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Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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कश्मीर की यात्रा के दौरान मैं प्रत्येक दिन माँ की कृपा की प्रतिक्षा करता रहा मगर मेरे नसीब में शायद इन्तजार लिखा था । मेरी जिन्दगी के तीस साल खत्म हो गये फिर भी मैं अपने लक्ष्य को हासिल नहीं कर सका । लोभी आदमी जिस तरह धन के लिये, कामी आदमी अपने प्रिय पात्र के लिये और तृषातुर आदमी जिस तरह पानी के लिये तरसता है, उससे भी ज्यादा बेकरारी से मैं माँ की कृपा के लिये तरस रहा था । मेरे जीवन की एकमात्र आशा, समृद्धि, और सुख का विषय उसकी पूर्ण कृपा था । उसके लिये मैंने अपना जीवन न्यौछावर किया था । फिर भी मैं अब तक अतृप्त था, इसकी क्या वजह हो सकती है ? अब मुझे और कितना वक्त एसे-ही गुजारना होगा ? माँ के अनुग्रह से अभिषिक्त होकर मानवजाति को काम आने की मेरी मनीषा कब पूरी होगी ? जीवन के अरुणोदय से लेकर आज तक मैंने केवल विश्व की चैतन्यमयी शक्ति के लिये आक्रंद किया है । संसार के विषयों से मन को हटाकर माँ के चरणों में लगाया है, उसकी संनिधि पाने के लिये आकाशपाताल एक कर दिये है । हे आकाश, हे पवन, हे धरतीमैया, मेरे प्रयासों के आप साक्षी है । मृत्यु को जीतकर अमर बनने के लिये, अंधेरो से मुक्ति पाकर परम प्रकाशित बनने के लिये, अल्पता को दूर भगाकर पूर्ण और विराट पुरुष बनने के लिये मैंने जो पुरषार्थ किया है वो कब कामयाब होगा ? कब मैं जीवन के सच्चे आनंद की अनुभूति कर पाउँगा ? बस यही प्रार्थना में अमरनाथ-यात्रा के दिन व्यतीत हुए । ध्येय के प्रति अनुराग, आदर्श के प्रति एकनिष्ठ भक्ति और सच्ची लगन, साधना के आवश्यक अंग है । उसके न होने से आध्यात्मिक संसिद्धि की साधना अधूरी रह जाती है ।

वक्त किसीके लिये नहीं रुकता है । कश्मीर यात्रा समाप्त करके हम दिल्ली आये । दिल्ली में एक दिन रुकने के बाद धनेश्वरभाई बंबई गये और हम कोलकता के लिये रवाना हुए ।

२७ अगस्त को हम दक्षिणेश्वर गये । गंगातट पर स्थित दक्षिणेश्वर अत्यंत सुहाना लगता है । रामकृष्ण परमहंसदेव के देहत्याग को भले बरसों हो गये, यह स्थान आज भी जीवंत लगता है । यहाँ के कणकण में परमहंसदेव की मौजूदगी का अहेसास होता है । शायद ये उनकी साधना और तपस्या की फलश्रुति है । तभी तो उनके चले जाने के बरसों बाद आज भी दक्षिणेश्वर हजारों लोगों की प्रेरणाभूमि है । यहाँ आकर लोगों की सांसारिक थकान मिट जाती है, वे अपने आप को पुनर्जीवित महेसूस करते है ।
परमहंसदेव भारतीय संस्कृति तथा सनातन धर्म के प्रतिनिधि थे । प्रभुप्रेम में पागल होने से प्रभु मिलता है, ये हमें परमहंसदेव के जीवन से सिखना है ।

अब दक्षिणेश्वर आये तो बेलुड मठ को कैसे भूल सकते थे ? देशविदेश में अपार चाहना प्राप्त करने के बाद स्वामी विवेकानंद ने बेलुड मठ की स्थापना की थी । अपने जीवन के अंतिम दिन उन्होंने यहीं बीताये थे । बेलूड मठ के समीप गंगाजी का विशाल और धीरगंभीर प्रवाह है । कोलकता जैसे चहलपहल वाले शहर में होने के बावजूद यह स्थान अत्यंत शांत है । सरिता, समंदर या पहाडों से किसी भी स्थान की शोभा बढती है, वहाँ जाने से मन को शांति मिलती है । यहाँ आदमी शांत और विचारशील होता है । तभी तो भारत के ऋषिवरों ने अपनी साधना के लिये सरितातट या पहाडों की गुफाओं को पसंद किया था । और यही कारण है की हिमालय आज भी साधकों को अपनी ओर आकर्षिक करता है ।

बेलुड मठ के उपरी हिस्से में विवेकानंद-कक्ष है । उसे देखकर स्वामी विवेकानंद का प्रतिभाशाली व्यक्तित्व मन की आँखो के सामने उपस्थित हुआ । विवेकानंद में अपार शक्ति और अनेकविध योग्यता थी । प्रसिद्ध होने के पूर्व उन्होंने पूरे भारत का प्रवास किया था, तपश्चर्या की थी और भारत को सही रुप में जाना-पहचाना था । भारत की महानता उसकी आध्यात्मिकता में है । इसका प्रतिबिंब उनके व्याख्यान, उपदेश तथा वार्तालापों में पाया जाता है । भारत की भूतकालिन महत्ता फिर से जागृत हो, लोग धर्म का आचरण करें और पूरे विश्व में भारत की कीर्ति हो, ये उनका सपना था । इस हेतु की पूर्ति के लिये उन्होंने अथाक प्रयास किये थे । जब भी भारत का इतिहास लिखा जायेगा, राष्ट्रिय अस्मिता तथा गौरव के प्रतीक तथा विदेशों में भारतीय संस्कृति का नाम करनेवाले महापुरुष के रुप में उन्हें जाना जायेगा । विचारकों को पता होना चाहिये की गांधीजी के पूर्व विवेकानंद ने अपनी तरह से भारत के लिये अभूतपूर्व कार्य किया था । विवेकानंद जैसे नरशार्दूल बारबार जन्म नहीं लेते ।

जिस हेतु के लिये स्वामीजीने अपना जीवन समर्पित किया था, आज उसकी हालत कैसी है ? आज भारत दीन, हीन और कंगाल है । महात्मा गांधी के विचारों की असर जनमानस से विलुप्त होती जा रही है । देश में पक्षापक्षी का गन्दा राजकारण हो रहा है । सेवावृत्ति का सर्वथा अभाव हो गया है । नीतिमत्ता और आध्यात्मिकता गिनेचुने लोगों में बाकी बची है । एसा होने का प्रमुख कारण क्या है और इसे ठीक करने के लिये क्या करना चाहिए - यह सोचते हुए मैं गंगातट पर विचारों में डूब गया । अगर भारतवर्ष को सुखी, समृद्ध और सही मायने में आजाद करना है, और रामराज्य स्थापित करना है, तो हरेक भारतवासी को न्याय-नीति के रास्ते पर चलना होगा । सेवा और सहकार का व्रत लेकर सादगी, संयम और सच्चाई से जीना होगा ।

हमारे पास दो मार्ग है । एक वो, जो हमारे प्रातःकालीन महापुरुषो ने हमें बताया था और दूसरा वो, जो छल, कपट, हिंसा तथा दुराचार से भरा है, तथा जिसके विपरीत परिणाम हमें मिल चुके है । अब भी देर नहीं हुई है, अब भी हम संभल सकते है । जब तक हम आसुरी मार्ग पर चलते रहेंगे, हमारे दुःखदर्दों का अन्त नहीं होगा । केवल धर्म और आध्यात्मिकता के मार्ग पर चलकर ही समाज सुखी, समृद्ध और सलामत हो सकता है ।

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