बेलुड मठ में रामकृष्णदेव की समाधि है । शाम को साडे चार बजे समाधिमंदिर के द्वार खुलने पर हम वहाँ दर्शन करने गये । समाधि होल की रचना कलात्मक और सुंदर है । कुछ देर तक मैं चूपचाप खडेखडे रामकृष्णदेव की प्रतिमा को देखता रहा और कल्पना करता रहा की जब स्वामी विवेकानंद तथा अन्य गुरुभाई यहाँ रहते होंगे तो ये स्थान कैसा लगता होगा ! जिन्हें उनके दर्शन का सौभाग्य मिला है, वो धन्य है । मेरे मानसपट पर विवेकानंद के जीवनप्रसंग उभरने लगे । उपनिषद में कहा गया है की घास या जीवजन्तु की तरह अनगिनत व्यक्ति इस संसार में पैदा होते है और चले जाते है । उनके जाने के बाद उन्हें कोई याद नहीं करता । मगर जो दूसरों के लिये जीता है, किसी ध्येय के लिये अपने आपको समर्पित कर देता है, उसका नाम इतिहास के पन्नों पर सुवर्णाक्षरों से लिखा जाता है । उनके चले जाने के सदीओं बाद लोक उन्हें नहीं भूलते । हे प्रभु ! मेरा जीवन भी एसा प्रेरणादायी बनाओ ताकि आपका नाम रोशन हो ।
पिछली दफा जब मैं दक्षिणेश्वर आया था तो मेरी भेंट पुलिनबाबु से हुई थी । इसबार भी उनसे मिलने की बडी इच्छा थी इसलिये मैंने खत लिखकर मेरा कार्यक्रम बताया था मगर वो हमें मिलने नहीं आये । इसलिये हमने उनके घर जाना तय किया । उनके घर जा ही रहे थे की रास्ते में एक व्यक्ति ने बताया की पुलिनबाबु तो कबके चल बसे !
पुलिनबाबु के घर पर उनकी धर्मपत्नी मिली । वो हमें देखकर भावुक हो गयी । उसके पैर में काँच लगा था और वो बडी मुश्किल से चल सकती थी । यही कारण था की हमें मिलने की प्रबल इच्छा के बावजूद वो हमें मिलने नहीं आयी थी । उसने हमारे साथ बहुत सारी बातें की । पुलिनबाबु की बात निकलने पर उसने बताया, 'उनको भयंकर बिमारी थी, दर्द भी बहुत होता था । वो ठाकुर को अक्सर कहते थे की मुझे ले लो मगर हम उन्हें सांत्वना देते थे । एक दिन जब उनका दर्द हद-से बढ गया तो मुझसे देखा नहीं गया । तब मैंने ठाकुर को कहा, ठाकुर, इतनी पीडा देते हो, इससे अच्छा है की आप उनकी जान ले लो, उनको अपने पास बुला लो । बस उसी दिन उनका देहांत हो गया ।'
मैंने कहा, 'आप पर इश्वर की कृपा है । आप तहे दिल से उनको याद करते हो तो आपकी देखभाल करना उसका फर्ज बनता है । वो आपको अधिक दुःखी नहीं करेगा । बस आप सुमिरन करते रहना । हरेक व्यक्ति को अन्त में वहीं जाना है ।'
उनकी आँख भर आयी । उनका प्रभुप्रेम असाधारण था । उनको देखकर मुझसे सहज प्रार्थना हो गयी, हे प्रभु, जो तुम्हारी शरण में आता है, तुम्हारी पूजा करता है, उसे कृपया किसी भी प्रकार की तकलिफ मत देना । उसकी हमेशा रक्षा करना !
इश्वर अंतर्यामी है, वो सबकुछ जानता है । शरणागत भक्तों की रक्षा करना उसका स्वभाव है । प्रह्लाद के जीवनप्रसंग इसकी पूर्ति करते है । ज्यादातर लोग भगवान पर भरोंसा नहीं करते । उनको संसार के विषय प्यारे लगते है । उसे पाने में वो अपना जीवन गवाँ देते है । सुख-दुःख, राग-द्वेष, अहंता-ममता और जन्म-मरण के चक्र में घुमते रहते है और अपनी शक्ति को बरबाद करते है । अगर वे प्रभु में श्रद्धा रखकर उसकी भक्ति करते है तो प्रभु उनके प्रेम के घागे में आसानी से बँध जाये । मगर निर्बल मन के मानवी में इतनी श्रद्धा कहाँ ? हमारे शास्त्रों में कहा गया है की जो मन तथा इन्द्रियों का काबू करके परमात्मा की शरण लेता है, वो बडभागी है । उन पर प्रभु की छत्रछाया हमेशा बनी रहेती है । पुलिनबाबु की धर्मपत्नी एसी ही बडभागी थी । उसके सदभाग्य के लिये हमने उसे धन्यवाद दिया । उसके पैरों में दर्द था फिर भी वो हमे अलविदा कहने आँगन तक आयी ।
'फिर यहाँ आओ तो हमे दर्शन जरुर देना ।' ये उसके अंतिम शब्द थे । फिर उनसे कब मुलाकात होगी ये सिर्फ इश्वर जानता था ।

