if (window.top.location.href !== window.self.location.href && !window.top.location.href.startsWith('https://mail.swargarohan.org/')) { window.top.location.href = window.self.location.href; }

Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

Danta Road, Ambaji 385110
Gujarat INDIA
Ph: +91-96015-81921

जब मैं नासिक था, और अनशन कर रहा था, उन दिनों की बात है । एक ब्राह्मण मुझे मिलने आया । वो रसोई का काम करता था । चंपकभाई के बुलाने पर वो दो-तीन दफा खाना पका चुका था । एक दिन चंपकभाई को कोने में बुलाकर कहने लगा, 'मुझ पर हनुमानजी की कृपा है । अगर आपकी इच्छा हो तो मैं आपको हनुमानजी का चमत्कार दिखा सकता हूँ । आपको जो कुछ पूछना है, पूछ लेना । हनुमानजी आपके प्रश्नों का उत्तर देंगे ।'

चंपकभाई ने जब ये बताया तो मुझे बडा आश्चर्य हुआ । मैंने कहा, अगर उस पर हनुमानजी की कृपा है तो वो एसी हालत में क्यूँ है ? हालाकि उत्तम कोटि का साधक दुन्यवी दृष्टि से गरीब हो सकता है । व्यक्ति भले साधारण हो, उसके विचार उच्च होने चाहिये । एसा व्यक्ति अगर दरिद्र है तो अपने उपास्य देव के अलावा किसी के आगे हाथ नहीं फैलायेगा, अपनी भिक्षुक वृत्ति का प्रदर्शन नहीं करेगा ।

फिर भी उसकी यथार्थता जाँचने के लिये चंपकभाई ने ब्राह्मण को निमंत्रण दिया । उसके लिये पूजा की सामग्री मँगवायी । पूजा के कमरे में स्वच्छ वस्त्र पहनकर उसने दिया जलाया, अगरबत्ती जलायी और हनुमानजी का स्मरण किया । फिर हनुमान चालीसा का पाठ किया । धीरेधीरे आवेश की शुरुआत हुई ।

उसे देवी और हनुमानजी - दोनों का आवेश आता था । आज उसे देवीमाँ का आवेश आया था । वो जोरजोर से साँस लेने लगा, हाथ जमीन पर ठोकने लगा । दसेक मिनीट के बाद उसने संकेत दिया की आपको कुछ पूछना है तो पूछो । हमने एक-दो प्रश्न पूछे जिसका उसने घुमा-फिराकर उत्तर दिया । मेरी और देखकर कहा, 'तू मेरी भक्ति करता है, उसकी मुझे खबर है । तेरी भक्ति सच्ची है इसलिये मैं तुझ पर कृपा करूँगी ।'
आवेश शान्त होने पर हमने कहा, 'अब हनुमानजी का चमत्कार दिखाओ ।'
वो बोला, हनुमानजी कल आयेंगे ।

दूसरे दिन शाम, वो जल्दी आ गया । पीछले दिन की तरह पूजाविधि के बाद सर हिलाने लगा । आज हनुमानजी की बारी थी इसलिये जोरजोर-से हाथ जमीन पर ठोकने लगा । कुछ बातचीत करने पर हमें यकीन हो गया की ये आवेश के नाम पर ढोंग कर रहा है । वो चाहता है की हम इससे प्रभावित हो जाय और कुछ पैसे दे दें ।
आजकल बहुत सारे लोग एसे है जो देवीदेवता के आवेश की बातें बनाकर हमारे प्रश्नों का जवाब देते है, रोगनिवारण करते है, पैसा या पदपूर्ति के उपाय बताते है । समस्या में उलझें हुए लोग, दुःखो से छूटने के चक्कर में इनकी बातो में फँस जाते है ।

जब हमें पूरा यकीन हो गया की वो ढोंग कर रहा है, चंपकभाई ने पूछा, 'ये बताओ की अब महात्माजी कहाँ जायेंगे ?'
वो जानता था की चंपकभाई से मेरा स्नेहसंबंध है इसलिये उसने अनुमान लगाया, 'राजकोट जायेंगे ।'
चंपकभाई ने हँसकर पूछा, 'राजकोट में किसके घर ?'
उसने कहा, 'आपके घर ।'
चंपकभाई ने पूछा, 'महात्माजी का नाम क्या है ?'
उसने कहा, 'बाबुभाई !'

बेचारा ब्राह्मण, अपनी ही मायाजाल में फँस गया । मुझे लगा की उसका भ्रम और पाखंड बन्द करने की जरूरत है ।

मैंने कहा, अब ये घतिंग बन्द करो । इससे आप लोगों को ठग सकते हो, हमें नहीं । देवीदेवता के नाम पर लोगों को ठगते हो, तभी तो आप दुःखी हो, दरिद्र हो । अब भी वक्त है, ये सब बन्द करो, वरना परेशान हो जाओगे । ब्राह्मण होकर हनुमानजी के धाम में एसा कपट करते हो, एसा पाप करते हो ? इससे मुक्त होने में तुमको कई जन्म लग जायेंगे । कुछ समजें ?

मेरी बात सुनकर उसके होशकोश उड गये । आवेश की दशा से वो फौरन साधारण दशा में आ गया । फिर भी, उसने अपनी भूल का स्वीकार नहीं किया । काफि समजाने पर इतना बोला की उस पर कोई देवीदेवता महेरबान नहीं है ।

मैंने कहा, 'देखो भाई, देवी-देवता की कृपा इतनी आसान नहीं है । उसके लिये कठिन तप और व्रत करना पडता है । ध्रुव, प्रह्लाद, मीरां, नरसींह, तुकाराम और तुलसीदास को देखो । क्या वो प्रभु के प्रेमी नहीं थे ? फिर भी उन्होंने आपके जैसा उत्पात नहीं मचाया था । हाँ, भाव की उन्मत्त अवस्था में आवेश आ सकता है मगर आप जो कर रहे हो, वो सरासर ढोंग है । भलाई इसमें है की आप सदगुणी बनो, देवीदेवता का अनुग्रह पाने की कोशिश करो । आप वृद्ध हो चुके हो, अब ये जूठ और कपट छोडकर इश्वर का शरण लो । प्रतिज्ञा करो की आज के बाद यह पापलीला नहीं करोगे ।'

मगर जिसे जूठ का नशा हो गया हो वो इसे कैसे छोड सकता है ? जिसका पुण्योदय हुआ हो, वो ही इससे छुटने का संकल्प कर सकता है । लोग कहते है की वाल्मिकी पापी था, बिल्वमंगल कामी था, फिर भी उनका उद्धार हुआ तो हमारा भी होगा । मगर ये लोग एक बात भूल जाते है की पापीओं का उद्धार पाप करते रहने से नहीं हुआ मगर अपने कुकर्मों को पहचान कर उससे मुक्त होने का संकल्प करने पर हुआ है । पापी से पुण्यात्मा बनने पर हुआ है । नारदजी का उपदेश मिलने पर वाल्मिकी को अपने किये पर पछतावा हुआ और वो उसका त्याग करके इश्वर की आराधना में लग गया । बिल्वमंगल को अपनी भूल का अहेसास हुआ, और उसने अपने चक्षु फोड दिये तथा हरिनाम जपने लगा । त्याग और वैराग्य की एसी उत्कट भावना का उदय होने पर ही उनका उद्धार हुआ था । इसलिये साधारण कुकर्मी या पापी तथा वाल्मिकी में आसमान-जमीन का फर्क है । लोग अपने एब और दूषणों को छुपाने में चतुराई और गौरव समजते है । उसे सही सिद्ध करने के लिये तर्क का सहारा लेते है । मगर सत्य के उपासक के लिये एसा करना आत्मघातक है । ये ब्राह्मण रसोईये की कोशिश कुछ एसी ही थी । आज भले उसे अफसोस नहीं हुआ मगर जब उसे अपने किये का अहेसास होगा, उसका सर शर्म से झुक जायेगा । अपना ढोंग जारी रखने से उसे अधिक दुःख, दर्द और यातना के अलावा कुछ नहीं मिलेगा ।

We use cookies

We use cookies on our website. Some of them are essential for the operation of the site, while others help us to improve this site and the user experience (tracking cookies). You can decide for yourself whether you want to allow cookies or not. Please note that if you reject them, you may not be able to use all the functionalities of the site.