एक दिन मैंने पुलिनबाबु से कहा, आप किसी एसे व्यक्ति को जानते हो, जो रामकृष्णदेव से मिल चुकी हो ? अगर हाँ, तो मुझे उनसे मिलना है ।'
पुलिनबाबु ने दो-तीन लोगों का जीक्र किया, जिनमें से एक उनके घर के करीब रहते थे । दुसरे दिन सुबह हम उनको मिलने गये । वे काफि वृद्ध थे और अकेले ही रहते थे । मेरा परिचय पाकर वे प्रसन्न हुए और अपने आप को धन्य मानने लगे । रामकृष्णदेव कई दफा उनके घर आये थे । रामकृष्णदेव कैसे बेठते थे, कैसे बोलते थे, उनका देहभान कैसे चला जाता था और उन्हें भावसमाधि कैसे हो जाती थी उनके बारे में उन्होंने हमें बताया ।
'वो भी क्या दिन थे', वे कहने लगे, 'परमहंसदेव की स्वर्गीय संनिधि में बीते हुए दिन किसी उत्सव से कम नहीं थे । उनका अपार स्नेह, भक्तिभाव, निराभिमानी और नम्र स्वभाव किसीका भी मन मोह लेता था । एक बार उनको मिलने के बाद आदमी हमेशा उनका भक्त-प्रसंशक हो जाता था ।'
ये बताते हुए उनकी आँखो से आँसू छलक पडे ।
'उन दिनों को याद करके, उनके उपदेशों का अनुसरण करके, मैं अपना जीवन निर्गमन कर रहा हूँ । रामकृष्णदेव जैसे महापुरुष का मिलाप बडे भाग्य की बात है । वे तो मनुष्य के रुप में साक्षात ईश्वर थे, नर के रुप में नारायण । जो उन्हें पहचान सका वो धन्य और कृतकृत्य है ।'
मैंने कहा, 'मेरा भी एसा मानना है । उनके चले जाने के बाद क्या आपको उनके दर्शन होतें रहते है ? वे तो कृपासिंधु थे इसलिये आप जैसे भक्त-पुरुष पर तो उनकी कृपा होनी चाहिए ।'
उनकी आँखे फिर भर आयी ।
'हाँ, कभी कभी मुझे उनके अनुग्रह का लाभ मिलता है । वे हमें छोडकर थोडे गयें है ? उनके ही लब्जों मे कहूँ तो वे सिर्फ एक कमरे से दूसरे कमरे में गये हैं । अगर कोई उन्हें प्यार से पुकारता है, तो वे आज भी उसे दर्शन देते है । उन्हें देश, काल या अवस्था के कोई बंधन नहीं है ।'
उस वृद्ध पुरुष को मिलकर हम निकले तो पुलिनबाबु ने बताया, 'यहाँ एक मंदिर है जहाँ एक संन्यासी महात्मा रहते हैं । महात्मा दर्शनीय है । दोपहर को तीन ओर छे के बीच वो मिलते है । अगर आपकी इच्छा है तो हम वहाँ चलें ।'
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मध्यान्ह के बाद हम उस महात्मा पुरुष के दर्शन के लिये गये । उनके बारे में हमने सुना की वे जब काशी में रहते थे तब रामकृष्णदेवने उन्हें स्वप्न में आदेश दिया की दक्षिणेश्वर जाओ । यहाँ आने पर ट्रस्टीओने उन्हें मंदिर में रहने की अनुमति नहीं दी । मगर रामकृष्णदेव ने ट्रस्टीओं को स्वप्न-दर्शन देकर कहा की वो महात्मा को यहाँ रहने के लिये मैंने ही भेजा है । फिर ट्रस्टीओं ने उन्हें मन्दिर में रहने की अनुमति दी ।
चाहे कडी धूप हो, चाहे कडाके की ठंड, या फिर बारिश का मौसम - वे हमेशा पंचवटी के आसपास खुले बदन पडे रहते थे । कुछ साल वे मौनव्रत धारण करके वहाँ रहे । फिर उन पर इष्ट की कृपा हुई । रामकृष्णदेव की प्रेरणा मिलने पर, वे दक्षिणेश्वर छोडकर यहाँ आये । उनके साथ, उनकी सेवा के लिये एक सन्नारी रहती थी ।
गंगाजी के प्रशांत तट पर जब हम उन्हें मिलने गयें, वे आसन पर बैठें थे । उनकी उम्र काफि हो गयी थी । मैं उनकी आंतरिक अवस्था के बारे में जानना चाहता था अतः मैंने पूछा, 'मैं दीक्षा लेना चाहता हूँ । क्या आप मुझे दीक्षा देंगे ?'
अपने शिष्यगण में वृद्धि करने का अवसर कोई साधारण महात्मा नहीं गवाँता । मगर वे एक असाधारण आत्मनिष्ठ महात्मा थे । मेरे प्रश्न के प्रत्युत्तर में उन्होंने कहा, 'मेरे इष्टदेव की आज्ञा होने पर ही मैं किसीको दीक्षा देता हूँ । मेरी मरजी से मैं एसा नहीं करता ।'
उनका उत्तर उनकी उच्च आध्यात्मिक अवस्था का द्योतक था । इससे यह फलित हुआ की उनको न केवल इष्ट का दर्शन हुआ था, मगर जरुरत पडने पर वे उनकी आज्ञा भी पा सकते थे । उनका मुखमंडल प्रसन्न एवं तेजस्वी था तथा उनका जीवन गंगाजी की तरह पवित्र ।
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महात्माजी के दर्शन करके हम बेलुड मठ गये । बेलुड मठ गंगाजी के सामनेवाले छोर पर हैं । स्वामी विवेकानंद ने उसका निर्माण किया था । यहाँ विवेकानंदजी का स्मृतिखंड है, जहाँ उनके वस्त्र, लकडी, कमंडल तथा अन्य सामग्री रखी गयी है । यहाँ पर रामकृष्णदेव, माँ शारदादेवी, स्वामी ब्रह्मानंद और विवेकानंद की समाधियाँ भी है । मैं सोचता रहा की स्वामी विवेकानंद की हयाती में यह स्थान कितना सजीव लगता होगा ! विवेकानंद का व्यक्तित्व अत्यंत प्रभावशाली था । उनकी देशभक्ति, वेदांत-ज्ञान, भक्तिभाव, योगसाधना के प्रति प्रेम, सब अदभुत और अनुपम था । रामकृष्णदेव ने उन्हें जो कुछ दिया, उन्होंने लोगों के आध्यात्मिक अभ्युत्थान के लिये खर्च कर दिया । फिर भी, जो बदलाव की उन्हें अपेक्षा थी, वो नहीं हुआ । विवेकानंद, रामतीर्थ और गांधीजी जैसे महापुरुषों के उपदेशों को कितने लोग आत्मसात कर पायें ? शायद दुनिया उनके लिये नहीं बनी ।
बेलुड मठ मथुरा जैसा है और दक्षिणेश्वर गोकुल या वृंदावन जैसा । एक रामकृष्णदेव की साधनाभूमि है जब की दूसरी उनके शिष्यों द्वारा बनायी गई स्मृतिभूमि । दोनों अपने आप में बेमिसाल है । स्वामी विवेकानंद के बतायें रास्ते पर अगर हमारे नवयुवक और संन्यासी चलते है, तो वे न केवल अपना मगर देश और दुनिया का भला कर सकेंगे । तभी विवेकानंद का स्वप्न साकार होगा ।
शाम होने पर हम नाव से दक्षिणेश्वर लौट आये ।
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दक्षिणेश्वर में एक अन्य महात्मा पुरुष से हमारी भेंट हुई । वे कोई निश्चित स्थान पर रहने के बजाय परिभ्रमण करते रहते थे । वे लाल रंग के वस्त्र पहनते थे और दक्षिणेश्वर तथा पंचवटी के बीच घुमते रहते थे । वे हमेशा माँ, माँ रटते रहते थे और उनकी आँखो से आँसू चलते रहते थे । उनकी मुखाकृति उनकी उच्च आध्यात्मिक अवस्था का समर्थन करती थी ।
आज भी हमारे देश में उच्च कोटि के संत-महात्मा निवास करते हैं । हम उन्हें पहचान नहीं पाते क्योंकि वे प्रसिद्धि से पर रहते हैं । उनका प्रमुख लक्ष्य ईश्वर के स्मरण-मनन में जीवन बीताना होता है । ईश्वरकृपा से हमें एसे स्वानुभवसंपन्न महापुरुष के दर्शन का लाभ मिल जाता हैं । एस महापुरुष केवल अपनी दृष्टि, शब्द या स्पर्श से हमारे जीवन की राह पलट देतें हैं । यह बात मैं निजी अनुभव के आधार पर कह रहा हूँ । भारत की आध्यात्मिक परंपरा लुप्त हो रही है एसा मानकर हमें निराश होने की आवश्यकता नहीं है । रमण महर्षि, महर्षि अरविंद जैसे कुछ हीरे को हम तराश पाये हैं मगर अब भी देश में बहुत सारे अप्रसिद्ध या अल्प-प्रसिद्ध महापुरुष मौजूद हैं । हमें उनकी सेवा-सहायता करनी चाहिये और उनके उपदेशों को जीवन में आत्मसात करना चाहिये । तभी हमारा कल्याण हो सकेगा ।

