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Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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टिहरी के साथ स्वामी रामतीर्थ का नाम जुड़ गया है । स्वामीजीने यहाँ निवास किया था और यहीं पर देहत्याग किया था । धर्म और तत्वज्ञान की गंगा-जमना को भारत और अन्य देशों में प्रवाहित करनेवाले गिनेचुने महापुरुषों में विवेकानंद और स्वामी रामतीर्थ का नाम बडे आदर से लिया जाता है । विवेकानंद की तरह उन्होंने पश्चिम के देशों में भारतीय संस्कृति का ध्वज फहराया था । स्वामी रामतीर्थ का जीवन वेदांत का अनुवाद था । उनके महान व्यक्तित्व में देशप्रेम और मानवप्रेम की महेक थी । अमरिका में लोग उनसे इतने प्रभावित हुए थे की उनकी तुलना ईसा-मसीह के साथ करने लगे थे । हिमालय आने से पहेले मैंने स्वामीजी का जीवनचरित्र पढ़ा था । मेरे दिल में उनके लिये विशेष आदरभाव था इसलिये टिहरी आने पर उनके स्थान के दर्शन करने की इच्छा हुई ।

एक परिचित के साथ मैं वहाँ गया । नदी के तट पर टिहरी के महाराजा की कोठी थी । टिहरीनरेश स्वामीजी के परम भक्त थे । उनकी इच्छा से स्वामी रामतीर्थ यहाँ कुछ वक्त रहे थे । टिहरी से कीर्तिनगर जानेवाले मार्ग पर स्थित इस स्थान को देखकर मुझे अत्यंत हर्ष हुआ । वहाँ से हम लौटनेवाले थे की हमें ज्ञात हुआ की स्वामी रामतीर्थ अपने अंतिम दिनों में जहाँ रहे थे और जहाँ उन्होंने समाधि ली थी, वह स्थान सीमलासु गाँव के पास है । मुझे वहाँ जाने की स्वाभाविक इच्छा हुई । एक-दो दिन के बाद मैं वहाँ गया ।

दोपहर के वक्त जब मैं वहाँ पहूँचा तो स्वामीजी की याद दिलाता हुआ वह छोटा-सा मकान वैसे ही पडा था । पास में एक ओर मकान था, जहाँ पर छोटी-छोटी गुफाएँ थी । नाथ संप्रदाय के और कुछ अन्य वैरागी साधु वहाँ झोंपडी बनाकर रहते थे । स्थान सुंदर और एकांत में था, पास में गंगाजी का प्रवाह था । साधुओं से कुछ वार्तालाप करने के बाद मैं वापिस लौटा ।

वहाँ गंगा के तट पर अनगिनत काले पत्थर है । प्रवाह के बीचोबीच भी बडे-बडे पत्थर दिखाई पडते हैं । मैंने एक पत्थर पर अपना पैर रखना चाहा मगर मेरा पैर फिसल गया । अगर थोडी-सी चूक हुई होती तो मैं सीधा गंगाजी के प्रवाह में गिरता । ईश्वर की कृपा से मैं बच गया । तट पर जो पत्थर है, उससे फिसलने का खतरा है । मुझे फौरन स्वामी रामतीर्थ के अंतिम क्षणों का स्मरण हुआ क्योंकि उनका पैर भी इसी तरह फिसल गया था ।

जिन्होंने भी स्वामीजी का जीवनचरित्र पढ़ा होगा, वे इस घटना को कभी भूल नहीं पायेंगे । दिपावली के दिन, सुबह नित्यकर्म से निवृत्त होकर वे स्नान करने गये थे और वहाँ उनका पैर फिसल गया था । उनका शरीर गंगा के तेज प्रवाह में बहने लगा । स्वामीजी कुशल तैराक थे मगर पानी का वेग काफि ज्यादा था । यूँ भी कह सकते हैं की शायद उनके जीवन की परिसमाप्ति का वक्त निकट था । वे पानी के प्रवाह में बहते चले । उन्होंने अपने आत्मबल से पद्मासन जमाया और ओमकार का उच्चार करके मन को परमात्मा में जोड दिया । उनका मृत शरीर गंगा में प्रवाहित होते हुए किसी गुफा के द्वार पर आकर रुक गया । स्वामीजी के भक्तोंने खोज करके उसका पता लगाया ।

स्वामीजी का पैर फिसल जाने से एसा हुआ या फिर स्वामीजी ने अपनी इच्छा से देहत्याग किया ये उनके अलावा निश्चित रूप से कोई बता नहीं सकता । कुछ लोगों का कहेना है की स्वामीजी स्वयंसिद्ध थे, अतः उनकी इच्छा के बिना उनका शरीर शांत नहीं हो सकता । उनका कहेना था की स्वामीजी ने स्वयं अपने देह का त्याग किया था क्योंकि उन्होंने लिखा था की वे अपनी व्यक्तिगत चेतना का त्याग करके वैश्विक चेतना में संमिलित होना चाहते थे ।

जो भी हो, हमें तो स्वामीजी का देहांत हुआ यह हकीकत का स्वीकार करना है । ब्रह्मज्ञानी पुरुष का पैर फिसलें और उनका शरीर पानीमें प्रवाहित हो जाय, एसा होना नामुमकिन नहीं है । ब्रह्मज्ञानी पुरुष सर्व संकल्प-विकल्पों से पर होता है । उसे न तो जीवन की तृष्णा होती है, ना ही मृत्यु का भय । उसे अपना देह पानी में बहें या अग्नि में जलकर नष्ट हो जाय, कुछ फर्क नहीं पडता । ईश्वर के साथ उसके अनुसंधान में इससे किसी भी प्रकार की कोई बाधा नहीं होती । उसकी प्रभुपरायणता और ब्राह्मी स्थिति में कोई रुकावट नहीं आती । एसे जीवनमुक्त महापुरुष का मृत्यु चाहें जैसे भी हो, सामान्य लोगों की तरह उनकी दुर्गति नहीं होती । जिन्होंने जीते-जी परमात्मा का साक्षात्कार किया था, एसे स्वामीजी के अघटित देहांत से उनकी महत्ता, प्रतिष्ठा या प्रभुपरायणता में कोई फर्क नहीं पडना चाहिये ।

आदमी जब शरीर छोड़ता है, तब उसकी मनोस्थिति कैसी है, यह बात महत्वपूर्ण है । इसीसे उसकी महत्ता का आलोकन होना चाहिए । स्वामीजी के बारे में इस तरह सोचने से उनकी महानता को हम न्याय कर पायेंगे । वैसे तो गांधीजी की मौत बन्दुक की गोली से हुई थी । कर्म के सिध्धांत अनुसार उनका मृत्यु जैसे भी हुआ, मगर अंतिम क्षणों में उनकी वृत्ति शांत थी, उनके मुख से 'राम' का नाम निकला । यह बात सिद्ध करती है की भीषण और अमंगल कही गई मृत्यु की घडी उनके लिये मंगल सिध्ध हुई । गोली से मरने का प्रसंग चाहे प्रशंसनीय न हो, मगर अंतिम क्षणों में उनकी स्थिति अवश्य प्रसंशापात्र और अनुकरणीय थी, इसमें कोई दोराय नहीं । अगर हम स्वामी रामतीर्थ के देहत्याग को इसी नजरियें से देखेंगे तो हमें लाभ होगा । उनकी वृत्ति अंतिम क्षणों में परमात्मपरायण थी, तभी तो वे पद्मासन लगाकर ओमकार का उच्चार कर सकें । यह बात उनकी लोकोत्तरता की द्योतक है ।

गंगा के तटप्रदेश पर मुझे दिखाई दिये असंख्य पत्थरों से मैं इतना कह सकता हूँ की यहाँ स्वामीजी की तरह कोई भी आदमी फिसलकर गिर सकता है । गंगाजी के तट पर चलते-चलते मैंने भारतमाता के इस महान पुत्र को अपनी अंजलि दी ।

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