मेरा यह मानना था की नवरात्री के दिनों में 'माँ' की कृपा सविशेष होती है । अब नवरात्री शुरु हुई तो मैंने माँ की पूर्ण कृपा को पाने के लिये अपना सबकुछ दाव पर लगा दिया । मैं चाहता था की रामकृष्णदेव प्रकट होकर मुझे वैसी ही दीक्षा प्रदान करें, जैसी उन्होंने विवेकानंद को दी थी, और जिसके फलस्वरूप विवेकानंद को समाधि हुई थी ।
आज मैं जब इसके बारे में सोचता हूँ तो लगता है की मेरे विचार पुख्ता नहीं थे । मैं रामकृष्णदेव को इश्वरतुल्य और सर्वसमर्थ मानता था । अगर वो मेरे सामने प्रगट होतें, तो मैं उनसे दीक्षा क्यूँ माँगता ? साधना की पूर्णता और सिद्धि क्यूँ न माँगता ? मगर उन दिनों मैं उतना ही सोच पाया । शायद इसी कारण, दक्षिणेश्वर यात्रा का जितना लाभ मुझे मिलना चाहिए, नहीं मिला । साधनात्मक पूर्णता की मेरी मनोकामना अपूर्ण रही क्योंकि उसका वक्त अभी नहीं आया था । ईश्वर जिस चिज की जब जरुरत होती है तभी देता है । मेरी साधना उसमें अपवाद नहीं है ।
दुसरे दिन सुबह मैंने प्रण किया की जब तक रामकृष्णदेव या माँ के दर्शन नहीं होते, मैं अन्न या जल ग्रहण नहीं करूँगा । मेरा यह निर्णय किसी मनगढत कल्पना पर आधारित नहीं था, मगर दिल में उठे सच्चे प्रेम का परिणाम था । दृढ निर्धार करके मैं रामकृष्णदेव के कक्ष के बाहर बैठा और भजन लिखने लगा । कुछ ही देर में पुलिनबाबु और उनकी धर्मपत्नी आकर और मेरा भजन सुनने लगे ।
अचानक मैंने देखा तो पुलिनबाबु की धर्मपत्नी के पास एक सुकुमारी बैठी थी । उसकी उम्र तकरीबन बीस साल होगी । उसका वर्ण गौर और मुखाकृति अत्यंत लावण्यमयी थी । उसने सफेद वस्त्र परिधान किये थे । बाल भीगे और खुले थे इससे अनुमान किया की शायद वह गंगास्नान करके यहाँ आयी होगी । वो कब और कहाँ से आयी उसका मुझे कोई अंदाजा नहीं था । मैंने सोचा की रामकृष्णदेव तथा काली माँ के दर्शन के लिये बहुत सारे लोग आते है, यह लडकी उनमें से एक होगी ।
प्रेम और विरह के बारे में मैं भजन लिख रहा था । भजन गाते वक्त मेरी आँखो से आँसु बहने लगे । माँ, मैं बहुत दुर से आपके दर्शन की कामना लेकर यहाँ आया हुँ । हे माँ ! हे परमहंसदेव ! आप मुझे अपने दर्शन से धन्य करो ।'
मैंने देखा तो पुलिनबाबु की धर्मपत्नी की आँखे नम थी । उनकी बगल में बैठी वह सुकुमारी की आँखों से आँसु टपक रहे थे और वो मुझे देख रही थी ।
दो-तीन भजन सुनकर पुलिनबाबु अपने घर गये और मैं पंचवटी गया । वहाँ रामकृष्णदेव की तसवीर को सामने रखकर मैं प्रार्थना और जप करने लगा । सुबह के करीब दस बजे होंगे ।
कुछ ही देर में मैंने वह सुकुमारी को वहाँ आते हुए देखा । उसके बाल खुले थे और हाथ में एक छोटी-सी बाल्टी थी । पास आकर उसने बाल्टी नीचे रखी । अपनी साडी का पल्लु गले पर डाला और घूटने टेककर मुझे नमस्कार किया । फिर अपने वस्त्र मैले होने की बिल्कुल परवाह न करते हुए वो जमीन पर बैठ गयी ।
माँ के अलौकिक सौंदर्य की प्रतिकृति मानकर मैंने मन-ही-मन उसे नमस्कार किया । बरसों से मेरी यह आदत रही है और उससे मुझे बहुत लाभ हुआ है । आदमी केवल हड्डी, चमडी और माँस से बने शरीर को देखता है, उसमें विद्यमान ईश्वरीय प्रकाश को नहीं देख पाता । वैसे तो इश्वर सभी जगह है, सृष्टि में जहाँ पर सुंदरता है, मधुरता है, प्रेम है, वहाँ ईश्वरीय चेतना विद्यमान है । अगर आदमी मोह और अज्ञान के कारण ढके हुए चर्मचक्षु को प्रज्ञा के पवित्रतम प्रकाश से खोल देता है तो उसे सभी जगह ईश्वर देखाई देगा । स्त्री का शरीर ईश्वरीय चेतना का अंश है, मगर आदमी उसे केवल शरीर के सिमीत रुप में देखता है और फँस जाता है । इसलिये हमारे शास्त्रों में संयम की बात कही गयी है । जो व्यक्ति सर्वत्र ईश्वरीय चेतना का अनुभव करता है, उसे डरने की कोई वजह नहीं है ।
कुमारी की आँखो से आँसू बह रहे थे । मैं आश्चर्यचकित होकर उसे देखता रहा । तीन-चार लोग दुर चौराहे पर बैठे आपस में बात कर रहे थे । उनके अलावा ओर कोई आसपास नहीं था ।
मैं सोचने लगा, यह कुमारी कौन हो सकती है ?
मैं उलझन में था की उसने कहा, 'बाबा, आप बहुत दूर से आते है न ?'
मैंने कहा, 'हाँ' ।
कोलकता में अब तक जो मिला, वो अंग्रेजी या कच्ची-पक्की हिन्दी बोल लेता था । मगर इसकी हिन्दी शुद्ध और मीठी लगी । मैंने सोचा, कोलकता बडा शहर है, शायद कुछ लोग हिन्दी बोल लेते होंगे ।
उसने कहा, 'इससे तो आपका देवप्रयाग अच्छा है, आप वहाँ ही रहीये । पहले यह स्थान बडा अच्छा था लेकिन अब बिगड गया है । यहाँ रहना ठीक नहीं है ।'
मुझे आश्चर्य हुआ । मैं देवप्रयाग में रहता हूँ ये इसको कैसे मालूम ? फिर सोचा, शायद पुलिनबाबु ने बताया होगा । उसकी टिप्पणी -यह स्थान अब बिगड गया है- बिना वजह नहीं थी । दक्षिणेश्वर में कई लोग साधना के लिये नहीं मगर घुमने के लिये आते थे । शायद वहाँ का एकांत उन्हें प्रेमालाप के लिये आदर्श लगता था ।
उसने पूछा, 'बाबा, क्या आप यहीं रहेंगे ?'
मैंने कहा, 'सोचा तो एसा ही है की कुछ दिन यहाँ रहूंगा, फिर जैसी प्रभु की मरजी ।'
उसकी आँखे नम थी । वो क्यूँ रो रही थी यह मेरी समज में नहीं आया ।
वो बोली, 'बाबा, क्या हमें दर्शन होगा ?'
मैंने कहा, 'क्यों नहीं ? तुम्हारा प्रेम इतना अधिक है तो दर्शन जरूर होगा ।'
वो रोते हुए बोली, 'लेकिन उसने मुझे बहुत घुमाई - मथुरा, वृंदावन, हरिद्वार, ऋषिकेश, सब जगह, मगर अभी तक दर्शन नहीं दिया ।'
मैं सोचने लगा, इतनी कम उम्र में क्या ये इतनी सारी जगहों पर गई होगी ?
मैंने थेली में से अपना फोटा निकालकर कहा, 'देखो, यह कैसा है ?'
उसने कहा, 'यह तो ठीक है मगर तुलसीदासने कहा है, तुलसी मस्तक तब नमे धनुषबान लो हाथ । मुझे तो उसी स्वरूप में दर्शन चाहिये ।'
मैंने कहा, 'ऐसा दर्शन भी होगा । प्रेम होने पर सबकुछ हो सकता है ।'
जब हम बात कर रहे थे, उसकी आँखों से आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे । उसने बाल्टी में से एक पडिया निकाला, जिसमें चार रसगुल्ले थे और एक नालियेर । उसने वो मुझे दिया ।
मैंने कहा 'आज मेरा भोजन करने का विचार नहीं है ।'
'मैं प्रेम से देती हूँ । आपको लेना ही पडेगा ।'
मैंने उसे रामकृष्णदेव की तसवीर के पास रखने की सूचना दी ।
उसने पूछा, 'आप सब की रोटी खाते हैं ?'
मैंने कहा, 'जो प्रेम से देते हैं उन सबकी रोटी खाता हूँ ।'
वो बोली, 'अच्छा, तो मैं कल से इसी जगह पर रोटी लाया करुंगी ।'
मैंने हाँ कहा फिर पूछा, 'आप कहाँ रहती है ?'
उसने कहा, 'मेरा घर यहाँ पास-ही है । मैं यहाँ पर रोज आती हूँ ।'
कुछ क्षण वो मुझे देखती रही । फिर घूटने टेककर प्रणाम किया और अपनी बाल्टी लेकर चली गयी । उसकी मधुरता तथा सुंदरता मेरे मन-अंतर में अंकित हो गयी ।
मन में विचार आया, क्यूँ न उसका पता पूछ लिया जाय । उसने कहा था की वो मंदिर के पास ही रहती है । पंचवटी से मंदिर तक का रास्ता बिलकुल सीधा था । दूसरा रास्ता थोडा मुडकर दरवाजे की ओर जाता था । मैंने ढूँढने की कोशीश की पर वो कहीं दिखाई नहीं दी । मैंने सोचा, कल प्रसाद देने के लिये आयेगी तब पूछ लूँगा ।
मैं जहाँ बैठा था वहाँ एक आदमी आया । मैंने उसको रसगुल्ले का प्रसाद दे दिया ।
शाम को पुलिनबाबु आये । दूसरे दिन काफि इन्तजाकर करने के बाद भी वो कुमारी के दर्शन नहीं हुए, तब मैंने पुलिनबाबु को पूछा, 'कल जो लडकी यहाँ आयी थी, उसे आप पहचानते हैं ?'
मैंने उसका वर्णन किया मगर पुलिनबाबु पहेचान नहीं पाये ।
मैंने कहा, जब मैं आपको भजन सुना रहा था, वो आपके पास ही बैठी थी ।
पुलिनबाबु ने कहा, 'एसी कोई लडकी वहाँ थी ही नहीं । मैं और मेरी धर्मपत्नी, केवल हम दो ही भजन सुन रहे थे ।'
मैंने बात को ज्यादा नहीं बढायी । इस घटना के दो-तीन दिन बाद मुझे देवप्रयाग जाने की सुचना मिली । जब मैं देवप्रयाग आया तो मुझे अंतःप्रेरणा हुई की वो कुमारी ओर कोई नहीं मगर साक्षात मा काली-मा जगदंबा थी ।
मैं रो पडा । ओ माँ ! जब तुम मुझे दर्शन देने के लिये आयी थी तो मुझे अज्ञात क्यूँ रक्खा ? एसा मौका हाथ से क्यूँ जाने दिया ? तेरे चरणों में अपना शर रखकर मैं धन्य हो जाता । कम-से-कम मुझे तेरा प्रसाद ग्रहण करने की सदबुद्धि दी होती । क्या मैं इसके लायक नहीं था ? माँ के रूप और मीठे बोल को याद करके मेरा दिल रोता रहा । आज भी उसकी स्मृति दिल को झंकृत कर देती है ।

