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Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

Danta Road, Ambaji 385110
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नित्यक्रम अनुसार एक दिन मैं स्नानादि से निवृत्त होकर ध्यान करने बैठा । कुछ ही क्षणों में मेरा मन एकाग्रता का अनुभव करने लगा, हालाकि शरीर का भान तब भी था । तब मानो कोई मेरे अंदर से स्पष्ट शब्दों में मुझे कहने लगा, ‘माताजी की फिकर क्यूँ करता है ? तुझे मुझ पर भरोंसा नहीं क्या ? माताजी के बारे में सोच-सोचकर तू यह सिद्ध कर रहा है कि ईश्वर की शक्ति में तेरा पूर्ण विश्वास नहीं है । जरा सोच, पूरे संसार की फिकर किसे है ? केवल मनुष्य ही नहीं, पेडपौंधो और पशुपक्षीओं को कौन सम्हालता है ? अगर ईश्वर सबकी फिकर करता है तो तूँ चिंता करके अपना वक्त क्यूँ बरबाद कर रहा है ? इस धर्मशाला के पींजर से मुक्त हो जा । अगर चाकरी करनी है, तो मेरी कर और अपने जीवन को धन्य एवं कृतार्थ कर । माताजी की चिंता मुझ पर छोड दे । मैं उन्हें सम्हालूँगा, किसी भी प्रकार की कोई तकलीफ नहीं होने दूँगा । जब तक अपने जीवननिर्वाह के लिए तू इश्वर के अलावा किसी ओर पर निर्भर है, तब तक तेरा समर्पण अधूरा है । अब विलंब न कर, सबकुछ छोडकर मेरी शरण में आ जा ।’

मानो किसीने पहेले-से लिखकर तैयार किये हो ऐसे सुस्पष्ट और असंदिग्धरूप से निकले हुए ये शब्द मैं सुनता गया । यह सब कौन कह रहा है उसके बारे में मुझे कुछ पता नहीं चला, ना ही उसके दर्शन हुए । शिवानंद आश्रम में मुझे ऐसा ही अलौकिक अनुभव मिला था । मैंने जो सुना वह मेरे मनकी धारणा या कल्पना का परिणाम नहीं था । शब्द मेरे अंतर से अपने आप फुट रहे थे । उसको प्रेरित करनेवाली शक्ति असाधारण थी । उसका किसी भी प्रकार से विरोध करने की ईच्छा नहीं हुई, मन ने साहजिक रूप से उसे स्वीकार कर लिया ।

इस अदभूत अनुभव की प्रतिक्रिया क्या हुई यह जानना चाहते हो ? जैसे ही मैने आँख खोली, सामने ही नोटबुक पडी थी । मैंने पेन उठायी और ट्रस्टीओं को अपना त्यागपत्र लिख दिया । लिखा, ‘आज से पंद्रह दिन के बाद मैं यह धर्मशाला छोडकर चला जाउँगा । अगर आपकी ईच्छा मेरे बदले में किसी ओर व्यक्ति को मेनेजर नियुक्त करने की हो, तो उसे यहाँ भेज देजियेगा । वरना मैं मेरे स्थान पर दहेरादून के एक जान-पहचानवाले गुजराती भाई को छोड जाउँगा ताकि आपको किसी भी प्रकार की दिक्कत न हो ।’

त्यागपत्र लिखने के बाद मैंने पद्मासन छोडा । मेरा निर्णय अत्यंत आकस्मिक और अहेतुक था । उसके पिछे केवल ईश्वर की ईच्छा कार्य कर रही थी अतः मेरा मन संपूर्ण शांति का अनुभव कर रहा था । आखिर सबकुछ उसकी इच्छा से तो चलता है न ?

मुझे कवि दयाराम के शब्द याद आयें –
चित्त, तुं शीदने चिंता करे, कृष्ण ने करवुं होय ते करे ।
अर्थात् हे मन, जो सर्वशक्तिमान है, वो ही सबकुछ करता है फिर तू क्यों व्यर्थ चिंता किये जा रहा है ?
*
ट्रस्टीओं को खत लिखने के पश्चात मैंने एक खत मगरस्वामी को और दूसरा चंपकभाई को लिखा और उन्हें मेरे निर्णय से अवगत किया । चंपकभाई उस वक्त नहान स्टेट में स्थित पोन्टासाहिब नामक स्थान में थे । वहाँ से उनके समाचार मुझे मिलते रहते थे । वल्लभभाई नामक एक गुजराती भाटिया सदगृहस्थ ने उनको ये स्थान बताया था । चंपकभाई वहाँ छुपकर रहते थे ।

मगरस्वामी के साथ मेरा पत्रव्यवहार जारी था । उनको मेरा यह निर्णय अच्छा नहीं लगा । उनकी इच्छा थी की मैं धर्मशाला में रहूँ । किसको पूछकर त्यागपत्र दे दिया तथा मैंने आपको धर्मशाला में रहने के लिये कहा था उस आज्ञा का उल्लंघन करके एसा क्यूँ किया - एसा उन्होंने अपने प्रत्युत्तर में लिखा था । मगर मुझे जो प्रेरणा हुई थी उसको आचार में अनुवादित करना जरूरी था, लौकिक प्रतिक्रया मेरे लिये गौण थी । किसी व्यक्ति के मार्गदर्शन का अनुसरण करने के बजाय ईश्वर की ईच्छा का पालन करना मुझे उचित लगा । ईश्वरीय आदेश की उपेक्षा करने की मुझे इच्छा नहीं थी ।

बेशक, मेरा निर्णय माताजी के लिये वज्रघात समान था मगर ईश्वर पर धीरज और श्रध्धा रखकर मुझे उसका पालन करना था । मुझे पूरा यकीन था की वह मेरा मंगल ही करेगा । माताजी के लिये यह कठिन परीक्षा की घडीयाँ थी । वो मुझ पर निर्भर थी अतः उनकी हालत का मुझे अंदाजा था । आगे चलकर, सालों तक ये परीक्षा चलती रही मगर ईश्वर की कृपा से मैं सहीसलामत पार उतरा । अब तो कई सालों से माताजी मेरे साथ रहती है । एसा कब और कैसे हुआ उसके बारे में आगे बात होगी । फिलहाल तो इतना बताना काफि होगा कि ईश्वरी प्रेरणा से मैंने जो त्यागपत्र देने का निर्णय किया वो सर्वथा सुयोग्य साबित हुआ । अगर मैं धर्मशाला में पडा रहता तो मेरा आध्यात्मिक विकास शायद न हो पाता । 

धर्मशाला के बंधन से मुक्त करके ईश्वरने मेरे जीवन-विकास के लिये मार्ग प्रशस्त कर दिया । वहाँ त्यागपत्र देने के बाद मैंने हिमालय के क्षेत्र में साधना करना प्रारंभ किया । भारत के विभिन्न प्रदेशों में घूमने का मुझे अवसर मिला । धर्मशाला में मेनेजर बनकर अगर बैठा रहता तो आध्यात्मिक विकास हो पाता मगर उसका स्वरूप कुछ कम होता । मेनेजर की नौकरी छोडने से आंतरिक त्याग के साथ बाह्य त्याग की शुरुआत हुई । मेरे ये निर्णय के पीछे ईश्वर की प्रेरणा थी इसलिए मुझे किसी भी प्रकार की हडबडाहट नहीं हुई । मन संपूर्ण शांत रहा ।

कुछ ही दिनों में मेरे खत का प्रत्युत्तर आया, जिसमें ट्रस्टीओंने मेरा त्यागपत्र स्वीकार किये जाने की बात लिखी थी ।

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