कुरुक्षेत्र के महात्मा के साथ मैं एक दिन टिहरी घूमने निकला । टिहरी में काफि सारे मंदिर और साधुमहात्मा के स्थान है । वहाँ होते-होते हम गाँव के बीचोबीच लगे बाजार में आ पहूँचे । बाजार घुमने के बाद हम पुस्तकालय में गये ।
करीब आधा घन्टा हुआ होगी की एक पुलीस इन्स्पेक्टर वहाँ आया । वो कुछ देर तक हमें देखता रहा, फिर उसने पूछा: 'आप दोनों कहाँ रहते हो ?'
'मैं बदरीनाथ मंदिर में और यह महात्मा केदारनाथ मंदिर में ।' मैंने स्वस्थता से उत्तर दिया ।
'तुम दोनों कल सुबह आठ बजे पुलीस स्टेशन पर आना ।', उसने कहा ।
उसके फरमान से मुझे आश्चर्य हुआ । मैंने सफाई के लिये पूछा: 'क्यों ? कुछ काम है ?'
'मुझे आपकी जाँच करनी है ।' उसने सत्तावाही आवाज में उत्तर दिया ।
'अगर आपको जाँच करनी है तो हम आपके सामने खडे हैं । आपको जो भी कुछ पूछना है, अभी पूछ लो । कल सुबह मैं तो पुलीस स्टेशन नहीं आ पाउँगा क्योंकि नौ बजे तक मैं अपने नित्यकर्म में प्रवृत्त रहता हूँ ।'
करीब आधा घन्टा हुआ होगी की एक पुलीस इन्स्पेक्टर वहाँ आया । वो कुछ देर तक हमें देखता रहा, फिर उसने पूछा: 'आप दोनों कहाँ रहते हो ?'
'मैं बदरीनाथ मंदिर में और यह महात्मा केदारनाथ मंदिर में ।' मैंने स्वस्थता से उत्तर दिया ।
'तुम दोनों कल सुबह आठ बजे पुलीस स्टेशन पर आना ।', उसने कहा ।
उसके फरमान से मुझे आश्चर्य हुआ । मैंने सफाई के लिये पूछा: 'क्यों ? कुछ काम है ?'
'मुझे आपकी जाँच करनी है ।' उसने सत्तावाही आवाज में उत्तर दिया ।
'अगर आपको जाँच करनी है तो हम आपके सामने खडे हैं । आपको जो भी कुछ पूछना है, अभी पूछ लो । कल सुबह मैं तो पुलीस स्टेशन नहीं आ पाउँगा क्योंकि नौ बजे तक मैं अपने नित्यकर्म में प्रवृत्त रहता हूँ ।'
'आपको आना ही पडेगा । आपको मालूम नहीं मैं कौन हूँ ? मैं यहाँ का पुलीस इन्स्पेक्टर हूँ ।' उसने उँची आवाज में कहा ।
'ये तो आपके कहने पर मुझे पता चला', मैंने धीरे से कहा; 'मगर उसका ये मतलब तो नहीं की मुझे कल आपके पास आना ही पडेगा । जैसे की मैंने बताया, मैं सुबह अपने नित्यकर्म में उलझा रहता हूँ । अगर आपको कुछ पूछना है तो अभी पूछ सकतें है ।'
मेरे कहने पर उसका दिमाग उबलने लगा । अगर मैं पुलीस स्टेशन नहीं पहूँचा तो उसका अच्छा परिणाम नहीं होगा – एसी धमकी देकर वो चला गया । उनकी धमकी से कुरुक्षेत्र के महात्मा डर गये । मैंने उनको समजाया मगर वे डरकर दुसरे दिन पुलीस स्टेशन गये । मैं इन्स्पेक्टर की धमकी से नहीं डरा, ना ही पुलीसथाने गया । मैंने मन-ही-मन सोचा, अगर वो यहाँ आयेगा तो मैं उसके प्रश्नों का उत्तर दूँगा मगर खुद चलकर वहाँ नहीं जाउँगा । मगर इन्स्पेक्टर नहीं आया ।
मैं इस घटना के बारे में कुछ दिन तक सोचता रहा । मुझे लगा की पुलीस की यह रीत ठीक नहीं है । किसी भी आदमी पर शक होने पर उसे थाने पर बुलाना और मना करने पर उसे धमकी देना योग्य नहीं है । अपनी बात मनवाने के लिये पुलीस अक्सर निर्दोष लोगों की मारपीट करती है और जुल्म ढोती है । अगर पुलीस को पूछताछ या तपास करनी है तो वो आदमी के घर जाकर नम्रता से प्रश्न पूछ सकती है । किसीको थाने आने के लिये धमकी देना कहाँ का विवेक और शिष्टाचार है ?
न चाहते हुए भी पुलीस के दमन का यह सिलसिला जारी है । भारत जैसे सुशील और स्वतंत्र देश की प्रजा और पुलीस को यह शोभा नहीं देता । व्यक्तिस्वातंत्र्य की हिमायत करनेवाले देश में पुलीस का एसा बर्ताव अयोग्य है । पुलीस को नम्र, प्रामाणिक, शिस्तबद्ध और अधिक सेवाभावी बनने की आवश्यकता है । तभी वे प्रजा की सेवा करके लोकप्रिय हो सकते है ।

