महुवा में जब मेरे उपवास चल रहे थे, तो एक भाई ने प्रश्न किया, 'जिसको इश्वर-दर्शन हो चुका है, उसे उपवास करने की क्या जरूरत ?'
मैंने कहा: 'ईश्वरदर्शन के बाद, साधना को अगले मुकाम पर ले जाने के लिये उपवास करने पडते है । साधक किस कारण से उपवास का आधार लेता है ये समजना आम आदमी की समज से बाहर होता है ।'
'तो क्या इश्वरदर्शन के बाद भी कुछ पाना बाकी रहता है ? हमारे शास्त्रों में तो बताया गया है की इश्वरदर्शन के बाद कुछ करना शेष नहीं रहता । क्या ये बात गलत है ?'
मैंने कहा: 'शास्त्रों की बात गलत नहीं है मगर उसे ठीक तरह से समजने की आवश्यकता है । इश्वर का दर्शन करना एक बात है और स्वयं इश्वररूप होना दूसरी बात है । इश्वदर्शन के कई प्रकार है । मेरे अनुभव के आधार पर मैं इसे पाँच प्रकारों में बाँटना चाहूँगा । इन सभी प्रकारों से गुजरने के लिये उसे उपवास या अन्य साधन की जरुरत पडती है । और यही कारण है की इश्वरदर्शन के बाद भी साधना शेष रहती है । ये भी सही है की बहुत कम साधक इन पाँचों प्रकार के अनुभव मिलने तक साधनारत रहते है ।
जागृति या समाधि दशा में जिस तरह सिद्ध महापुरुषों का दर्शन होता है, उसी तरह इश्वर का दर्शन होता है । दोनों प्रकार के दर्शनानुभव मिलने पर साधक को आनंद और शांति का अनुभव होता है । पाठकों को समजने में आसानी हो, इसलिये हम यहाँ सिद्धपुरुषों के दर्शन का विचार करेंगे ।
प्रथम प्रकार में साधक को केवल सिद्ध का दर्शन होता है, उससे किसी प्रकार की कोई बातचीत नहीं होती । एसा दर्शन सिद्धपुरुष की मरजी से, वो जब और जैसे चाहे, इतना और एसा ही होता है ।
अगर साधक इससे तृप्त नहीं होता और अधिक साधना करता है तो वो दूसरे प्रकार का दर्शन पा सकता है । इसमें सिद्धपुरुष के दर्शन का लाभ तो मिलता ही है, साथ में उनके साथ बातचीत होती है । मगर वार्तालाप की अवधि तथा प्रकार सिद्धपुरुष की इच्छा पर निर्भर करता है । साधक अपनी मरजी से और मनचाहे विषय पर बात नहीं कर सकता । इससे साधक के प्रश्न तथा मन की इच्छाएँ अधूरी रह जाती है ।
तीसरे प्रकार के दर्शन में सिद्ध महापुरुष के दर्शन होते है और उनके साथ इच्छानुसार वार्तालाप करने का मौका मिलता है ।
चौथे प्रकार की अनुभूति में सिद्धपुरुष के संस्पर्श का लाभ मिलता है । साथ में सिद्ध पुरुष के आशीर्वाद या वरदान की प्राप्ति होती है । अगर इससे भी साधक को संतुष्टि नहीं होती, और वो कामना करता है की जब भी जी करे वो उनके दर्शन कर सके तब जाकर पाँचवे प्रकार की अनुभूति मिलती है ।
पाँचवे प्रकार में वो अपनी मरजी से उनका दर्शन कर सकता है, उनसे वार्तालाप कर सकता है तथा उनके संस्पर्श का अनुभव कर सकता है ।
मैंने जो कुछ सिद्धपुरुषों के दर्शन के बारे बताया वो इश्वरदर्शन के लिये लागू होता है । अनुभूति की अंतिम अवस्था में साधक जब भी जी चाहे इश्वर का दर्शन कर सकता है या यूँ कहो की उसे निरंतर इश्वर का दर्शन होता है ।
ज्यादातर साधक प्रथम प्रकार की अनुभूति से संतुष्ट हो जाते है और अपने आपको सिद्ध मानने लगते है । बहुत कम साधक इन सभी भूमिकाओं से गुजरकर अंतिम अवस्था तक पहूँच पाते है । अगर प्रथम प्रकार का दर्शन मिलने पर साधक को अवर्णनीय आनंद की अनुभूति होती है तो अन्य प्रकार के दर्शन मिलने पर उसे कैसा आनंद मिलता होगा उसकी कल्पना ही करनी होगी । यह साधक को तय करना होगा की उसे किस प्रकार का दर्शनानुभव मिलता है । विवेकी साधक अंतिम प्रकार की अनुभूति मिलने तक साधनारत रहता है और स्वयं इश्वरतुल्य बन जाता है ।’
मेरे यह विवरण से प्रश्न करनेवाले भाई के मन की शंका का समाधान हुआ । जो अपने मन को खुला रखता है, वो एसी जानकारी हासिल करके खुश क्यों नहीं होगा ?

