Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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ऋषिकेश से निकले हुए करीब तीन महिने हुए थे । यूँ तो तीन महिने कुछ खास नहीं होते मगर इन तीन महिनों में मुझे जो अनुभव मिले थे वे अत्यंत महत्वपूर्ण थे । ऋषिकेश से निकलते वक्त मेरे दिल में अशांति थी मगर अब मेरा मन प्रसन्न था, मेरा आत्मविश्वास बुंलदी पर था । साधना द्वारा मिले अनुभवों के कारण मेरे हृदय में धन्यता का वीणावादन हो रहा था । इन तीन महिनों में, मैंने देवप्रयाग के मनोहर संगमस्थान में निवास किया, दशरथाचल के एकांतिक पर्वतीय प्रदेश में आसन जमाकर अवनवीन अनुभवों की प्राप्ति की, भगवान कृष्ण के अनुग्रह के लिये व्रत किया, तथा भागीरथी और भीलंगणा के संगम पर स्थित टिहरी में यादगार लम्हें बीताये थे । अब मैं वापिस ऋषिकेश आ रहा था ।

अपनी ममता और मधुता से माँ की तरह आश्रय देनेवाली ऋषिकेश की पुण्यभूमि को देखकर मेरा हृदय भावविभोर हो गया ।  हिमालय के दर्शन करके मुझे हमेशा ये लगा है की मैं अपने घर लौट आया हूँ । राजसिंहासन का त्याग करके जीवन के उत्तरार्ध में राजा-महाराजा यहाँ आते थे, ऋषिमुनि तथा तपस्वी महापुरुष यहाँ तपस्या में लीन रहते थे, यह सब दृश्य मेरे मानसपट पर उपस्थित हुए । हाँलाकि अब एसे तपस्वी संतपुरुषों का दर्शन दुर्लभ हो गया है मगर उनके पवित्र परमाणु अब भी यहाँ मौजूद है, वे आज भी हमें पावन करतें हैं । कभीकभा यहाँ कुछ ज्ञात-अज्ञात महापुरुषों का आकस्मिक मिलन हो जाता है । तब हमारे मन-अंतर प्रसन्नता से पुलकित हो जाते हैं । मैं ऐसे ही एक महापुरुष का दर्शनानुभव आपके साथ बाँटने जा रहा हूँ ।

ऋषिकेश में स्थित भगवान आश्रम अत्यंत मनोहर स्थान है । वहाँ नेपाल के राजकुमार ठहरे थे । मुझे उनके साथ परिचय और स्नेह प्रस्थापित करते हुए देर न लगी । वेदबंधु ने हमें मिलवाया और हम एकदूसरे के करीब आये । उन्होंने मुझे अपने साथ रहने का आग्रह किया । मैंने दिनभर रहना स्वीकार किया मगर रात को मैं कहीं ओर चला जाता । भगवान आश्रम में वल्लभदास नामक एक भाटिया सदगृहस्थ रहते थे । वे यूँ तो कच्छी थे मगर लंबे अरसे से ऋषिकेश में निवृत्त जीवन जी रहे थे । वे मुझ पर बहुत स्नेह रखते थे । जब मैं देवकीबाई धर्मशाला में था, तब मेरा उनसे परिचय हुआ था । मैं उन्हें काका कहकर बुलाता था । जब मैंने धर्मशाला से इस्तीफा दिया तब उन्होंने मेरा हौंसला बढ़ाया था । तीन महिने के बाद मुझे यकायक यहाँ देखकर वे अत्यंत प्रसन्न हुए । मैंने उनके अत्याग्रह से उनके साथ रात्रिनिवास करना स्वीकार किया ।

उनकी कुटिया छोटी-सी थी । जाड़े के दिन थे इसलिये खुले में सोना नामुमकिन था । उन्होंने अपनी खाट के पास मेरे लिये एक और खाट बीछा दी । भोजन के पश्चात मैं उनके पास गया । कुछ देर तक बातें चली, फिर मैं लेटा । ऋषिकेश-निवास की मेरी यह पहली रात्रि थी ।

उन दिनों मैंने रात के पिछले प्रहर में गायत्रीमंत्र के जाप करने की आदत डाली थी । हररोज एक हजार जाप करने का मेरा नियम था । नियमानुसार मैंने अपने जाप शुरु किये । शायद आधे जाप खत्म हुए होंगे की मेरी दृष्टि सामनेवाली दिवाल पर गई । मैंने देखा तो मेरे आश्चर्य की सीमा न रही । मुझसे करीब चार हाथ की दूरी पर एक महापुरुष दिखाई दिये । कुटिया में चारों ओर अंधेरा था मगर वे स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहे थे । मैंने सोचा की कुटिया का द्वार तथा खिडकीयाँ बन्द है तो फिर ये महापुरुष अंदर कैसे आये ? मगर मुझे याद आया की महापुरुषों तथा सिद्धों की शक्ति असीम होती है । आम आदमी की तरह उन्हें प्रवेश करने के लिये खिडकी या दरवाजे की जरूरत नहीं पडती । वे अपनी मरजी से कहीं पर भी उपस्थित हो सकते हैं । मंडनमिश्र जब अपने घर में यज्ञ कर रहे थे तब शंकराचार्य अपनी योगशक्ति से सूक्ष्मरूप धारण करके वहाँ गये थे । मंडनमिश्र उन्हें देखकर हैरान हो गये थे । मगर सिद्ध महापुरुष अपनी शक्ति से कुछ भी करने के लिये समर्थ होते हैं ।

आज बहुत सारे लोग सिद्धि और अध्यात्म से जुडी बातों को मनगढ़त कहानीयाँ या मन का संदेह मानते है । मगर उनके मानने-न मानने से हकीकत तो बदलती नहीं है । चिंतन-मनन में सदैव खोये हुए विचारकों ने अपने जीवनकाल में साधना का आधार लेकर स्वानुभव की दुनिया में कभी प्रवेश नहीं किया होता है । इसलिये उनके अभिप्रायों को सत्य मान लेना मूर्खता होगी । मैं तो ये कहूँगा की जिनके पास अनुभवजन्य माहिती नहीं है, उसे आध्यात्मिक विषयों पर अपनी जबान या कलम चलाने के बजाय मौन धारण करना चाहिए । एसा करने से समाज में भ्रांतिजनक विचारें फैलने बन्द होंगे और आध्यात्मिकता बडी सेवा होगी ।

अज्ञात महापुरुष के आकस्मिक और दिव्य दर्शन से मेरी खुशी का ठिकाना न रहा । महापुरुष ने श्वेत वस्त्र पहने हुए थे, शरीर पर झभ्भा और नीचे धोती थी । उनकी आँखे बन्द थी और वदन तेजस्वी था, सर पर बाल नहीं थे । वे वृद्ध मालूम पडते थे मगर उनके चहेरे पर वृद्धावस्था की छाया नहीं थी, मानो वे अखंड यौवन से संपन्न थे । उनके हाथ में माला थी और उसके मनकों से टक्...टक्...का ध्वनि हो रहा था । उससे मैंने अनुमान लगाया की वे गायत्रीमंत्र से संक्षिप्त एसा कोई मंत्र का जाप कर रहें थे । उनका शरीर जमीन पर नहीं मगर अवकाश में था । उन्होंने पद्मासन धारण किया था । उनका स्वरूप गौर एवं तेजोमय था । मेरे लिये किसी सिद्ध-महापुरुष का यह प्रथम दर्शन था । मैंने किताबों में पढ़ा था की सिद्धपुरुष अपनी ईच्छा से विचरण करते हैं, जमीन से उपर-अवकाश में रहते हैं, उनकी परछांई जमीन पर नहीं पडती वगैरह, वगैरह ,.. मगर मैं अब उसका प्रत्यक्ष अनुभव कर रहा था । महापुरुष का दर्शन मेरे लिये अत्यंत आनंददायी तथा आश्चर्यजनक था ।

जब ऐसे दर्शन होते है तब जिसका दर्शन होता है उसके बारे में अंतःप्रेरणा होती है । मगर मुझे कोई अंतःप्रेरणा नहीं हुई । अतः मैं सोचने लगा की यह महापुरुष कौन हो सकते हैं ? क्या ये महर्षि वसिष्ठ या सप्त ऋषिओं में से कोई एक हैं ? क्या ये कोई समकालीन महात्मा पुरुष हैं ? मैंने उसकी तसवीर कहीं देखी नहीं थी इसलिये मैं उन्हें पहचान नहीं पाया ।

मगर इससे क्या फर्क पड़ता है ? अगर हम शक्कर को न पहचानें तो क्या वह शक्कर नहीं रहती ? क्या उसका स्वाद नहीं मिलता ? वो तो मिलता ही है । महापुरुष के दर्शन का अनुभव मेरे लिये अमृतपान-जैसा था । मेरे लिये यह पर्याप्त था ।

क्षणभर मन में खयाल आया, कहीं ये वल्लभदासभाई तो नहीं हैं ! मगर निरीक्षण करने पर पूरा यकीन हो गया की वो नहीं है, यह तो जमीन से उपर बिराजमान कोई सिद्ध महापुरुष ही है । दर्शनानुभव के समय मैंने वल्ल्भदासभाई को आवाज लगानी चाही । मैंने 'काका, काका' कहके पुकारा मगर वे गहरी नींद में थे । इसलिये आवाज लगाने पर भी वे नींद से नहीं जागे । दो-तीन दफा वल्लभभाई को आवाज लगाने के बाद देखा तो सिद्ध महापुरुष का स्वरूप धूँधला होने लगा । आखिरकार जब मैं 'काका, काका' कहकर वल्लभभाई को जगाने के लिये अपने बीस्तर से उठा तो महापुरुष का स्वरूप बिल्कुल धूँधला होकर अवकाश में घूलमिल गया । जब वल्लभदासभाई जागे तो बोले 'मुझे क्यूँ जगा रहे हो ?'

मैंने उनके पास जाकर कहा, 'सो रहे हो ?' वे मुँह पर कम्बल ओढकर सो रहे थे ।

मैंने अपनी खाट पर वापिस आया और मंत्रजाप करने में लग गया ।

सुबह स्नानादि से निवृत होकर मैंने वल्लभदासभाई को अपने अनुभव की बात की और कहा: 'काका, आपकी कुटिया अति पवित्र हैं ।'

वो बोले, 'कुटिया पवित्र है या आप ? अगर कुटिया पवित्र होती तो मैं यहाँ कई सालों से रहता हूँ, मुझे अनुभव नहीं मिलता ?'

मैंने कहा: 'मेरी पवित्रता का मुझे पता नहीं । सबसे पवित्र ईश्वर और उसकी कृपा है । उसके बिना ऐसे अनुभव नहीं मिलते ।'

'मगर आपने मुझे जगाया क्यूँ नहीं ? मैं महात्माजी के दर्शन पाकर धन्य हो जाता ।' उन्होंने शिकायत की ।
'मैंने आपको जगाने के भरपूर प्रयास किये मगर आप नहीं जगे ।'

अगर वे नींद से जगते तो भी क्या ? महापुरुष जिसे चाहे उसे ही दर्शन देते हैं । आसपास के लोगों को तो उसकी भनक तक नहीं चलती ।