ऋषिकेश में ओम् स्वामी नामक एक विद्वान गुजराती महात्मा रहते थे । मेरी उनसे अच्छी जान-पहचान थी । वे योगीश्री भैरव जोशी को, जिसका जीक्र मैं आगे के प्रकरणों में करनेवाला हूँ, अच्छी तरह से पहेचानते थे । उनको जोशीजी से मिले काफि वक्त हुआ था इसलिये वो मेरे साथ दहेरादून आये ।
देहरादून में हम श्री जोशीजी के यहाँ ठहरे । जोशीजी योगी तथा संतपुरुष थे । उनका हृदय पवित्र और प्रेमपूर्ण था । वे कई सालों से साधनारत थे और उन्हें कई अनुभव मिले थे । यूँ तो वे संसारी थे मगर संसार से अलिप्त रहकर साधना कर रहे थे । उनका जीवन साधना-ईच्छुक गृहस्थों के लिये प्रेरणा-स्त्रोत था । उनकी आर्थिक स्थति उतनी अच्छी नहीं थी मगर अतिथि-सत्कार में उनका जवाब नहीं था । उन्हें औषधिओं में दिलचस्पी थी, वे बहुत सारी जडीबुट्टीयों के बारे में जानते थे । वे खुद औषधियाँ बनाकर दीनदुःखीओं की यथोचित सेवा करते थे । उनको मिलकर हमे स्वाभाविक खुशी हुई ।
देवप्रयाग छोडने के बाद चंपकभाई जोशीजी के यहाँ रुके थे । अतः जोशीजी के यहाँ जाने में चंपकभाई को मिलने का उद्देश भी शामिल था । जोशीजीने चंपकभाई से हमारे दशरथाचल निवास के बारे में और देवप्रयाग के अनुभवों के बारे में सुना था, इसलिये वे मुझे मिलने के लिये उत्सुक थे । मुझे शांति प्राप्त हुई है यह जानकर वे बडे प्रसन्न हुए ।
आज तक मैं तीन महापुरुषों से मिल चुका हूँ जो अपने पूर्वजन्मों के बारे में जानते थे या यूँ कहो की तीन महापुरुषों ने मुझे उनके पूर्वजन्मों के बारे में बताया था । उनमें से एक वेदबंधु थे, जिनका जीक्र मैं आगे के प्रकरणों में कर चुका हूँ । यहाँ जोशीजी की बात निकली है तो मैं पाठको को ये सुचित करना चाहता हूँ की वो दूसरे संतपुरुष थे जिनको अपने पूर्वजन्म का ज्ञान हुआ था । उन्होंने मुझे इसके बारे में बताया था । उन्होंने मुझे ओर जो कुछ बताया उसकी बारिकीओं में यहाँ मैं नहीं जाऊँगा मगर इतना जरूर कहूँगा की वे अपने पूर्वजन्म में एक स्त्री थे और उसके पूर्व एक फकीर थे । यहाँ पर ये बताने का मेरा मकसद इतना ही है की वाचको को पता चले की वर्तमान समय में ऐसे साधक हैं जिसे अपने जन्मांतरों का अनुभवसिद्ध ज्ञान है ।
जोशीजी को कुछ अन्य अनुभव भी मिले थे । दहेरादुन से सहारनपुर जानेवाले मार्ग पर नाथसंप्रदाय के महान संत श्री गैनीनाथ का समाधिस्थल है । ज्ञानेश्वर के भ्राता, निवृत्तिनाथ को यहाँ गैनीनाथ का दर्शन मिला था । जोशीजी इस समाधिस्थल पर जाते रहते थे । एक दफा उन्हें वहाँ संतपुरुष के रुप में गैनीनाथजी के दर्शन हुए थे ।
दहेरादुन में एक शिवालय है । वहाँ के महंत, महात्मा जयेन्द्रपुरीजी के शिष्य थे । वहाँ पर तीन-चार अन्य गुजराती महात्मा रहते थे । शिवालय की बगल में अभय मठ था । शिवालय में रहनेवाले दो संन्यासी महात्माओं को उत्तरकाशी जाना था । वे चाहते थे की देहरादुन से मसूरी पैदल जाय मगर मैं मसूरी बस से जाना चाहता था । हमने मसूरी की सनातन धर्मशाला में मिलने की योजना बनायी ।
चंपकभाई का झुकाव लोकसेवा की ओर था । वे मुझे अक्सर पूछते रहते थे की मैं कोई सेवायोजना में प्रवृत होनेवाला हूँ या नहीं । मैं उन्हें कहता की फिलहाल तो मेरा संपूर्ण ध्यान आत्मिक विकास की साधना में लगा है । जनसेवा मुझे पसंद है मगर मुझे सबसे पहले कुछ बनना है और इसके लिये मुझे एकांत-सेवन करके आत्मस्थित बनना है । उसके बाद अगर ईश्वर की ईच्छा हुई तो मैं सेवाकार्यों में अपना योगदान दूँगा । कब, कैसे और कौन से सेवाकार्य मेरे लिये ठीक होंगे वो सिर्फ ईश्वर को पता है । मेरी बात सुनकर चंपकभाई के मन का समाधान होता था । मुझे कई दफा एसा लगता था की मेरा जन्म किसी खास हेतु से, किसी निश्चित कार्य के लिये हुआ है । मेरी भावनाएँ या कल्पनाएँ अत्यंत बृहद थी । बुद्ध, ईशु या शंकराचार्य की तरह मुझे समस्त मानवजाति की सेवा करनी थी, सारे संसार में आध्यात्मिक उजाला करना था । किशोरावस्था से मेरे दिमाग में एसे ख्याल मंडराते रहते थे । मगर इस वक्त मेरा संपूर्ण ध्यान आत्मिक उन्नति की ओर था और इस ध्येयपूर्ति के लिये मैं आवश्यक साधना में लगा था ।
देवप्रयाग में मैंने भगवान कृष्ण के दर्शन के लिये व्रत रक्खा था । चंपकभाईने मुझे प्रश्न किया: 'अगर मैं भी आपकी तरह व्रत रखूँ तो क्या मुझे दर्शन होंगे ?'
मैंने कहा: 'दर्शन एसे-ही होते हैं क्या ? और व्रत तभी करना चाहिए जब दिल में स्वाभाविक और प्रबल प्रेम का आविर्भाव हो । जब एसा होगा तब व्रत अपने आप हो जायेगा, करना नहीं पडेगा । प्रभु के दर्शन के लिये मन बाँवला हो जाय, खाने-पीने में दिल न लगे, और दिलोंदिमाग पर केवल दर्शन की धून सवार हो जाय, तब व्रत करना । व्रत और उपवास गिनती के लिये या सोचकर करने की चिज नहीं है । व्रत करने नहीं पडते, अपने आप हो जाते हैं । ध्रुव का व्रत ऐसा था । ध्रुव के हृदय में ईश्वर के लिये प्रबल प्रेम था । जरा सोचो, वो प्रेम कैसा होगा, जिसके प्रभाव से वो अन्न-जल का त्याग करने के लिये बाध्य हो गया ? मगर उसे देखकर हरएक व्यक्ति को उसका अनुकरण नहीं करना है । उसे तो जप, ध्यान या प्रार्थना के माध्यम से अपने प्रेम को प्रबल करना है ।'
वे मेरी बात से संमत हुए ।
योजना के मुताबिक निर्धारित दिन पर मैं मसूरी जाने के लिये निकला । चंपकभाई मुझे बसअड्डे पर छोडने आयें । बस में मेरी पहचान मसूरी के एक व्यापारी सदगृहस्थ से हुई । मसूरी पहूँचने पर वे आग्रह करके मुझे उनके घर ले गये ।
दूसरे दिन सनातन धर्मशाला में मैं उन संन्यासी भाईओं से मिला । शाम को हम उत्तरकाशी के लिये निकल पडें । एक हाथ में कमंडल और कंधे पर थैला रखकर मैं चलने लगा । प्राकृतिक सौंदर्य का निरीक्षण करते हुए तथा विविध वार्तालाप करते हुए हम तीन दिन में मसूरी से उत्तरकाशी पहूँचे । वहाँ पहूँचने पर शाम हो चुकी थी । उत्तरकाशी के सुप्रसिद्ध विश्वनाथ मंदिर में दर्शन करके हम बिरला धर्मशाला गये । पहूँचने पर रात हो चुकी थी ।

