मेरे उत्तरकाशी-निवास के उन दिनों में मुझे एक ओर अनुभव मिला था । रात के वक्त मैं अपने कमरे में बैठा था । मैं जहाँ बैठा था, उससे थोडी दूरी पर मुझे प्रकाश का पूँज दिखाई दिया । यह दर्शन संपूर्ण जागृति में हुआ । एसा ही अनुभव दो-तीन दिन तक हररोज रात को करीब दो-तीन घण्टे तक होता रहा । जब पहेली बार मुझे ज्योति का दर्शन हुआ तो मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ । मेरे कमरे का दरवाजा तथा खिडकीयाँ बन्द थी इसलिये बाहर से प्रकाश का अंदर आना नामुमकिन था । रात अंधेरी होने के कारण कमरे के बाहर भी उजाला नहीं था । प्रकाश का जो पूँज मुझे दिखाई पडा वो मेरे मस्तक से करीब दो हाथ की दूरी पर था । ज्योति का दर्शन इतना साफ था की उसे दृष्टिभ्रम मानने का सवाल ही नहीं था । एक क्षण के लिये मेरे मन में विचार आया, ये ज्योति क्या हो सकती है ? मैंने ध्यान में ज्योति-दर्शन की बात पढी थी मगर मैं तो इसे पूर्ण जागृत अवस्था में देख रहा था । कुछ क्षण के बाद मुझे अंतःस्फुरणा हुई की यह ओर कुछ नहीं, मगर आत्मज्योति है । उपनिषद में ऋषिओंने ध्यान तथा समाधि की अवस्था में होनेवाले आत्मदर्शन की बात लिखी है ।
ज्योतिरिवा धूमकः।
अंगुष्ठमात्रः पुरुषो मध्यआत्मनि तिष्ठति।
ईशानो भूतभव्यस्य ततो न विजुगुप्सते॥
मतलब की आत्मा अंगुष्ठ के आकार की होती है और शरीर के बीचोबीच, हृदयप्रदेश में रहती है । जो उसे जान लेता हैं, वह शोक और मोह से मुक्त होता है । उपनिषद में कहीं पर ये भी कहा गया है की आत्मा ज्योतिस्वरूप है, ऐसी ज्योति जिससे धूँआ नहीं निकलता ।
उपनिषद के वचनों की स्मृति होने से मुझे कोई संदेह नहीं रहा की मैं जो प्रकाश का दर्शन कर रहा हूँ वह हकीकत में कोई सामान्य ज्योति नहीं मगर आत्मज्योति ही है । ज्योति का आकार अंगुठे की तरह था ।
किसीके मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है की क्या आत्मज्योति का दर्शन जागृति में और वो भी अपने शरीर के बाहर हो सकता है ?'
मैं इसके प्रत्युत्तर में ये कहूँगा की हाँ, एसा हो सकता है । आत्मा अत्यंत सूक्ष्म है और उसे अपनी आँखो से देख पाना असंभव है । योगी अपनी सुसूक्ष्म मनोवृत्ति से उसे समाधिदशा में देखते हैं । मगर इसका यह मतलब कतै नहीं की आत्मा को जागृत अवस्था में शरीर के बाहर नहीं देख सकते । आत्मा तो सभी जगह मौजूद है, उसके दर्शन कहीं पर भी हो सकते हैं । भगवद्गीता में कहा गया है की योगी को सर्वप्रथम आत्मा का दर्शन अपने शरीर में करना है, और बाद में, अपने आसपास की सभी चिजों में करना है । इसलिये ईश्वर की इच्छा से तथा साधक की रुचि के अनुसार आत्मा का दर्शन कहीं पर भी होना मुमकिन है । आत्मा का साक्षात्कार साधक को अंदर और बाहर - दोनों जगह पर हो सकता है । 'साक्षात्कार' का सही अर्थ समाधि और जागृति – दोनों अवस्थाओं के लिये किया जाता है । इश्वर की परमकृपा से मुझे यह अनुभव मिला था ।
मैंने आत्मज्योति के दर्शन का मेरा अनुभव यहाँ पर बताया है । इसका यह मतलब कतै नहीं है की सभी साधकों को एसा दर्शन होना चाहिये । आत्मदर्शन के कई प्रकार है । विभिन्न साधकों को भिन्न-भिन्न अनुभव होना बिल्कुल स्वाभाविक है । साधक के लिये किसी निश्चित प्रकार के दर्शन का आग्रह रखना योग्य नहीं होगा । मैंने अपने अनुभव का वर्णन यहाँ इसलिये किया है ताकी दूसरे साधकों को यह ज्ञात हो की इस तरह के दर्शन भी हो सकतें हैं ।
ज्योतिरिवा धूमकः।
अंगुष्ठमात्रः पुरुषो मध्यआत्मनि तिष्ठति।
ईशानो भूतभव्यस्य ततो न विजुगुप्सते॥
मतलब की आत्मा अंगुष्ठ के आकार की होती है और शरीर के बीचोबीच, हृदयप्रदेश में रहती है । जो उसे जान लेता हैं, वह शोक और मोह से मुक्त होता है । उपनिषद में कहीं पर ये भी कहा गया है की आत्मा ज्योतिस्वरूप है, ऐसी ज्योति जिससे धूँआ नहीं निकलता ।
उपनिषद के वचनों की स्मृति होने से मुझे कोई संदेह नहीं रहा की मैं जो प्रकाश का दर्शन कर रहा हूँ वह हकीकत में कोई सामान्य ज्योति नहीं मगर आत्मज्योति ही है । ज्योति का आकार अंगुठे की तरह था ।
किसीके मन में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है की क्या आत्मज्योति का दर्शन जागृति में और वो भी अपने शरीर के बाहर हो सकता है ?'
मैं इसके प्रत्युत्तर में ये कहूँगा की हाँ, एसा हो सकता है । आत्मा अत्यंत सूक्ष्म है और उसे अपनी आँखो से देख पाना असंभव है । योगी अपनी सुसूक्ष्म मनोवृत्ति से उसे समाधिदशा में देखते हैं । मगर इसका यह मतलब कतै नहीं की आत्मा को जागृत अवस्था में शरीर के बाहर नहीं देख सकते । आत्मा तो सभी जगह मौजूद है, उसके दर्शन कहीं पर भी हो सकते हैं । भगवद्गीता में कहा गया है की योगी को सर्वप्रथम आत्मा का दर्शन अपने शरीर में करना है, और बाद में, अपने आसपास की सभी चिजों में करना है । इसलिये ईश्वर की इच्छा से तथा साधक की रुचि के अनुसार आत्मा का दर्शन कहीं पर भी होना मुमकिन है । आत्मा का साक्षात्कार साधक को अंदर और बाहर - दोनों जगह पर हो सकता है । 'साक्षात्कार' का सही अर्थ समाधि और जागृति – दोनों अवस्थाओं के लिये किया जाता है । इश्वर की परमकृपा से मुझे यह अनुभव मिला था ।
मैंने आत्मज्योति के दर्शन का मेरा अनुभव यहाँ पर बताया है । इसका यह मतलब कतै नहीं है की सभी साधकों को एसा दर्शन होना चाहिये । आत्मदर्शन के कई प्रकार है । विभिन्न साधकों को भिन्न-भिन्न अनुभव होना बिल्कुल स्वाभाविक है । साधक के लिये किसी निश्चित प्रकार के दर्शन का आग्रह रखना योग्य नहीं होगा । मैंने अपने अनुभव का वर्णन यहाँ इसलिये किया है ताकी दूसरे साधकों को यह ज्ञात हो की इस तरह के दर्शन भी हो सकतें हैं ।

