धर्मशाला को अलविदा कहने का वक्त ज्यूँ नजदीक आता गया, मैं बडी बेसब्री से उसका इन्तजार करने लगा । मैं चंपकभाई के प्रत्युत्तर की प्रतीक्षा में था । मेरा खत मिलने पर चंपकभाई से रहा नहीं गया । वे नहान से दहेरादून होकर ऋषिकेश आ पहूँचे । अँधेरी रात में उन्होंने मुझे खिडकी पर दस्तक देकर जगाया । उनका प्रेम अवर्णनिय था । स्नेह के बिना कष्ट उठाकर कौन मिलने के लिये आने की सोचेगा भला ? मैंने उनको सब घटनाक्रम से वाकिफ किया, धर्मशाला से त्यागपत्र किन हालात में दिया वो बताया ।
मेरी बात सुनकर वो बडे राजी हुए । इतना ही नहीं, उन्होंने कहा की, आप जहाँ भी जायेंगे, मैं आपके साथ चलूँगा और आपकी जितनी भी हो सके सेवा करूँगा । आप कृपया ना मत कहियेगा ।
मैंने उनको कहा, आपकी बात सराहनीय है मगर मेरा कुछ ठिकाना नहीं है । मैं कहाँ जाउँगा, क्या करूँगा, सब अनिश्चित है । संभव है की मेरे साथ आपको भुखा-प्यासा रहेना पडे, खुले पैर चलना पडे । मेरा विचार एकांत में मौन धारण करके साधना करने का है । आप श्रीमंत परिवार से हैं, मेरे साथ रहने से आपको कितनी तकलिफों का सामना करना होगा इसका आपको अंदाजा नहीं है । एक बार फिर सोच लो ।
मेरे कहने पर भी उनका निर्णय नहीं बदला । उनकी इच्छा दृढ थी । वो कहने लगे, मुझे कठिनाइयों से भरे जीवन का अनुभव है । समय के साथ चलना मुझे आता है । मैं आपके मार्ग में बाधा नहीं डालूँगा, आपको सर्व रूप से अनुकूल होने की कोशिश करूँगा । कृपया मुझे मना मत करीयेगा, मैं आपके साथ चलना चाहता हूँ ।
हमारे बिच में कुछ देर तक विभिन्न मसलों पर बहस होती रही । दूसरे दिन फिर जमकर चर्चा हुई । आखिरकार मैंने उन्हें मेरे साथ चलने की अनुमति दी । वह बहुत प्रसन्न हुए । सबसे पहले हमने देवप्रयाग जाने की तैयारी की । मेरा विचार देवप्रयाग जाकर, चक्रधरजी को मिलने के पश्चात, दशरथाचल पर्वत पर निवास करके साधना करने का था । चंपकभाई को ये बात पसंद आई इसलिए दूसरे ही दिन हम देवप्रयाग के लिये रवाना हुए । बस में बैठते वक्त मुझे त्रिकालज्ञ महात्मा पुरुष की बात याद आई । उनकी भविष्यवाणी सर्वथा सत्य सिद्ध हुई । उन्होंने कहा था कि धर्मशाला में मैं एक साल ही रह पाउँगा । मैंने चंपकभाई को जब तारीख पूछी, तो उन्होंने बताया २७ नवम्बर । बराबर एक साल पूर्व २७ नवम्बर १९४२ के दिन मैंने धर्मशाला में पाँव रक्खा था और आज २७ नवम्बर १९४३ थी । पूरा एक साल - न ज्यादा न कम । कौन कहता है कि हमारे देश में आज भी त्रिकालज्ञ और सिध्ध महापुरुष विद्यमान नहीं ? वक्त के चलते उनकी गिनती चाहे कम हो गइ हो, मगर उनका संपूर्ण लोप हुआ है एसा कहना गलत होगा । हमारे देशमें मौजूद हजारो-लाखों आम साधुओं में कई असाधारण शक्तिसंपन्न महापुरुष भी छीपे हुए है इसमें कोई दोराय नहीं । अगर उनके दर्शन की तीव्र लगन हो तो वे आज भी हमें मिल सकते है और अपने दर्शन से हमें कृतार्थ कर सकते हैं । निराश होने की कोई वजह नहीं है ।
*
ऋषिकेश से भागती हुई हमारी मोटर देवप्रयाग की ओर आगे बढ रही थी । जाड़े का वक्त था इसलिए प्रवासीओं की संख्या कुछ कम थी । मोटर की ध्वनि में मैं अपनी ध्वनि से ताल मिलाकर ॐ तत् सत् का जाप किये जा रहा था । मेरे मन में एक अजीब उल्लास था । सर्व बंधनो को छोडकर मैं अपने ध्येय को सिद्ध करने निकला था । केवल ईश्वर के आधार पर अब जिन्दगी करवट बदलनेवाली थी । मेरे जीवन का एक नया अध्याय मानो शुरु हुआ ।
ऋषिकेश में जो एक साल बीता वो मेरे लिये अत्यंत लाभप्रद सिद्ध हुआ । मैंने कई अवनवीन अनुभवों की प्राप्ति की । अब कहीं ओर नूतन अनुभव के लिये मेरा प्रवेश हो रहा था । मोटर अपनी रफ्तार से चल रही थी । मैं सोच रहा था की जिन्दगी की गाडी भी इस तरह तेजी से भाग रही है । जो वक्त कट रहा है, लौट के वापिस नहीं आनेवाला । इसलिये जितना भी हो सके, उसका सदुपयोग करके सुख, शांति और समृध्धि की प्राप्ति कर ले ।
विचारों के जोश में देवप्रयाग कब आया पता नहीं चला । चक्रधरजी हमें देखकर खुश हुए । शेठजी के साथ उनके प्रथम परिचय के बाद हम देवकीबाई धर्मशाला में एक बार मिल चुके थे । मेरे विचारों से वे अवगत थे लेकिन चंपकभाई और उनके मिलन का यह प्रथम अवसर था । चंपकभाई का स्वभाव मिलनसार और उदार था, और अपरिचित व्यक्ति के साथ मित्रता करनी उन्हें बखूबी आती थी । अतः वहाँ के नये माहौल में वे घुलमिल गये ।
एक-दो दिन ठहरकर हमने दशरथाचल जाने की तैयारी की । दशरथाचल पर रहने की तथा पानी की सुविधा नहीं थी मगर वहाँ का शांत वातावरण मेरे दिलोदिमाग में बस गया था । मुझे किसी भी हालत में दशरथाचल पर जाना था । चंपकभाईने मेरा साथ दिया । ठंड से वो डरे नहीं । देवप्रयाग के कुछ लोगों को हमारे दशरथाचल जाने की बात से हैरानी हुई और क्यूँ न हो ? एक तो मागशर मास की ठंड और सात हजार फिट की उँचाई पर रहना – यह कोई आसान काम नहीं था । पहाडों में पले-बडे हुए लोग यह सोच भी नहीं सकते थे की मैदानी इलाकों में रहनेवाले हम एसा कर पायेंगे । मगर हम अपने निर्णय में अडे रहें ।
मेरी बात सुनकर वो बडे राजी हुए । इतना ही नहीं, उन्होंने कहा की, आप जहाँ भी जायेंगे, मैं आपके साथ चलूँगा और आपकी जितनी भी हो सके सेवा करूँगा । आप कृपया ना मत कहियेगा ।
मैंने उनको कहा, आपकी बात सराहनीय है मगर मेरा कुछ ठिकाना नहीं है । मैं कहाँ जाउँगा, क्या करूँगा, सब अनिश्चित है । संभव है की मेरे साथ आपको भुखा-प्यासा रहेना पडे, खुले पैर चलना पडे । मेरा विचार एकांत में मौन धारण करके साधना करने का है । आप श्रीमंत परिवार से हैं, मेरे साथ रहने से आपको कितनी तकलिफों का सामना करना होगा इसका आपको अंदाजा नहीं है । एक बार फिर सोच लो ।
मेरे कहने पर भी उनका निर्णय नहीं बदला । उनकी इच्छा दृढ थी । वो कहने लगे, मुझे कठिनाइयों से भरे जीवन का अनुभव है । समय के साथ चलना मुझे आता है । मैं आपके मार्ग में बाधा नहीं डालूँगा, आपको सर्व रूप से अनुकूल होने की कोशिश करूँगा । कृपया मुझे मना मत करीयेगा, मैं आपके साथ चलना चाहता हूँ ।
हमारे बिच में कुछ देर तक विभिन्न मसलों पर बहस होती रही । दूसरे दिन फिर जमकर चर्चा हुई । आखिरकार मैंने उन्हें मेरे साथ चलने की अनुमति दी । वह बहुत प्रसन्न हुए । सबसे पहले हमने देवप्रयाग जाने की तैयारी की । मेरा विचार देवप्रयाग जाकर, चक्रधरजी को मिलने के पश्चात, दशरथाचल पर्वत पर निवास करके साधना करने का था । चंपकभाई को ये बात पसंद आई इसलिए दूसरे ही दिन हम देवप्रयाग के लिये रवाना हुए । बस में बैठते वक्त मुझे त्रिकालज्ञ महात्मा पुरुष की बात याद आई । उनकी भविष्यवाणी सर्वथा सत्य सिद्ध हुई । उन्होंने कहा था कि धर्मशाला में मैं एक साल ही रह पाउँगा । मैंने चंपकभाई को जब तारीख पूछी, तो उन्होंने बताया २७ नवम्बर । बराबर एक साल पूर्व २७ नवम्बर १९४२ के दिन मैंने धर्मशाला में पाँव रक्खा था और आज २७ नवम्बर १९४३ थी । पूरा एक साल - न ज्यादा न कम । कौन कहता है कि हमारे देश में आज भी त्रिकालज्ञ और सिध्ध महापुरुष विद्यमान नहीं ? वक्त के चलते उनकी गिनती चाहे कम हो गइ हो, मगर उनका संपूर्ण लोप हुआ है एसा कहना गलत होगा । हमारे देशमें मौजूद हजारो-लाखों आम साधुओं में कई असाधारण शक्तिसंपन्न महापुरुष भी छीपे हुए है इसमें कोई दोराय नहीं । अगर उनके दर्शन की तीव्र लगन हो तो वे आज भी हमें मिल सकते है और अपने दर्शन से हमें कृतार्थ कर सकते हैं । निराश होने की कोई वजह नहीं है ।
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ऋषिकेश से भागती हुई हमारी मोटर देवप्रयाग की ओर आगे बढ रही थी । जाड़े का वक्त था इसलिए प्रवासीओं की संख्या कुछ कम थी । मोटर की ध्वनि में मैं अपनी ध्वनि से ताल मिलाकर ॐ तत् सत् का जाप किये जा रहा था । मेरे मन में एक अजीब उल्लास था । सर्व बंधनो को छोडकर मैं अपने ध्येय को सिद्ध करने निकला था । केवल ईश्वर के आधार पर अब जिन्दगी करवट बदलनेवाली थी । मेरे जीवन का एक नया अध्याय मानो शुरु हुआ ।
ऋषिकेश में जो एक साल बीता वो मेरे लिये अत्यंत लाभप्रद सिद्ध हुआ । मैंने कई अवनवीन अनुभवों की प्राप्ति की । अब कहीं ओर नूतन अनुभव के लिये मेरा प्रवेश हो रहा था । मोटर अपनी रफ्तार से चल रही थी । मैं सोच रहा था की जिन्दगी की गाडी भी इस तरह तेजी से भाग रही है । जो वक्त कट रहा है, लौट के वापिस नहीं आनेवाला । इसलिये जितना भी हो सके, उसका सदुपयोग करके सुख, शांति और समृध्धि की प्राप्ति कर ले ।
विचारों के जोश में देवप्रयाग कब आया पता नहीं चला । चक्रधरजी हमें देखकर खुश हुए । शेठजी के साथ उनके प्रथम परिचय के बाद हम देवकीबाई धर्मशाला में एक बार मिल चुके थे । मेरे विचारों से वे अवगत थे लेकिन चंपकभाई और उनके मिलन का यह प्रथम अवसर था । चंपकभाई का स्वभाव मिलनसार और उदार था, और अपरिचित व्यक्ति के साथ मित्रता करनी उन्हें बखूबी आती थी । अतः वहाँ के नये माहौल में वे घुलमिल गये ।
एक-दो दिन ठहरकर हमने दशरथाचल जाने की तैयारी की । दशरथाचल पर रहने की तथा पानी की सुविधा नहीं थी मगर वहाँ का शांत वातावरण मेरे दिलोदिमाग में बस गया था । मुझे किसी भी हालत में दशरथाचल पर जाना था । चंपकभाईने मेरा साथ दिया । ठंड से वो डरे नहीं । देवप्रयाग के कुछ लोगों को हमारे दशरथाचल जाने की बात से हैरानी हुई और क्यूँ न हो ? एक तो मागशर मास की ठंड और सात हजार फिट की उँचाई पर रहना – यह कोई आसान काम नहीं था । पहाडों में पले-बडे हुए लोग यह सोच भी नहीं सकते थे की मैदानी इलाकों में रहनेवाले हम एसा कर पायेंगे । मगर हम अपने निर्णय में अडे रहें ।

