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Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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वेदबंधुने लक्षेश्वर महादेव के स्थान तथा उनको वहाँ मिले अनुभव के बारे में मुझे बताया था । उत्तरकाशी में मुझे आये हुए कुछ दिन हो गये थे । दोपहर के बाद एक दिन मैं लक्षेश्वर महादेव के लिये निकल पडा । मेरे साथ गुजराती स्वामी चिद्दघनानंद भी थे । लक्षेश्वर महादेव की जगह बिल्कुल एकांत में है, पास में गंगाजी का प्रवाह है । वहाँ पर तीन-चार महात्मा रहते थे । वे भिक्षा के लिये अन्नक्षेत्र में आते थे ।

मुझे लक्षेश्वर महादेव का स्थान पसंद आया मगर वह गाँव से तथा अन्नक्षेत्र से काफि दूर था । मुझे लगा की यहाँ-से क्षेत्र तक आने-जाने में मेरा काफि वक्त चला जायेगा, विशेषतः बारीश के मौसम मैं रास्ता खराब होने-से ओर दिक्कतों का सामना करना पडेगा । यह सोचकर मैं थोडा हडबडाया मगर वेदबंधु ने यहाँ पर जो गंगातटवर्ती कुटिया थी, उसके बारे में जोर देकर कहा था । मुझे लगा, एक बार पास जाकर देखने में कोई आपत्ति नहीं । पास जाकर देखा तो कुटिया बन्द थी । खिडकी से अन्दर झाँखकर देखा तो कुटिया के नीचे की जमीन उबड़खाबड़ लगी । उसे गोबर लगाकर ठीक करना मुश्किल बात नहीं थी । हाँ, कुटिया के अंदर अंधेरा कुछ ज्यादा था । कुटिया के आसपास बड़े-बड़े पैड-पौधे थे और हवा-उजास के लिये सिर्फ एक छोटी-सी खिडकी थी । मैं हमेशा-से स्वच्छता का पूजारी रहा हूँ तथा उजालों में रहना पसंद करता हूँ । गुफा जैसी बन्द कुटिया में रहने के लिये मेरा दिल नहीं माना ।

कुटिया को देखने के बाद चिद्दघनानंद ने मुझे कहा: 'ये तो बिल्कुल उज्जड जगह है, आपका यहाँ रहना ठीक नहीं होगा । ओर भी एक बात है, यहाँ जो दो-तीन साधु रहतें हैं, उनका बर्ताव अच्छा नहीं है । साधुसमाज में सब उन्हें जानते हैं ।'

मैंने कहा : 'उनकी बात तो ठीक है, मुझे कहाँ उनसे संबंध रखना है ? वे मेरा क्या बिगाड लेंगे ? मैं तो अपनी साधना में लगा रहूँगा ।'

वे बोले : 'आप उनको नहीं जानते । वे न तो खुद भजन करते हैं, ना ही किसीको करने देते हैं । आपको यहाँ से भगाने के लिये वे जरुर कुछ-न कुछ करेंगे । ये लोग आपको चैन से रहेने नहीं देंगे ।'

मैंने कहा : 'ये तो वक्त आने पर पता चलेगा । मगर सच पूछो तो कुटिया में रहने का मेरा मन नहीं है क्योंकि यहाँ अंधेरा ज्यादा है ।'

चिद्दघनानंद मेरी बात सुनकर राजी हुए । मैं उनसे दूर रहने जाउँ यह बात उन्हें पसंद नहीं थी । उनके दिल में मेरे लिये विशेष प्रेमभाव था ।

जब मैं पहली बार उत्तरकाशी आया था तो कैलास आश्रम में ठहरा था । इस बार मेरे रहने की जगह बदल गई थी । अब मैं आनंदस्वामी नामक महात्मा की कुटिया में रहता था । आनंदस्वामी मुझे स्वामी रामतीर्थ के जीवन-प्रसंग सुनाते थे । उनको ऋषिकेश जाना था, इसलिये उन्होंने अपनी कुटिया में रहने के लिये मुझे निमंत्रीत किया था । उनकी कुटिया कैलास-आश्रम के बिल्कुल पीछे थी ।

लक्षेश्वर महादेव का स्थान देखकर जब मैं कुटिया में वापिस आया तो शाम ढ़ल चुकी थी । हाँलाकि मेरी कुटिया सुविधाजनक थी मगर लक्षेश्वर की कुटिया का ख़याल दिमाग से गया नहीं । कुटिया में अंधेरा था यह बात को लेकर मन में विचारयुद्ध चला ।

रात को एक आश्चर्यकारक अनुभव हुआ । कुटिया की खाट पर बैठकर मैं ध्यान कर रहा था । यकायक कोई सिद्धपुरुष मेरे सामने प्रकट हुए । उनके स्पर्शमात्र से मेरा शरीर फूल-सा हल्का हो गया । वे मुझे लेकर आकाश में उडने लगे । मेरे लिये यह अनुभव अति आश्चर्यकारक था । कुछ-ही क्षणों में हम लक्षेश्वर की कुटिया में आ पहूँचे । उन्होंने मुझे कुटिया में उतारकर पूछा: 'कहाँ है अंघेरा? तुम कहते हो की यहाँ उजाला नहीं है मगर यहाँ तो उजाला-ही-उजाला है । तुमको यहाँ रहना पसंद नहीं है तो ठीक है, मगर अँधेरा है - एसा कहकर यहाँ रहने की बात मत टालो ।'

इतना कहकर महापुरुष ने फिर-से मेरे शरीर को स्पर्श किया । मैं पहले की तरह उनके साथ उडने लगा । पलक झपकते ही मैंने अपने आपको कुटिया में पाया । महात्मा पुरुष अदृश्य हो चुके थे । कुटिया के बाहर झाँका तो चांदनी में धूली हुई पर्वतमालाएँ दिखाई दी । रात के सन्नाटे में गंगाजी का सुमधुर संगीतस्वर गूँज रहा था । सिद्ध महापुरुष का दर्शनानुभव पूर्ण जागृति में हुआ या ध्यानावस्था में – ये कहेना मुश्किल होगा, शायद वह अर्धजागृत अवस्था थी । जो भी हो, अनुभव अतिशय असाधारण और आश्चर्यकारक था इसमें कोई दोराय नहीं ।

कौन थे वो महापुरुष ? क्या वे कोई प्राचीन सिद्धपुरुष थे या वर्तमान समय के कोई समर्थ संत ? क्या वे लक्षेश्वर में रहनेवाले कोई महात्मा थे या उत्तरकाशी में सूक्ष्मरूप से निवास करनेवाले कोई सिद्धपुरुष ? मैं उनको पहेचान नहीं पाया मगर वो जो भी थे, एक समर्थ सिद्धपुरुष थे इसमें कोई दोराय नहीं । मैंने आकाशगमन की सिद्धि के बारे में काफि कुछ पढ़ा था । मैंने ये भी सुना था की सिद्धपुरुष अपनी ईच्छा से कहीं पर भी आ-जा सकते हैं । इस अनुभूति के पश्चात आकाशगमन की बातें मेरे लिये हकीकत बन चुकी थी । साधनात्मक अनुभवों से साधक को न केवल शांति की संप्राप्ति होती है, अवनवीन रहस्यों का उद्धाटन भी होता है । एसे अनुभवों को केवल बौद्धिक तराजू में तोले नहीं जाते, उसे सुचारुरूप से समझने के लिये साधनात्मक अभ्यास आवश्यक है । आजकल साधनात्मक जीवन-के प्रति लोगों की रुचि कम हो रही है । विद्वान और विरक्त पुरुष भी इससे अछूत नहीं रहें हैं, यह अत्यंत खेदजनक है । साधनात्मक रहस्यों को समझने के लिये तर्क काफि नहीं है, उसे समझने के लिये स्वानुभव चाहिए ।

वो अज्ञात महापुरुष के जैसे न जाने कितने महापुरुष हमारे देश में विद्यमान होंगे ? वे अज्ञात जरूर हैं मगर साधकों के लिये अत्यंत प्रेरणास्पद और आशीर्वादरूप है । उनकी मौजूदगी संसार के लिये ईश्वर का वरदान है ।
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उत्तरकाशी-निवास के दौरान एक ओर अनुभव भी होता रहा । सुबह, दोपहर और शाम - गंगाजी की दिशा से पूजा या आरती का ध्वनि सुनाई पडता था । साथ में विभिन्न वाजिंत्रों की गूँज भी सुनाई देती थी । हररोज एसा अनुभव होता रहा । मैंने सोचा, क्या देवों या सिद्धों की मंडली गंगाजी की आरती कर रहें हैं ? मैंने कई महात्माओं से इस विषय में चर्चा की मगर यहाँ बरसों रहने के बाद भी उन्हें एसा अनुभव नहीं हुआ था । चिद्दघनानंदजी को दो-तीन दफा एसा अनुभव हुआ था ।

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