष्टावक्र, शुकदेव, शंकराचार्य वगैरह मगर इनका स्वरूप बिल्कुल निराला था । उस वक्त अंतःप्रेरणा से मुझे ज्ञात हुआ की वे ओर कोई नहीं मगर संत ज्ञानेश्वर है । संत ज्ञानेश्वर की स्मृति होते ही मेरा मन खुशी-से झूम उठा ।

संत ज्ञानेश्वर को कौन नहीं पहेचानता ? सिर्फ पंद्रह साल की आयु में उन्होंने ज्ञानेश्वरी गीता की रचना की थी । संत ज्ञानेश्वर अपने अपूर्व ज्ञान के लिये सुप्रसिद्ध है । महाराष्ट्र के पैठण गाँव में उन्होंने बैल के मूँह से वेद बुलवाये थे । पूना के पास आलंदी गाँव में उनका जन्म हुआ था । जब चांगदेव सिंह पर बैठकर, हाथ में साँप की चाबुक लेकर, उनको मिलने के लिये आया था तब उन्होंने दीवार में जान डालकर उसे चलायी थी । ज्ञानेश्वर, निवृतिनाथ, सोपान और मुक्ताबाई - चारों भाईबहन मुक्त आत्मा थे । संत ज्ञानेश्वर ने आलंदी में जीवंत समाधि ली थी । आलंदी में उनकी समाधि पर आज-भी हजारों भक्तजन इकठ्ठे होते हैं । एसे महान ज्ञानी, योगी और संत ज्ञानेश्वर के दर्शन पाकर मैं अत्यंत हर्षित हुआ । दर्शन का यह अनुभव तकरीबन दस मिनट तक चलता रहा ।

वाचकों के मन में प्रश्न होना स्वाभाविक है की ज्ञानेश्वर महाराज को पृथ्वीपट से बिदा हुए कई साल हो गये, क्या आज के दौर में उनके दर्शन कर पाना संभव है ? इसके प्रत्युत्तर में मैं कहूँगा की, हाँ आज भी उनके दर्शन हो सकते हैं । जैसे भगवान कृष्ण, राम, वेद व्यास, बुद्ध या ईसा मसीह को पृथ्वी पर अवतरित हुए सदीयाँ बीत चुकी है, फिर भी उनके दर्शन हो सकतें है । बिल्कुल वैसे ही, समर्थ और सिद्ध संतपुरुष देश और काल से पर होतें हैं । वे किसीको, कहीं पर भी दर्शन देने के लिये समर्थ है । अगर हमारे दिल में उनके दर्शन की तीव्र ईच्छा है तो वे आज भी हमें दर्शन दे सकते हैं । ईश्वर की परम कृपा से भी एसे दर्शन हो सकतें हैं ।

संसार में दो तरह के महापुरुष है – एक तो वो जो देहत्याग के बाद परमात्मा में पूर्णरूप से विलीन हो जाते हैं । उन्हें अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रखने की कोई कामना नहीं होती । दूसरे वो, जो देहत्याग के उपरांत अपना स्वतंत्र अस्तित्व बनाये रखतें हैं । वे सोचतें हैं की हमने तो परमात्मा का साक्षात्कार कर लिया, हम तो जीवनमुक्त हो गये । अब क्यूँ न हम दूसरों को पूर्णता और मुक्ति का मार्ग दिखलायें, दूसरों को परमात्मा का साक्षात्कार करने में सहायता करें । एसे परोपकारी महापुरुष देहत्याग के उपरांत अपनी मरजी से साधकों को स्थुल या सुक्ष्म रूप में दर्शन देतें हैं ।

एसे महापुरुष अपनी मरजी से संसार में जन्म लेतें है । उन्हें अपने स्वरूप का ज्ञान हमेंशा रहता है । वे खुद तो संसार के भोगपदार्थों में फँसते नहीं, मगर अन्य लोगों को मोहमाया से मुक्त होने का मार्ग दिखलाते हैं । अपना जीवनहेतु समाप्त होने पर वे अपने मूल स्वरूप में विलीन हो जातें हैं । एसे महापुरुष धर्मप्रचार के अलावा बहुत सारे कार्य करतें हैं । एसे अवतारी महापुरुषों को शास्त्रों में कारक-पुरुष कहे गये हैं ।  जो महापुरुष परमात्मा में विलीन हो गये हैं, उनके दर्शन भी परमात्मा की कृपा से साधक को मिल सकते हैं । परमात्मा सर्वसमर्थ है । अपने भक्तों की इच्छा पूर्ण करने के लिये परमात्मा खुद महापुरुष का रूप धारण करके प्रकट होते हैं । हालाकि एसा बहुत कम होता है ।

मेरी स्पष्टता के बाद आप समज सकेंगे की समाधि लेने के कई साल बाद भी ज्ञानेश्वर महाराज के दर्शन होना नामुमकिन नहीं हैं । ज्ञानेश्वर महाराज ने जीवंत समाधि ली थी, इस बात से उनकी महान यौगिक शक्ति का परिचय मीलता है । एसे महापुरुष अपनी मरजी से समाधि के उपरांत भी किसीको दर्शन दे सकतें है । ज्ञानेश्वर महाराज की समाधि के करीब तीनसो साल पश्चात महाराष्ट्र की भूमि पर एकनाथ महाराज हुए । ज्ञानेश्वर महाराज ने उन्हें स्वप्न में दर्शन देकर कहा था की जिस वृक्ष के नीचे मैंने समाधि ली है, उसकी एक शाखा मुझे बाधा पहूँचाती है, अतः तुम उसे जाकर ठीक करो ।

ज्ञानेश्वरजी जैसे महान योगी क्या वृक्ष की शाखा ठीक नहीं कर सकते भला ? अवश्य कर सकतें हैं, मगर एकनाथजी को दर्शन देने के लिये कोई निमित्त चाहिए न । एकनाथजी अपने स्वप्नादेश के मुताबिक आलंदी गये, मगर समाधि-स्थान नहीं ढूँढ सके । ज्ञानेश्वर महाराज ने उन्हें सूचना दी और एकनाथजीने जमीन के नीचे गडी ज्ञानेश्वर महाराज की समाधि को ढूँञ निकाला । वहाँ उन्होंने पैड़ के नीचे बैठे हुए ज्ञानेश्वर महाराज के दर्शन किये । एकनाथजी महान ईश्वरदर्शी संतपुरुष थे । दोनों महापुरुषों का मंगल मिलन हुआ – मानो राम और भरत का, बद्रीनाथ और केदारनाथ का, गंगा और जमना का अथवा ज्ञान, भक्ति और योग का समागम हुआ । कहा जाता है की ज्ञानेश्वरजी के समाधि-स्थल पर एकनाथजी तीन दिन और तीन रात रहें थे । उनके बीच क्या वार्तालाप हुआ ये तो किसीको नहीं पता मगर एकनाथजी के भजनों से इतना अवश्य पता चलता है की ज्ञानेश्वर महाराज ने उन्हें दर्शन दिये थे । इस घटना के कई सालों बाद ई.स.१९४४ में ज्ञानेश्वर महाराज ने उत्तरकाशी के तीर्थ में मुझे अपनी कृपा का परिचय दिया । उनके लिये मुझे या मेरे जैसे अन्य साधक को दर्शन देना कोई बडी बात नहीं हैं । अनगिनत साधकों को शायद मेरी तरह उनकी कृपा का लाभ मिला होगा ।

मुझे दर्शन देकर उन्होंने मेरा दिल जीत लिया । मेरे मन में उनके प्रति सम्मान की भावना तो थी, मगर अब उसका स्वरूप बदल गया । उनका महान व्यक्तित्व मेरी आँखो के सामने बार-बार आने लगा । बेशक, एकनाथ महाराज महान थे, मगर मैं तो एक साधारण बालक था, मुझमें कोई विशेषता नहीं थी । फिर भी उन्होंने कृपा करके मुझे दर्शन दिये, यह सोचकर मेरा दिल भर आया । महापुरुषों की रीत अनोखी होती है । वे कब, कैसे और कब कृपा करते हैं यह कोई जान नहीं पाया । भारत और समस्त संसार के दो अनमोल रत्न समान संत ज्ञानेश्वर के चरणों में मेरा प्रेमपूर्वक प्रणाम है । उनका अनुग्रह मुझ पर सदैव बना रहे एसी मैं कामना करता हूँ ।

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