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Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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सरोडा से हम साबरमती गये ।

साबरमती में ईश्वरभाई तथा अन्य प्रेमीजनों के स्नेह के कारण कुछ दिन रुके । वहाँ मेरी भेंट ओम स्वामी से हुई । मुझे ओम स्वामी सन १९४३ में ऋषिकेश में मिले थे । ओमस्वामी विद्वान थे और उपनिषद, गीता, तथा स्वामी विवेकानंद के व्याख्यानों में रुचि रखते थे । ओमस्वामी के परिचित संतपुरुष शाहीबाग उनके भक्त के घर पधारें थे । ओमस्वामी से उनकी प्रशस्ति सुनकर मुझे उनसे मिलने की इच्छा हुई । एक दिन शाम ढलते हम उनको मिलने गये ।

वे अपने भक्तों तथा दर्शनार्थीओं के बीच दिवानखंड में बैठे थे । स्वामीजी का शरीर सुदृढ और कदावर था, उन्हें देखकर अनुमान करना मुश्किल नहीं था की वो पंजाब के थे । उन्होंने लाल रंग का झब्बा पहेना था । पास बैठी एक बहन रामचरितमानस का पाठ कर रही थी । पाठ खत्म होने पर ओमस्वामी ने अपना परिचय देकर संत कबीर के दो पद सुनाये । फिर प्रश्नोत्तरी का आरंभ हुआ । ओम स्वामीने पूछा : 'समाधि किसे कहते है ?'

स्वामीजी ने उत्तर दिया : 'मन की वृत्ति का निरोध समाधि है । इससे विशेष अगर आप कुछ बताना चाहते हैं तो आपका स्वागत है ।'

उनके शब्द सुनकर अच्छा लगा । ओमस्वामी कुछ चर्चा करना चाहते थे मगर शाम हो गयी थी इसलिये मैंने उठने का संकेत किया । उन्होंने स्वामीजी से मेरा परिचय देते हुए कहा : 'ये योगी है और हिमालय में रहते है ।'

स्वामीजी ने मेरी ओर देखते हुए कहा : 'योगी होकर भटकते हो ?'

उनकी बात सुनकर ओमस्वामी को दुःख हुआ । वो प्रत्युत्तर में बोलें : 'आप भी तो योगी हैं, आप जैसे यहाँ आये हो, उसी तरह वो भी यहाँ आये हैं ।'

मैं निकल चुका था । दोनों के दरमियान क्या बातचीत हुई इसका मुझे पता नहीं मगर ओमस्वामी आकर कहने लगे : 'एक संतपुरुष के मुँह से एसे शब्द शोभा नहीं देते ।'

मैंने कहा, 'कोई बात नहीं । इससे हमे क्या फर्क पडता है ? हमें तो साक्षीभाव से प्रत्येक घटना को देखना है और प्रसन्न रहना है ।'

महापुरुषों के लिये कहा गया है की -
सुखदुःख दोनो सम करी जाने और मान-अपमाना,
हर्षशोक से रहे अतीता, तिन जग तत्व पिछाना ... साधो मन का मान त्यागो.

स्वामीजी के साथे वो मेरी पहेली और आखिरी मुलाकात थी । उनके शब्द अब भी मुझे याद है । दत्तात्रेय के चोबीस गुरुओं की तरह मैंने उनके कथन से आवश्यक सीख ली । सत्पुरुष को सभी घटना से कुछ न कुछ सीखते रहना चाहिये ।

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