खेचरी मुद्रा की सफलता के लिये मैंने उत्तरकाशी पहूँचने के बाद पुनः प्रयास आरंभ किये । दो बार जिह्वा के नीचे की नाडि को काटा । मेरी जिह्वा छोटी थी, अतः मुझे लगा की खेचरी की सिद्धी के लिये मुझे काफि वक्त लगेगा । इस बात को लेकर मैं चिंतीत भी हुआ मगर मैंने अपने प्रयास जारी रखें । खेचरी मुद्रा की सिद्धि से मन स्थिर होता है, प्राण पर अधिकार स्थापित होता है तथा समाधि का आनन्द मिलता है । यूँ तो मेरा मन पहले-से स्थिर और शान्त था । समाधि का अनुभव मुझे मिल चुका था तथा मैं जड-चेतन सभी में परमात्मा के दर्शन करता था । इसलिये खेचरी मुद्रा की सिद्धि मेरे लिये अनिवार्यरूपेण आवश्यक नहीं थी । वेदबंधु ने मुझे कहा भी था मगर साधनात्मक कुतूहल के कारण मुझे खेचरी मुद्रा सिद्ध करनी थी ।
उत्तरकाशी में कुछ दिन रहने के बाद मेरी भेंट नाथसंप्रदाय के एक महात्मा से हुई । वे नहान स्टेट में रहते थे और योगाभ्यास में प्रवीण थे । विशेषतः वे खेचरी मुद्रा के अभ्यासु थे । उनके साथ मैंने योग के बारे में चर्चा की । योग के प्रति मेरे प्रेम को देखकर उन्होंने मुझे अपने नहान स्थित आश्रम में आने का निमंत्रण दिया । मैंने उसे सहर्ष स्वीकार किया । उन्होंने मुझे बताया की बच नामक जडीबुटी खेचरी मुद्रा में सहायक होती है । उस जडीबुटी का रस जीभ के नीचे लगाने से जीभ लम्बी होती है । मैंने छानबिन करके पता लगाया की उत्तरकाशी के जानसु प्रदेश में यह बुटी पायी जाती है । मैंने बुटी मंगवाकर, उसके रस को सुचनानुसार लगाकर, कुछ दिन तक उत्साहपूर्वक प्रयोग किया । मगर जीभ ऐसे थोडी लम्बी होती है ? जीभ लम्बी करने के लिये योग-ग्रंथो में मक्खन का प्रयोग बताया गया है । उत्तरकाशी में मुझे मक्खन कहाँ मिलनेवाला था । मुझे लगा की अब विशेष प्रयोग करना संभव नहीं होगा । उन दिनों, मैं पूरी रात सोता नहीं था । दिन का कुछ वक्त और रात का समय समाधि का आनंद मिलता था । मगर खेचरीमुद्रा की सिद्धि के लिये मन बाँवला था ।
ईश्वर ने मेरी तसल्ली के लिये मार्ग निकाला - जीभ की भले ही छोटी रहे मगर मुझे खेचरी का आनंद मिले । आप कहेंगे की योगग्रंथो में तो एसा कोई वर्णन नहीं है । मगर किताबों में उल्लेख न होने से मेरे अनुभव को गलत कहेना अनुचित होगा । ईश्वर की शक्ति अपार है, वो कुछ भी करने के लिये समर्थ है । जो उसे प्यार से पुकारता है, उसकी सर्व मनोकामना वो पूर्ण करता है । अगर वो गूंगे के मुख में शब्द रख सकता है, मृत को नवजीवन दे सकता है, तो जीभ छोटी होने के उपरांत किसीको खेचरी का अनुभव देना उसके लिये मुश्किल नहीं है । आवश्यकता है सिर्फ उसे सरल हृदय और निष्कपट मन से पुकारने की, प्रार्थने की । हाँ, किसकी इच्छा कब और कैसे पूरी करनी है, वह उसके हाथ में है । हमें ईश्वर की शक्ति पर पूरा भरोंसा रखना होगा और वो जो भी करे उसमें संतुष्ट होना होगा । जब मेरे व्यक्तिगत पुरुषार्थ के साथ मेरी प्रार्थना उत्कट हुई तो मुझ पर ईश्वर की कृपा हुई ।
रात के प्रथम प्रहर में, अपने नित्यक्रमानुसार, मैं प्रार्थना के लिये बैठा था । सहसा मेरी जीभ तालुप्रदेश में लगी और मुझे दिव्यरस का आस्वाद मिलने लगा । कुछ देर तक इसी अवस्था में रहा फिर मेरा देहभान चला गया । इसी अवस्था में काफि सारा वक्त बीत गया होगा । बाद में मेरा देहभान लौट आया । मेरी जीभ अब भी तालुप्रदेश में लगी थी और मुझे कोई दिव्य और सुमधुर रस का आनन्द मिल रहा था । ब्राह्ममुहूर्त होने पर जीभ पूर्ववत् अपनी सहज स्थिति में आयी । मुझे इस अनुभव से बेहद खुशी हुई । खेचरीमुद्रा की अनुभूति का मेरा कुतूहल शान्त हुआ । ईश्वर की कृपा के अतिरिक्त मुझे यह अनुभव कदापि नहीं मिल सकता था । आश्चर्य की बात तो यह थी की इस अनुभव के बाद तीन दिन और रात तक मुझे यह अनुभव मिलता रहा ।
इस अनुभव के बाद मेरी जिज्ञासा शान्त हो गई । मुझे खेचरीमुद्रा का विशेष अभ्यास करने की जरूरत महेसुस नहीं हुई ।
उत्तरकाशी में कुछ दिन रहने के बाद मेरी भेंट नाथसंप्रदाय के एक महात्मा से हुई । वे नहान स्टेट में रहते थे और योगाभ्यास में प्रवीण थे । विशेषतः वे खेचरी मुद्रा के अभ्यासु थे । उनके साथ मैंने योग के बारे में चर्चा की । योग के प्रति मेरे प्रेम को देखकर उन्होंने मुझे अपने नहान स्थित आश्रम में आने का निमंत्रण दिया । मैंने उसे सहर्ष स्वीकार किया । उन्होंने मुझे बताया की बच नामक जडीबुटी खेचरी मुद्रा में सहायक होती है । उस जडीबुटी का रस जीभ के नीचे लगाने से जीभ लम्बी होती है । मैंने छानबिन करके पता लगाया की उत्तरकाशी के जानसु प्रदेश में यह बुटी पायी जाती है । मैंने बुटी मंगवाकर, उसके रस को सुचनानुसार लगाकर, कुछ दिन तक उत्साहपूर्वक प्रयोग किया । मगर जीभ ऐसे थोडी लम्बी होती है ? जीभ लम्बी करने के लिये योग-ग्रंथो में मक्खन का प्रयोग बताया गया है । उत्तरकाशी में मुझे मक्खन कहाँ मिलनेवाला था । मुझे लगा की अब विशेष प्रयोग करना संभव नहीं होगा । उन दिनों, मैं पूरी रात सोता नहीं था । दिन का कुछ वक्त और रात का समय समाधि का आनंद मिलता था । मगर खेचरीमुद्रा की सिद्धि के लिये मन बाँवला था ।
ईश्वर ने मेरी तसल्ली के लिये मार्ग निकाला - जीभ की भले ही छोटी रहे मगर मुझे खेचरी का आनंद मिले । आप कहेंगे की योगग्रंथो में तो एसा कोई वर्णन नहीं है । मगर किताबों में उल्लेख न होने से मेरे अनुभव को गलत कहेना अनुचित होगा । ईश्वर की शक्ति अपार है, वो कुछ भी करने के लिये समर्थ है । जो उसे प्यार से पुकारता है, उसकी सर्व मनोकामना वो पूर्ण करता है । अगर वो गूंगे के मुख में शब्द रख सकता है, मृत को नवजीवन दे सकता है, तो जीभ छोटी होने के उपरांत किसीको खेचरी का अनुभव देना उसके लिये मुश्किल नहीं है । आवश्यकता है सिर्फ उसे सरल हृदय और निष्कपट मन से पुकारने की, प्रार्थने की । हाँ, किसकी इच्छा कब और कैसे पूरी करनी है, वह उसके हाथ में है । हमें ईश्वर की शक्ति पर पूरा भरोंसा रखना होगा और वो जो भी करे उसमें संतुष्ट होना होगा । जब मेरे व्यक्तिगत पुरुषार्थ के साथ मेरी प्रार्थना उत्कट हुई तो मुझ पर ईश्वर की कृपा हुई ।
रात के प्रथम प्रहर में, अपने नित्यक्रमानुसार, मैं प्रार्थना के लिये बैठा था । सहसा मेरी जीभ तालुप्रदेश में लगी और मुझे दिव्यरस का आस्वाद मिलने लगा । कुछ देर तक इसी अवस्था में रहा फिर मेरा देहभान चला गया । इसी अवस्था में काफि सारा वक्त बीत गया होगा । बाद में मेरा देहभान लौट आया । मेरी जीभ अब भी तालुप्रदेश में लगी थी और मुझे कोई दिव्य और सुमधुर रस का आनन्द मिल रहा था । ब्राह्ममुहूर्त होने पर जीभ पूर्ववत् अपनी सहज स्थिति में आयी । मुझे इस अनुभव से बेहद खुशी हुई । खेचरीमुद्रा की अनुभूति का मेरा कुतूहल शान्त हुआ । ईश्वर की कृपा के अतिरिक्त मुझे यह अनुभव कदापि नहीं मिल सकता था । आश्चर्य की बात तो यह थी की इस अनुभव के बाद तीन दिन और रात तक मुझे यह अनुभव मिलता रहा ।
इस अनुभव के बाद मेरी जिज्ञासा शान्त हो गई । मुझे खेचरीमुद्रा का विशेष अभ्यास करने की जरूरत महेसुस नहीं हुई ।

