Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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Gujarat INDIA
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धर्मशाला के निवास दौरान जो भी वक्त मिला, उसे साधना में व्यतीत करने का मैंने भरपूर प्रयास किया । उन दिनों मेरा मन विशेषतः जप करने में लगा था । दिन का काफि हिस्सा मैं जप करने में व्यतीत करता था । जप करने से कई फायदें होते है और अंततः सिद्धि-प्राप्ति होती है एसा मैने पढा था ।

देवकीबाई धर्मशाला में करीब तीन-चार मास गुजर जाने के बाद मेरा मन थोडा अस्वस्थ रहने लगा । धर्मशाला का विपरित वातावरण या साधना पथ की कठिनाईयों का मन में उठा खयाल उसके लिए जिम्मेदार था । उन दिनों मेरा परिचय एक योगी पुरुष से हुआ । उन्होंने मुझे हररोज एक हजार गायत्रीमंत्र का जप करने के लिए कहा । मैंने उनका कहना मानकर उनकी सलाह का अमल किया । मेरे आश्चर्य और आनंद के बीच मेरा मन स्थिर होता चला । मेरे मन में नविन आशा और उत्साह का संचार हुआ । अब तक मैंने केवल जप की महिमा के बारे में सुना था मगर जात-अनुभव के बाद मुझे यकीन हो गया ।

अकेला रहने की मुझे आदत थी मगर खाना पकाने का मेरे लिए यह पहेला मौका था । धर्मशाला में आने से पहले मुझे पाकशास्त्र का कोई अनुभव नहीं था । रोटी बुनने या कडछी पकडकर खाना पकाने में मै माहिर नहीं था मगर मैंने प्रयोग करना शुरु किया । धर्मशाला में रहनेवाली बहनें खाना पकाने के बारे में मुझे मार्गदर्शन देती थी, जिससे मेरा काम आसान होता चला । कुछ ही दिनो में मै अपने लिए खानेलायक भोजन पकाने लगा । हाँ, किसी और को खिला सकूँ एसा स्वादिष्ट पकाने की विद्या हस्तगत करते हुए मुझे काफि वक्त लगा ।

चूँ कि मैं ट्रस्टीयों का भेजा हुआ आदमी था इसलिए लक्ष्मीबाई मेरी किसी भी प्रकार से सहायता करने के लिए राजी नहीं थी । वो मुझे अपना दुश्मन समझती थी और जो मन में आए वो गालियाँ देती थी । वो हमेशा मुझे परेशान करने के तरीके ढूँढती रहती ताकि मैं धर्मशाला छोडकर भाग जाउँ । ट्रस्टीयों को यहाँ की परिस्थिति के बारे में पूर्णतया अवगत कराने के अलावा मेरे पासे ओर कोई चारा नहीं था । मैं समझता था कि लक्ष्मीबाई को मेरा धर्मशाला में रहना कतै पसंद नहीं है मगर अपनी जिम्मेदारीओं के आगे मैं लाचार था । इस दुविधा के सुखद अंत के लिए मैं हररोज ईश्वर से प्रार्थना करता था । साथ में ये भी खयाल रखता था कि लक्ष्मीबाई प्रति मेरे मन में कोई प्रतिशोध की भावना हो । यहाँ तक की हप्ते में एक बार मैं लक्ष्मीबाई को मिलकर प्यार से समझाने की कोशिश करता । मै कहता, मेरे यहाँ आने से आपको कष्ट होता है, यह मैं समझ सकता हूँ, मगर मैं लाचार हूँ । मुझे ट्रस्टीयों की आज्ञानुसार व्यवहार करना पडता है । मेरे कारण आपको जो परेशानी हो रही है, उसके लिए मैं आपकी माफि चाहता हूँ ।

कुछ पल के लिए लक्ष्मीबाई को मेरी बात सुनकर अच्छा लगता, मगर बाद में अपने स्वभाववश होकर वे मुझे गालिगलोच देना शुरु कर देती । उसकी ढेरों गालियाँ खाने पर भी मैंने कभी प्रत्युत्तर में उसको कुछ नहीं कहा । मेरे लिए तो उसकी गालियाँ ईश्वर की ओर से ली जानेवाली सहनशक्ति की परीक्षा थी ।

एक दफा लक्ष्मीबाई आवेश में आकर बहुत कुछ बोलने लगी तो चंपकभाई से रहा नहीं गया । वो लक्ष्मीबाई को प्रत्युत्तर देने के लिए तैयार हो गये तब मैंने उनको ईशारे से रोक लिया । उन दिनों मैं मौनव्रत धारण करता था इसका उल्लेख मैंने आगे कर दिया है । हाँ, चंपकभाई के बारे में बताना मैं भूल गया ।

चंपकभाई से मेरा प्रथम परिचय स्वर्गाश्रम में हुआ । वहाँ वटवृक्ष के नीचे जयदयाल गोयन्काजी का सत्संग चलता था । मैं कभी कभी वहाँ जाता था । एक बार सत्संग खत्म होने पर मैं कुछ गुजराती भाईयों से बातें कर रहा था, तब किसीने मेरी पहेचान उनसे करवाई । मेरी छोटी उम्र देखकर चंपकभाई को जिज्ञासा हुइ । उन्होंने मुझे कुछ प्रश्न पूछे, जिसका मैंने प्यार से उत्तर दिया । जब शाम होने पर मैं अपने निवासस्थान पर लौट रहा था तब वो आकर मुझे मिले और मेरे साथ आने लगे । बाजार से गुजरकर हम धर्मशाला पर आये । वहाँ उन्होंने मेरी रोजनिशी पढी । जब निकलने का वक्त आया तो उन्होंने मेरे साथ रहने की इच्छा व्यक्त की ।

मैंने साफ कहा, आप अगर मेरे साथ रहेना चाहो तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है मगर मेरे साथ रहने में आपको मजा नहीं आयेगा । दिन का ज्यादातर वक्त मैं साधना में बिताता हूँ । सप्ताह में दो दिन मौन रखता हूँ । हररोज दोपहर को दो बजे से लेकर पाँच बजे तक जप करता हूँ, और उस वक्त कमरे की खिडकियाँ बन्द रखता हूँ । उस वक्त अगर आप चाहे तो कमरे में बैठ सकते हो या कहीं बाहर जा सकते हो । इतना कुछ सुनने के बाद अगर आपको लगता है कि मेरे साथ रहना आपको पसन्द आयेगा तो आपका स्वागत है ।

मेरी बात सुनकर वह प्रसन्न हुए । उन्होंने भगवान आश्रम में एक कमरा किराये पर लिया था । शुरु के दिनों में वो दिन का काफि वक्त मेरे साथ गुजारते थे और रात होने पर अपने कमरे में जाकर सो जाते थे । भोजन हम साथ में पकाते थे । वो मुझे हो सके उतनी सहायता पहूँचाने की कोशिश करते थे । जब मैं जप करने के लिए बैठता तो वो राधाकृष्ण की छबी के सामने बैठकर जप करने का प्रयास करते थे । वक्त गुजरते हमारा प्यार बढता चला ।

जान-पहचान बढने से हम एक-दूसरे को अच्छी तरह समझने लगे । चंपकभाई का स्वभाव शांत और परगजु था । वो किसी भी व्यक्ति से बहुत जल्दी मित्रता कर सकते थे । अनजान लोगों से बात करने में और स्नेहसंबंध प्रस्थापित करने में उनको कोई दिक्कत नहीं आती थी । सौराष्ट्र के देशी राज्यों की आझादी की लडाई में उन्होंने अहम भूमिका निभाई थी । सन 1942 की भारत छोडो लडाई में वो बंबई में पकडे गये थे । कुछ अरसे बाद बडी हिम्मत से दिनदहाडे जेल से वो भाग निकले थे । इससे वाचको को उनके हिम्मत और साहस का अंदाजा होगा । तीस-बत्तीस साल की उम्र में उन्होंने बहुत सारी दुनिया देख ली थी । बंबई जेल से बाहर निकलने के बाद अपने किसी मित्र की सलाह पर वो मसूरी के लिए रवाना हुए मगर मसूरी के बजाय ऋषिकेश आ पहूँचे । कृश तन और खादीवस्त्र-धारी नवयुवक को मिलकर मुझे हर्ष हुआ । चंपकभाई में आदर्श मानव के लक्षण दिखाई देते थे । उनके स्नेही तथा मित्र उनकी आर्थिक जिम्मेवारी निभाते थे । वे उन्हें नियमित रूप से पैसे भेजते थे इसलिए कई ओर लोगों की तरह चंपकभाई को आर्थिक चिंता नहीं सताती थी । ईश्वरने किसी खास हेतु से उन्हें मेरे पास भेज दिया था । शायद ईश्वर की मरजी उनके सुषुप्त आध्यात्मिक संस्कारो का संवर्धन करने की और  उन्हें अवनविन अनुभव देने की थी ।