Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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आजकल देवीदेवता के आवेशवाले कई लोग मिल जाते है । इनमें कौन सच्चा है और कौन जूठा ये बताना मुश्किल है । मेरी मानो तो ज्यादातर लोग जूठे है । मौकापरस्त लोग अपने निहित स्वार्थ के लिये आवेश का बहाना करके लोगों को ठगते है । कोई अपने हाथों से कुमकुम निकालता है, कोई संतान या नौकरी के लिये आशीर्वाद देता है, तो कोई भूतभावि की बातें बताकर लोगों को प्रभावित करता है ।

जब हम जगन्नाथपुरी में थे तो हमारी धर्मशाला में कोलकता से कुछ स्त्रीयाँ आयी थी । वे हमारे बगलवाले कमरे में ठहरी थी । उनको मालूम पडा की हम हिमालय से आ रहे है, तो वो हमें मिलने आयी । आकर बताने लगी की उनमें से एक स्त्री को माताजी का आवेश आता है । उसके हाथ से कुमकुम निकलता है । वो अपने आपको भाग्यशाली समज रही थी की उसके साथ रहकर उसकी सेवा करने का मौका मिला था ।

दुनिया में भात-भात के लोग है । हमने उनकी बातों पर खास ध्यान नहीं दिया । एक दिन वो स्त्री हमारे कमरे के बाहर बैठकर सर हिलाने लगी, जोर से बोलने लगी और भजन गाने लगी । उसके हाथ से कंकु निकल रहा था । कुछ लोग उसे प्रसाद मानकर ले रहे थे, अपने आपको धन्य मान रहे थे । ये सब देखने के बाद भी हमें कोई कुतूहल नहीं हुआ ।

एक दफा, जब कुछ लोग मुझे मिलने आये थे, वो मेरे कमरे में आयी और ये सब कब और कैसे शुरु हुआ ये बताने लगी । उसने कहा की कोलकता के श्रीमंत मारवाडी लोग उसकी पूजा करते है । उसे रहने के लिये एक मकान भी दिया है । मैंने उसकी बातों में ज्यादा दिलचस्पी नहीं दिखाई । उसकी आँखे बता रही थी की वो दंभी है ।
उसके साथ आयी दो-तीन बहनों के आग्रह से एक दफा माताजी उसके पास गयी और कंकु का प्रसाद ले आयी ।

मैंने माताजी को कहा: 'मुझे ये स्त्री ढोंगी लगती है, इसमें सच्चाई का अंश नहीं है । फिर भी आपको परीक्षा करनी हो तो आवेश आने पर उसे प्रश्न पूछो । आपको तसल्ली हो जायेगी । कंकु का देवीदेवता से कोई संबंध नहीं है । इसमें आश्चर्यचकित होने जैसा कुछ नहीं है ।'

जिस दिन हम जगन्नाथपुरी से निकल रहे थे, उसी दिन कोलकता से आयी स्त्रीयाँ वापिस जा रही थी । मैं सामान तैयार करके गाडी बुलाने गया । जब वापिस लौटा तो उनके कमरे का दृश्य देखा । माताजी का आवेश आने पर वो सर हिला रही थी, काँप रही थी, आसपास लोग जमा हो गये थे, और कुमकुम की प्रसादी ले रहे थे । माताजी वहाँ थी इसलिये मैं माताजी को बुलाने गया तो उसने मेरी ओर दृष्टिपात किया और तुरन्त नजर घुमा ली । मुझे फौरन पता चल गया की वो ढोंग कर रही है ।

मैंने माताजी को कहा, 'चलो, गाडी आ गयी है ।'
मैंने माताजी को इशारा किया की ये सही वक्त है, पूछकर तसल्ली कर लो ।

माताजी बोले 'मुझे एक प्रश्न पूछना है ।'
'हाँ हाँ, क्यूँ नहीं ? पूछो जो पूछना हो ।' उसने उत्तर दिया ।

'मेरी लडकी को बच्चा होनेवाला है । उसकी तबियत ठीक नहीं रहती । क्या आप बता सकती है की वो कैसी है ? पिछले कुछ दिनों से उसकी कोई खबर नहीं आयी है ।' माताजीने कहा ।

वो बोली, 'उसकी फिकर आप मत करो । बीच में उसकी तबियत कुछ बीगड गयी थी मगर अब सब ठीकठाक है । दो-तीन महिने बाद उसको बच्चा होगा ।'

माताजी को यकीन हो गया की वो जूठ बोल रही है क्योंकि ताराबेन का खत आया था । पंद्रह दिन पहले उनको पुत्री हुई थी और दोनों की तबियत ठीक थी । अब कुछ कहने-सुनने की जरूरत नहीं रही ।