देवप्रयाग से हम अहमदाबाद आये । कुछ दिन ताराबेन के घर पर रुकने के बाद हम सरोडा आये । सरोडा आकर अच्छा लगा । शहर में ज्यादातर आदमी भागदौड की जिन्दगी जीते है । मुझे गाँव का शांत माहौल, खुली हवा, घर का पकाया हुआ खाना तथा तनावमुक्त जीवन पसंद है । आजकल लोग अपने गाँव छोडकर शहर जा रहे है । शहरों के फैलने से गाँव और गाँव का साहजिक जीवन नष्ट हो रहा है । शहरों को तरक्की की निशानी माना जाता है मगर यह गलत है । शहर में रहनेवाले लोगों के जीवन से शुद्ध हवा, सेहतमंद खाना, सादगी एवं परिश्रम गायब हो रहा है । लोग सिर्फ पैसे के लिये भागते रहते है । उनके जीवन से शांति, स्वस्थ्ता और धीरज नष्ट हो रही है, तनाव तथा असंतोष बढ रहा है । एसा जीवन अभिशापरूप है । मेरा ये कहने का मतलब कतई नहीं है की शहरों को मिटा देना चाहिये । मगर आदमी जहाँ भी रहे, उसे हृदय की शुद्धि तथा मानवता की वृद्धि का खयाल करना चाहिये । एसा न करने से मनुष्य का सामाजिक पतन निश्चित है ।
सरोडा में सबकुछ ठीक था, एसा नहीं । कुछ प्रतिकूलताएँ थी मगर मेरा ध्यान साधना में लगा था । पीछले देढ साल से मैं पूर्णता के लिये भरपूर प्रयास कर रहा था । समय समय पर मुझे आंतरजगत में प्रेरणा मिलती थी, सिद्धि का दिन सूचित किया जाता था, मगर काम नहीं बना था । मुझे पूर्ण विश्वास था की किसी धन्य दिन मेरी साधना की गड्डी पूर्णता के मुकाम पर पहूँच जायेगी, मुझ पर माँ की पूर्ण कृपा होगी । अब मेरा ध्येय उच्च था, तो स्वाभाविक है की इसे पाने के लिये मुझे विशेष प्रयास करने होंगे । माँ की पूर्ण कृपा के लिये जो भी दिन मिलते थे, अब तक मिथ्या साबित हुए थे । एसा बार-बार क्यूँ होता था, यह मुझे मालूम नहीं था । मगर मेरा मानना था की उसके पीछे निश्चित कोई रहस्य होगा । बस, ये रहस्य का पर्दाफाश हो जाय तो मेरा काम आसान हो जाय । मेरे द्वारा माँ की इच्छा कार्य कर रही है, फिर मुझे चिन्ता करने की क्या जरूरत है ? वक्त आने पर माँ सबकुछ ठीक कर देगी । मगर तब तक मैं हाथ धरकर बैठ नहीं सकता था । मछली पानी के बिना जीने लगे, चातक पक्षी बारिश के अलावा दूसरा जल ग्रहण करने लगे, समंदर चंद्र के प्रति अपने आकर्षण का त्याग करे, चंदन अपनी खुश्बू को खो दे, फिर भी हे माँ ! हे जगदंबा ! हे सकल संसार की सुधा ! मैं आपके दर्शन के प्रयास नहीं छोडूँगा । आप मुझे एसा आशीर्वाद दो की मैं आपके बिना रह ना सकूँ !
देश दुनिया में माहौल बदल रहा था । राजकीय फलक पर बहुत सारी घटनाएँ घटी थी । महात्मा गांधी की हत्या के बाद सरदार पटेल ने अपनी बाहोशी, दीर्घदृष्टि तथा मुत्सद्दी से ५६२ रियासतों को भारत में जोडने का पेचीदा मसला हल किया था । सरदार पटेल के इस ऐतिहासिक कार्य को लोग आश्चर्य और आनंद से देख रहे थे । जूनागढ और हैदराबाद के निराश्रितों का मसला उन्होंने अपनी कुनेह से सुलझाया था । बंधारणसभा भारत का नया संविधान बनाने के काम में लगी थी । २६ जनवरी को भारत प्रजासत्ताक दिन का उत्सव मनाने जा रहा था । भारत तेजी से विकास के पथ पर चल पडा था । जवाहरलाल नहेरु की प्रतिष्ठा विदेशो में बढी थी । होलाकि कश्मीर, पूर्व बंगाल तथा पाकिस्तान के साथ रिश्तों का मसला अभी सुलझा नहीं था, बल्कि अत्याधिक पेचीदा हो गया था । भारत के राजकीय नेता अपनी कुनेह से उसे हल कर लेंगे एसा सबको भरोंसा था । आजादी के बाद भारत के राजकीय इतिहास में भूचाल आया फिर भी नेतागण शांति बनाये रखने में कामियाब हुए थे । मैं राजकीय गतिविधिओं से वाकिफ रहता था और देश-दुनिया को अपनी ओर से सहायता कर सकूँ इसलिये प्रार्थना करता था । साधना की पूर्णता के बाद मानवजाति की सेवा करना मेरा उद्देश्य था । साधना की पूर्णता मेरे लिये अत्यंत आवश्यक थी । उसके बिना सब निरर्थक है, एसा मेरा मानना था । इसे प्राप्त करने में भले कुछ वक्त लग जाये, मैं विश्वकल्याण के कार्य में प्रवृत्त हो सकूँगा तो वह मेरे लिये खुशी की बात होगी ।
एक दिन बंबई से विठ्ठलभाई का खत आया । विठ्ठलभाई मेरे साथ हाईस्कूल में पढते थे । अपनी आध्यात्मिक अभिरुचि तथा मेरे प्रति स्नेह के कारण वो सरोडा आये । उनके वृद्ध मातापिता हिम्मतनगर के पास काबोद्रा नामक गाँव में रहते थे । उनके आग्रहवश होकर हम काबोद्रा गये ।
विठ्ठलभाई का स्नेह अपार था, उनका हृदय निर्मल था । काबोद्रा में उन्होंने मेरी बहुत सेवा की । गाँव में उन्होंने पाँच हजार रुपिया खर्च करके स्कूल बनवाई थी । वो मुझे स्कूल के वार्षिकोत्सव में ले गये । व्यासपीठ से मैंने गाँवलोगों को संबोधन किया । विठ्ठलभाई के मातापिता निर्मल, सरल और दयालु थे । विठ्ठलभाई में उनके लक्षण उतरे थे ।
हिमालय, साधना तथा आध्यात्मिकता की चर्चा तथा भजन-संकीर्तन में काबोद्रा के दिन अच्छी तरह से गुजर रहे थे । तब एक घटना घटी जिसका उल्लेख करना मैं आवश्यक समजता हूँ ।

