दशरथाचल का वायुमंडल अंतरग साधना के लिए अत्यंत अनुकूल था । दशरथाचल पर जाते वक्त मेरे मन में दो संकल्प थे - एक तो यह की ईश्वर के साकार स्वरूप में दर्शन हो और दूसरा, समाधि अवस्था का अनुभव करना । इन संकल्पो की पूर्ति के लिए जी-जान से प्रयास करना और इनमें से किसी एक संकल्प की पूर्ति होने पर ही वहाँ से नीचे उतरना । मैं जानता था की संकल्पपूर्ति के लिए असाधारण साधनाभ्यास आवश्यक था मगर सिद्धि और शांति की संप्राप्ति के लिये कुछ भी करने की मेरी तैयारी थी । पिछले एक साल से ऋषिकेश मैं हुई साधना के कारण मेरा हौसला बुलंद था ।
दशरथाचल पर आकर मैंने अपने वस्त्र निकाल दिये और मात्र लंगोटी पहनकर रहेना शुरू किया । पानी की सुविधा न होने के कारण हररोज कपडे धोना संभव नहीं था । सर्दीयों का मौसम था इसलिये लंगोटी पहनकर रहना मुश्किल था मगर पर्वत पर सूर्यकिरणों का लाभ विपुल मात्रा में मिलता था इसलिये मुझे विशेष चिंता नहीं थी । बिछाने के लिये मेरे पास एक मृगचर्म और शेतरंजी थी । ओढने के लिये चक्रधरजी का दिया हुआ कंबल था । रात को ज्यादातर बैठकर ध्यान करने का मेरा नियम था । पूरी रात मैं कंबल ओढकर ध्यान में बैठा रहता था । ठंड बहुत ज्यादा होने के कारण सोने की ईच्छा नहीं होती थी । ध्यान में इतना आनंद मिलता था की रात कब बितती इसका पता भी नहीं चलता था ।
मेरे साथ रहना चंपकभाइ के लिए कठिन परीक्षा समान था । उनको ठंड ज्यादा लगती थी और उनके पास ठंड से बचने के लिए जरूरी गर्म वस्त्र नहीं थे । जेल से भागकर वे हिमालय आये थे, इसलिये उनके पास पहनने-ओढने के जरूरी वस्त्रों का अभाव था । गर्म कपडे में उनके पास सिर्फ एक कानटोपी और कंबल था । चक्रधरजीने उनको एक लंबा गर्म कोट दिया था जिससे उनका काम चल जाता था । दिन का सारा वक्त वो धूप में बैठे रहते थे । मुझे साधना में निमग्न देखकर उन्हें भी साधना की अभिरुचि हुई थी । अपने हिसाब से वे जप और प्रार्थना करके खुशी से अपना दिन बिताते थे । शुरू में मुझे लगा कि शायद उनको पहाड पर रहना पसंद नहीं आयेगा और कुछ ही दिनों में मुझे चोटी से नीचे उतरकर जाना पडेगा, मगर मैं गलत निकला । उनकी सहनशक्ति, हिंमत और धीरज मेरी धारणा से कहीं ज्यादा थी । वे बिना कीसी फरियाद मेरे साथ रहें और मुझे पूर्ण सहयोग प्रदान किया ।
दशरथाचल आकर मैंने मौनव्रत आरंभ किया इसलिए चंपकभाई की दिक्कतें ओर बढी । पर्वत पर हमारे दोनों के अलावा ओर कोई नहीं था । वे अगर बात करना चाहें भी तो किससे करें ? मैं कभीकभा उनके साथे इशारे-से बात करता, कभी एक-दो शब्द का उच्चारण करता । यद्यपि चंपकभाई के लिये मौन साहजिक हो गया । मैंने अपना पूरा समय और शक्ति साधनाकार्य में जोडने का निश्चय किया था । जितना भी हो सके, मन को ध्यान, जप एवं प्रार्थना में पिरोकर, मुझे उच्चोच्च साधनात्मक अनुभवों की प्राप्ति करनी थी । चंपकभाई के लिये भले ही परीक्षारूप हो, मगर मेरे लिये मौन बिल्कुल सहज हो गया ।
पर्वत पर रहने के लिये जो मकान था वो काफि पुराना और बिल्कुल साधारण था । मकान में कुल मिलाकर तीन कमरे थे – जिनमें से एक में मकानमालिक का सामान पडा था और दो कमरे हमारे लिये खुले थे । एक में मैं रहता था और दूसरे में चंपकभाई । कमरे के द्वार बिल्कुल तकलादी थे । यहाँ रात को अकेले रहना अपने आप में साहस था । पर्वत पर काफि सारे बाघ और भालु रहते थे । उन्हें हमारे जैसे अतिथी को मिलने की इच्छा होना बिल्कुल स्वाभाविक था । कई दफा रात को कमरे के बाहर जंगली जनावरों की हिलचाल सुनाई देती थी । चंपकभाइ मुझे उनके बारे में अक्सर बताते मगर वे बहादुर थे इसलिये डरते नहीं थे । मैं भी उनका हौंसला बढाने के लिये कहता, 'हम यहाँ केवल इश्वर के आधार पर बैठे हैं । इश्वर की पक्की इच्छा है इसलिये हम इतनी सारी मुसीबतों के बिच सुरक्षित और निश्चिंत होकर रह सकते हैं । इश्वर हमारी रक्षा करता है और हमेशा करेगा अतः डरने की कोई वजह नहीं है । हमें किसी प्राणी से द्वेष नहीं है । वे हमारे साथ दुश्मन जैसा बर्ताव क्यूँ करेंगे ? वे हमें नुकसान क्यूँ पहूँचायेंगे ?'
पर्वत पर पानी की समस्या थी उसका उल्लेख मैंने आगे कर दिया है । ठंड की वजह से हम पूर्ण स्नान के बजाय केवल पंचस्नान से अपना काम चलाते थे । यूँ तो दशरथाचल पर वायुस्नान ही काफि था । खानेपीने के लिये जो पानी की जरूरत पडती वो हम झरनें से ले आते थे । सप्ताह में एक दफा पर्वतीय लडका देवप्रयाग से हमारे लिये आवश्यक साधनसामग्री लेकर आता था । वो पानी भरने में हमारी मदद करता था । पानी भरने के लिये मकान में फालतू डिब्बे पडे थे उसीसे काम चल जाता था । भोजन बनाने का कार्य चंपकभाइ ने सम्हाला था । वे भोजन पकाने में माहिर तो नहीं थे मगर इतने बुरे भी नहीं थे । ज्यादातर हम खीचडी पकाते थे । कभीकभा भाखरी के साथ शीरा बनता था । कोई दफा रात को राब बनाकर लेते थे । पर्वत पर दाल, सब्जी या आचार की सुविधा नहीं थी अतः जो भी पकाते उसे यूँ ही खा लेते थे ।
सुबह धूप निकलने पर हम मकान से बाहर निकलते । मैं टेकरी पर जाकर ध्यान करता और चंपकभाइ अपनी रीते से जप-ध्यान करते । दुपहर को वे खाना पकाते । कई दफा मैं ध्यान में इतना डूब जाता की घन्टो तक उठने का मन ही नहीं करता । कुछ दिनों के अभ्यास के बाद, ध्यान करते-करते मेरा देहाध्यास चला जाता था और ऐसी अवस्था में मैं घण्टों बैठा रहता । चंपकभाइ तब भी खाना पकाकर मेरा इन्तजार करते । कई दफा खाना लेकर मेरे पास आकर मेरा ध्यान पूर्ण होने की प्रतीक्षा करते । ध्यान छुटने पर हम साथ में खाना खाते थे । मैं उनको कहता, खाने के लिये मेरा इन्तजार मत करो । मेरे लिये थोडा खाना छोडकर आप खा लो ।
मगर वे हमेशा मेरा इन्तजार करते थे । अकेला खाने का उनको कभी मन नहीं हुआ । मेरे लिये उनके दिल में असाधारण प्यार था । आज उन दिनों को याद करके मैं एक अजीब संवेदन महसूस करता हूँ । मेरा हृदय भावविभोर हो जाता है । चंपकभाईने जो प्यार से उन दिनों में मेरी सेवा की वो मुझे सदैव याद रहेगी । चंपकभाई को जो आर्थिक मदद मिलती थी उसमें से हम दोनों का गुजारा होता था । मेरे जीवनप्रवाहों का सूक्ष्म निरीक्षण करने का उन्हें सुनहरा अवसर मिला । मेरे साधनात्मक जीवन के वे एकमात्र चश्मदीद गवाह हुए । हमारा प्रेम उत्तरोत्तर बढता चला । साधना करते हुए मुझे जो अलौकिक अनुभवों की प्राप्ति हुई, मैं उनको बताता था । इससे उनका आनंद दुगुना हो जाता था ।
दोपहर के बाद मैं फिर से ध्यान में बैठता, तकरीबन तीन घंटे जप के साथ ध्यान करता । शाम को हम थोडा घूमने जाते । फिर सूरज ढलते हुए प्रार्थना करके कमरे में बैठते थे । पर्वत पर चीड का जंगल था । उनकी लकडीयों को जलाकर ठंडी भगाने की कोशिश करते । मकान बहुत पुराना था और उसकी जमीन भेजग्रस्त थी, जिसके कारण वहाँ पीस्सु नाम के छोटे-छोटे जंतु होते थे । उससे बचने के लिये चंपकभाईने टीन के डिब्बें पर लकडे का दरवाजा रखकर बिस्तर किया था । उन दिनों का जीवन बडा कष्टप्रद था ।
ऋषिकेश का त्याग करने के बाद मेरा मन पूर्णतया साधना में लगा था इसलिये मैंने खत लिखना छोड दिया था । मेरी ओर से माताजी और नारायणभाई को पत्र लिखने का काम भी चंपकभाईने सम्हाला था । मेरी प्रगति से माताजी और नारायणभाई को खुशी होती थी । चंपकभाई की वह सेवा अमूल्य थी ।
दशरथाचल पर आकर मैंने अपने वस्त्र निकाल दिये और मात्र लंगोटी पहनकर रहेना शुरू किया । पानी की सुविधा न होने के कारण हररोज कपडे धोना संभव नहीं था । सर्दीयों का मौसम था इसलिये लंगोटी पहनकर रहना मुश्किल था मगर पर्वत पर सूर्यकिरणों का लाभ विपुल मात्रा में मिलता था इसलिये मुझे विशेष चिंता नहीं थी । बिछाने के लिये मेरे पास एक मृगचर्म और शेतरंजी थी । ओढने के लिये चक्रधरजी का दिया हुआ कंबल था । रात को ज्यादातर बैठकर ध्यान करने का मेरा नियम था । पूरी रात मैं कंबल ओढकर ध्यान में बैठा रहता था । ठंड बहुत ज्यादा होने के कारण सोने की ईच्छा नहीं होती थी । ध्यान में इतना आनंद मिलता था की रात कब बितती इसका पता भी नहीं चलता था ।
मेरे साथ रहना चंपकभाइ के लिए कठिन परीक्षा समान था । उनको ठंड ज्यादा लगती थी और उनके पास ठंड से बचने के लिए जरूरी गर्म वस्त्र नहीं थे । जेल से भागकर वे हिमालय आये थे, इसलिये उनके पास पहनने-ओढने के जरूरी वस्त्रों का अभाव था । गर्म कपडे में उनके पास सिर्फ एक कानटोपी और कंबल था । चक्रधरजीने उनको एक लंबा गर्म कोट दिया था जिससे उनका काम चल जाता था । दिन का सारा वक्त वो धूप में बैठे रहते थे । मुझे साधना में निमग्न देखकर उन्हें भी साधना की अभिरुचि हुई थी । अपने हिसाब से वे जप और प्रार्थना करके खुशी से अपना दिन बिताते थे । शुरू में मुझे लगा कि शायद उनको पहाड पर रहना पसंद नहीं आयेगा और कुछ ही दिनों में मुझे चोटी से नीचे उतरकर जाना पडेगा, मगर मैं गलत निकला । उनकी सहनशक्ति, हिंमत और धीरज मेरी धारणा से कहीं ज्यादा थी । वे बिना कीसी फरियाद मेरे साथ रहें और मुझे पूर्ण सहयोग प्रदान किया ।
दशरथाचल आकर मैंने मौनव्रत आरंभ किया इसलिए चंपकभाई की दिक्कतें ओर बढी । पर्वत पर हमारे दोनों के अलावा ओर कोई नहीं था । वे अगर बात करना चाहें भी तो किससे करें ? मैं कभीकभा उनके साथे इशारे-से बात करता, कभी एक-दो शब्द का उच्चारण करता । यद्यपि चंपकभाई के लिये मौन साहजिक हो गया । मैंने अपना पूरा समय और शक्ति साधनाकार्य में जोडने का निश्चय किया था । जितना भी हो सके, मन को ध्यान, जप एवं प्रार्थना में पिरोकर, मुझे उच्चोच्च साधनात्मक अनुभवों की प्राप्ति करनी थी । चंपकभाई के लिये भले ही परीक्षारूप हो, मगर मेरे लिये मौन बिल्कुल सहज हो गया ।
पर्वत पर रहने के लिये जो मकान था वो काफि पुराना और बिल्कुल साधारण था । मकान में कुल मिलाकर तीन कमरे थे – जिनमें से एक में मकानमालिक का सामान पडा था और दो कमरे हमारे लिये खुले थे । एक में मैं रहता था और दूसरे में चंपकभाई । कमरे के द्वार बिल्कुल तकलादी थे । यहाँ रात को अकेले रहना अपने आप में साहस था । पर्वत पर काफि सारे बाघ और भालु रहते थे । उन्हें हमारे जैसे अतिथी को मिलने की इच्छा होना बिल्कुल स्वाभाविक था । कई दफा रात को कमरे के बाहर जंगली जनावरों की हिलचाल सुनाई देती थी । चंपकभाइ मुझे उनके बारे में अक्सर बताते मगर वे बहादुर थे इसलिये डरते नहीं थे । मैं भी उनका हौंसला बढाने के लिये कहता, 'हम यहाँ केवल इश्वर के आधार पर बैठे हैं । इश्वर की पक्की इच्छा है इसलिये हम इतनी सारी मुसीबतों के बिच सुरक्षित और निश्चिंत होकर रह सकते हैं । इश्वर हमारी रक्षा करता है और हमेशा करेगा अतः डरने की कोई वजह नहीं है । हमें किसी प्राणी से द्वेष नहीं है । वे हमारे साथ दुश्मन जैसा बर्ताव क्यूँ करेंगे ? वे हमें नुकसान क्यूँ पहूँचायेंगे ?'
पर्वत पर पानी की समस्या थी उसका उल्लेख मैंने आगे कर दिया है । ठंड की वजह से हम पूर्ण स्नान के बजाय केवल पंचस्नान से अपना काम चलाते थे । यूँ तो दशरथाचल पर वायुस्नान ही काफि था । खानेपीने के लिये जो पानी की जरूरत पडती वो हम झरनें से ले आते थे । सप्ताह में एक दफा पर्वतीय लडका देवप्रयाग से हमारे लिये आवश्यक साधनसामग्री लेकर आता था । वो पानी भरने में हमारी मदद करता था । पानी भरने के लिये मकान में फालतू डिब्बे पडे थे उसीसे काम चल जाता था । भोजन बनाने का कार्य चंपकभाइ ने सम्हाला था । वे भोजन पकाने में माहिर तो नहीं थे मगर इतने बुरे भी नहीं थे । ज्यादातर हम खीचडी पकाते थे । कभीकभा भाखरी के साथ शीरा बनता था । कोई दफा रात को राब बनाकर लेते थे । पर्वत पर दाल, सब्जी या आचार की सुविधा नहीं थी अतः जो भी पकाते उसे यूँ ही खा लेते थे ।
सुबह धूप निकलने पर हम मकान से बाहर निकलते । मैं टेकरी पर जाकर ध्यान करता और चंपकभाइ अपनी रीते से जप-ध्यान करते । दुपहर को वे खाना पकाते । कई दफा मैं ध्यान में इतना डूब जाता की घन्टो तक उठने का मन ही नहीं करता । कुछ दिनों के अभ्यास के बाद, ध्यान करते-करते मेरा देहाध्यास चला जाता था और ऐसी अवस्था में मैं घण्टों बैठा रहता । चंपकभाइ तब भी खाना पकाकर मेरा इन्तजार करते । कई दफा खाना लेकर मेरे पास आकर मेरा ध्यान पूर्ण होने की प्रतीक्षा करते । ध्यान छुटने पर हम साथ में खाना खाते थे । मैं उनको कहता, खाने के लिये मेरा इन्तजार मत करो । मेरे लिये थोडा खाना छोडकर आप खा लो ।
मगर वे हमेशा मेरा इन्तजार करते थे । अकेला खाने का उनको कभी मन नहीं हुआ । मेरे लिये उनके दिल में असाधारण प्यार था । आज उन दिनों को याद करके मैं एक अजीब संवेदन महसूस करता हूँ । मेरा हृदय भावविभोर हो जाता है । चंपकभाईने जो प्यार से उन दिनों में मेरी सेवा की वो मुझे सदैव याद रहेगी । चंपकभाई को जो आर्थिक मदद मिलती थी उसमें से हम दोनों का गुजारा होता था । मेरे जीवनप्रवाहों का सूक्ष्म निरीक्षण करने का उन्हें सुनहरा अवसर मिला । मेरे साधनात्मक जीवन के वे एकमात्र चश्मदीद गवाह हुए । हमारा प्रेम उत्तरोत्तर बढता चला । साधना करते हुए मुझे जो अलौकिक अनुभवों की प्राप्ति हुई, मैं उनको बताता था । इससे उनका आनंद दुगुना हो जाता था ।
दोपहर के बाद मैं फिर से ध्यान में बैठता, तकरीबन तीन घंटे जप के साथ ध्यान करता । शाम को हम थोडा घूमने जाते । फिर सूरज ढलते हुए प्रार्थना करके कमरे में बैठते थे । पर्वत पर चीड का जंगल था । उनकी लकडीयों को जलाकर ठंडी भगाने की कोशिश करते । मकान बहुत पुराना था और उसकी जमीन भेजग्रस्त थी, जिसके कारण वहाँ पीस्सु नाम के छोटे-छोटे जंतु होते थे । उससे बचने के लिये चंपकभाईने टीन के डिब्बें पर लकडे का दरवाजा रखकर बिस्तर किया था । उन दिनों का जीवन बडा कष्टप्रद था ।
ऋषिकेश का त्याग करने के बाद मेरा मन पूर्णतया साधना में लगा था इसलिये मैंने खत लिखना छोड दिया था । मेरी ओर से माताजी और नारायणभाई को पत्र लिखने का काम भी चंपकभाईने सम्हाला था । मेरी प्रगति से माताजी और नारायणभाई को खुशी होती थी । चंपकभाई की वह सेवा अमूल्य थी ।

