माताजी को ताराबेन की प्रसूति के लिये सरोडा जाना पडा । माताजी गयी उसके एक सप्ताह बाद नवरात्री का प्रारंभ हुआ । पिछले कुछ सालों की तरह इस बार भी मैंने माँ की कृपा के लिये अनशन रक्खा और प्रार्थनाएँ की । उन दिनों के मेरे मनोभाव तथा बेचैनी का विवरण मैं पूर्व प्रकरणों में दे चूका हूँ । नवरात्री के दिनों में मेरे साथ मेरे सहाध्यायी, भाई जमनाशंकर थे, जो की बंबई से ऋषिकेश आये थे । दोपहर में एक से चार के बीच वो मेरे पास आकर चंडीपाठ करते थे । इससे दोपहर का वक्त आसानी से गुजर जाता था । अनशन के दिनों में दोपहर का वक्त गुजारना मुश्किल होता है । अनशन के साथ मौन रखने से राहत मिलती है, इसलिये मैंने पूर्णिमा तक मौनव्रत रक्खा था । अनशन माँ की मरजी से हो रहे थे, इसलिये आवश्यक शक्ति माँ ही दे रही थी । मुझे लगा था की पूनम तक मेरा काम बन जायेगा मगर माँ की मरजी कुछ और थी । पूर्णिमा के बाद भी अनशन जारी रहा । फर्क सिर्फ इतना था की अब मैं पानी की जगह दूध लेता था । चूँ की दूध मैं बहुत कम लेता था, शारीरिक कमजोरी महेसूस होती थी । अब ठंड बढने लगी थी । माताजी नहीं होने के कारण वस्त्र धोना, कचरा-पोता करना, बर्तन मांजना आदि काम मुझे करने पडते थे । फिर भी, साधना की लगन लगी थी इसलिये तकलिफों को नजरअंदाज करके मैं ये सब खुशीखुशी करता रहा ।
माँ की मरजी से भरत मंदिर के पावन स्थान में अनशन शुरु हुआ । अनशन के ४१ वे दिन, कार्तिक सुद ग्यारस शनिवार को मैं दहेरादून गया । दहेरादून से तीन मिल की दूरी पर कोलागढ है । यहाँ के पटवारीभाई श्री मनमोहनलाल का बहुत आग्रह था । हमारी भेंट ऋषिकेश में हुई थी और फिर परिचय प्रगाढ होता चला था । माँ की इच्छा हमेशा मंगल होती है, यह मानकर मैं अनशन के दिनों में कोलागढ गया । यहाँ ऋषिकेश के मुकाबले ठंड कम थी । रहने के लिये घर से अलग एकांत कमरा था । मकान के आसपास खुला मैदान था, जहाँ दिनभर धूप रहती थी । सुबह नौ से शाम साडे चार बजे तक मैं धूप में खाट लगाकर बैठा रहता था । कोलागढ का प्रदेश पवित्र माना जाता है, कहते है की यहाँ द्रोणाचार्य ने तप किया था ।
कोलागढ में अनशन का दौर जारी रहा । एक तरफ विरह की वेदना थी, तो दूसरी और अनशन का कष्ट । इसके बावजूद मन में आशा थी इसलिये वक्त कटता रहा । इतने सारे अनशन करने का जीवन में यह प्रथम अवसर था । इससे मेरा शरीर काफि कमजोर हो गया । इन दिनों मानो निंद्रा-जय हो गया था । मुझे हो रहे कष्ट की तुलना में मिलनेवाला लाभ कई गुना अधिक था इसलिये मैं हँसते-हँसते सब सहता रहा और अनशन करता रहा ।
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माँ की प्रेरणा मिलने पर २७ नवम्बर, १९५४ शनिवार के दिन मैं दहेरादून से निकलकर महेसाणा गया । अनशन के कारण मुसाफरी करने में थोडी दिक्कत हुई । स्टेशन पर मुझे लेने नारायणभाई आये थे । उनकी यहाँ माहिती अधिकारी के तौर पर नियुक्ति हुई थी । उनका प्रेमभाव अदभुत था । वो मेरी साधना को काफि हद तक समजते थे । मैं भी उनको अपनी साधनात्मक गतिविधि से वाकिफ रखता था । साधना करनेवाले लोगों को सहानुभूतिपूर्वक समजनेवाले लोग आसानी से नहीं मिलते ।
कमजोरी बढती जा रही थी फिर भी माँ की मरजी थी इसलिये यहाँ मेरा अनशन जारी रहा । गुजरात आने से एक लाभ हुआ, ऋषिकेश के मुकाबले यहाँ ठंड कम थी ।
महेसाणा में कुल मिलाकर ३४ दिन रहा फिर महुवा गया । यहाँ तीन दिन अनशन करने के बाद चौथे दिन माँ की इच्छा से अनशन की पूर्णाहूति हुई । इस प्रकार नवरात्री से लेकर पूरे १०१ दिन तक अनशन किया । बीच में छे दिन, कोलागढ में, माँ की प्रेरणा से भोजन लिया था । इतने लंबे अरसे तक अनशन करने का जीवन में यह पहला अनुभव था । अनशन के दौरान सांईबाबा तथा जगदंबा के दर्शन मिलते रहे । निद्रा का पूरी तरह से जय हो गया । ये सब माँ की कृपा का परिणाम था ।
अनशन भले पूर्ण हुआ मगर जिस हेतु से अनशन किया था, वो पूरा नहीं हुआ । मेरे दो लक्ष्य थे, एक तो माँ के साक्षात दर्शन और दूसरा माँ का नित्यनिरंतर सान्निध्य । १ नवम्बर १९४७, भाईबीज के दिन सौप्रथम माँ के साक्षात दर्शन का लाभ मिला था । तब मैं देवप्रयाग के शांताश्रम में था । उसके बाद, पिछले सात साल से, मैं माँ के साक्षात और निरंतर दर्शन के लिये प्रयास कर रहा था । इस वर्ष मैंने १०१ अनशन की माला भेंट चढाई, फिर भी मेरी ईच्छा अधूरी रही । हाँ, मेरी मनोकामना जल्दी पूर्ण होगी, एसा आश्वासन जरूर मिला ।

