सर्दीयों के दिन खत्म होनेवाले थे, माघ मास शुरू होनेवाला था । ऋषिकेश छोडकर देवप्रयाग आने के बाद, पीछले दो महिने में, मुझे कई आध्यात्मिक अनुभव मिले थे । मैंने सुना की उत्तरकाशी में बहुत सारे संतपुरुष निवास करते है । मेरी इच्छा संतपुरुषों के दर्शन करने की तथा वहाँ के विशुद्ध वायुमंडल में रहकर साधनाभ्यास करने की थी । मैंने पैदल चलकर टिहरी होकर उत्तरकाशी जाने का सोचा । देवप्रयाग के कुछ परिचित सज्जनों से मैंने इस विषय में चर्चा की और उनकी सलाह मानकर मैंने वसंतपंचमी के दिन देवप्रयाग से निकलने का फैंसला किया । वसंतपंचमी के दिन देवप्रयाग में मेला लगता है । पहाडों में बसे लोग हजारों की तादात में उस दिन इकट्ठा होते है । गढवाल की ग्रामीण संस्कृति मेले में उभर कर सामने आती है, खास करके पहाडी लोगों के पोशाक और नृत्य देखने लायक होते हैं ।
चंपकभाई ने मुझे मुसाफरी के लिये एक खादी का थेला दिया था । मैंने अपना सामान उसमें रख दिया । निकलने से पहले मैंने चक्रधरजी के घर पर भोजन किया । विद्वान तथा ज्योतिष में पारंगत होने के कारण लोग चक्रधरजी का बडा आदर करते थे । भोजन करके मैं घर आया । मैं दहेरादून होकर उत्तरकाशी जाऊँ एसी चंपकभाई की प्रबल इच्छा थी मगर मुझे टिहरी होकर उत्तरकाशी जाना ठीक लगा । वसंतपंचमी के दिन सुबह ग्यारह बजे मैं अपना थेला, कंबल और कमंडल लेकर निकल पडा ।
देवप्रयाग से टिहरी करीब २८ मील की दूरी पर है । मैं टिहरी के पैदल मार्ग से अपरिचीत था मगर मुझे इश्वर पर पूरा भरोंसा था की वो मुझे सहीसलामत पहूँचायेगा । मैंने गंगा तटवर्ती पगदंडी पर चलना शुरु किया । पहाड के रास्ते सफर करने का ये पहला मौका था फिर भी मुझे डर नहीं लगा । ईश्वर पर जिसे पूर्ण श्रद्धा है, उसे संसार में किसका भय हो सकता है ? ईश्वर के चरणों में सर्वसमर्पण करनेवाले को डरने की कोई वजह नहीं है, ईश्वर उसकी सदैव रक्षा करता है । हाँ, उसे ईश्वर के साथ अपना अनुसंधान हमेशा बनाये रखना चाहिए, फिर ईश्वर उसका सबकुछ सम्हालता है ।
पर्वतीय मार्ग जीवन की राहों की तरह हैं, उन पर सुरक्षित मुसाफरी करना आसान नहीं होता । मैं तो ये कहूँगा की जिन्दगी की राह पहाडी मार्गो से भी ज्यादा जटिल होती है । उसमें यात्री को तरह तरह के मोड से गुजरना पडता है और विविध प्रलोभनों का सामना करना पडता है । जिन्दगी की राह में कभी काँटे तो कभी फूलों से गुजरना पडता है, कभी हर्ष का अनुभव होता है तो कभी शोक का, कभी प्रसंशा मिलती है तो कभी द्वेष और टीका का सामना करना पडता है । मगर किसी भी हालात में यात्री को जाग्रत रहेना होगा, परिस्थिति चाहें अनुकूल हो या प्रतिकूल, अपने चित्त की स्थिरता को बनाये रखना होगा । आघात और प्रत्याघातों से अपने मन को बचाये रखना होगा । संसार में रहकर उसे संसार से अलिप्त रहने की कला सिखनी होगी और आत्मोन्नति के लक्ष्य को मध्येनजर रखकर परिश्रम करना होगा । सुखदुःख, हर्षशोक, निंदास्तुति – सभी अवस्था में निरपेक्ष रहकर, उसे ईश्वर की इच्छा मानकर, खुश रहेना होगा । तभी वह अपने गंतव्यस्थान पर पहूँच सकेगा, अपने प्रयास में विजयी हो सकेगा ।
मैं भी एक साधारण मुसाफिर था, जीवन और पर्वतीय मार्ग – दोनों का, और अपने आत्मबल पर धीरेधीरे आगे बढ रहा था । देवप्रयाग से थोडी दूरी पर बागी नामक गाँव है, जो गंगा के तट पर है । वहाँ खेतीबाडी अच्छी होती है । देवप्रयाग से मुझे बिदा करने आये सदगृहस्थ के साथ मैं वहाँ तक आ पहूँचा । मुझे छोडकर वे देवप्रयाग के लिये वापिस लौटे और मैं टिहरी के रास्ते चल पडा । मैंने सोचा की मैं जितना हो सके, जल्दी-से टिहरी पहूँच जाउँ और फिर विश्राम करूँ, इसलिये मैंने अपनी गति बढायी । सर्दीयों के दिन थे इसलिये धूप की फिकर नहीं थी । आसपास के नैसर्गिक सौंदर्य को निहारता हुआ और मन-ही-मन ईश्वर का स्मरण करता हुआ मैं आगे बढने लगा ।
टिहरी का पैदल मार्ग सुविधाजनक नहीं है, क्योंकि बहुत कम लोग उसका उपयोग करते हैं । कुछ साल तक टिहरी से धरासु होकर गंगोत्री और जमनोत्री जाने के लिये यह मार्ग का उपयोग होता था, मगर जब से ऋषिकेश से टिहरी और धरासु की बसें चलने लगी, इस पैदल मार्ग पर यातायात बिल्कुल कम हो गया । मुझे पैदल जाना था इसलिये मैंने बस का मार्ग न लेकर यह मार्ग पसंद किया था । इस मार्ग पर धर्मशालाएँ नहीं है, और गाँव भी यात्रामार्ग से कुछ दूरी पर है । मैं 'श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारे, हे नाथ नारायण वासुदेव' की मनोमन गान करता हुआ चलता रहा । मैं चलते-चलते मनोमन प्रार्थना करता था तथा पीछले कुछ दिनों में मिले अनुभवों का स्मरण करता था ।
पैदल मार्ग गंगाजी के प्रवाह के इर्दगिर्द चलता है इसलिये चलते-चलते गंगा के दर्शन होते हैं । कभी मंद गति से तो कभी तीव्र गति से भागती हुई और मोड आने पर अंगडाईयाँ लेती हुई गंगा कोई ऋषिकन्या समान दिखाई पडती है । गंगा के प्रवाह से पहाडों का सौंदर्य ओर निखरता है । कुदरती सौंदर्य का पान करने से आनंद मिलता था, इसलिये थकान या प्रमाद का सवाल पैदा नहीं हुआ । चलते-चलते एक कंधे पे बोज लगने लगा तो दूसरे कंधे पर थेला रख दिया । बीच में झरनें आयें तो सामान नीचे रखकर पानी पी लिया, तनिक ठहरा और फिर आगे चल पडा ।
शाम का वक्त हुआ । संध्या के वक्त आसमान की शोभा देखते ही बनती है । मुझे लगता है की उषा और संध्या – दोनों कुदरत की कविताएँ है । संध्या जीवन के अंत और मृत्यु की याद दिलाकर हृदय को गंभीर, विचारशील और वैराग्यभाव से भर देती है, जब की उषा स्फूर्ति, चेतना और जीवन की प्रेरणा से उत्साहित करती है । पहाडों में संध्या अल्पकालिन होती है । सूरज ढलने के बाद तुरन्त अंधेरा छा जाता है । संसार के सभी पदार्थ और उसकी सुंदरता जिस तरह हमेशा नहीं रहती, संध्या के रंग आसमान में ज्यादा वक्त तक नहीं रहते । आदमी अपने जीवन में सुख-दुःख, हर्ष-शोक आदि भावों का अनुभव करता है और जीवनसंध्या आने पर शरीर का त्याग करके लीला समेट लेता है । बिल्कुल उसी तरह शाम होने पर नभ में अवनवीन रंगो की रंगोली सजती है और फिर अंधेरा छा जाता है । प्रकृति भी हमें मानो कहेती है की यहाँ कुछ भी कायम नहीं रहता ।
चंपकभाई ने मुझे मुसाफरी के लिये एक खादी का थेला दिया था । मैंने अपना सामान उसमें रख दिया । निकलने से पहले मैंने चक्रधरजी के घर पर भोजन किया । विद्वान तथा ज्योतिष में पारंगत होने के कारण लोग चक्रधरजी का बडा आदर करते थे । भोजन करके मैं घर आया । मैं दहेरादून होकर उत्तरकाशी जाऊँ एसी चंपकभाई की प्रबल इच्छा थी मगर मुझे टिहरी होकर उत्तरकाशी जाना ठीक लगा । वसंतपंचमी के दिन सुबह ग्यारह बजे मैं अपना थेला, कंबल और कमंडल लेकर निकल पडा ।
देवप्रयाग से टिहरी करीब २८ मील की दूरी पर है । मैं टिहरी के पैदल मार्ग से अपरिचीत था मगर मुझे इश्वर पर पूरा भरोंसा था की वो मुझे सहीसलामत पहूँचायेगा । मैंने गंगा तटवर्ती पगदंडी पर चलना शुरु किया । पहाड के रास्ते सफर करने का ये पहला मौका था फिर भी मुझे डर नहीं लगा । ईश्वर पर जिसे पूर्ण श्रद्धा है, उसे संसार में किसका भय हो सकता है ? ईश्वर के चरणों में सर्वसमर्पण करनेवाले को डरने की कोई वजह नहीं है, ईश्वर उसकी सदैव रक्षा करता है । हाँ, उसे ईश्वर के साथ अपना अनुसंधान हमेशा बनाये रखना चाहिए, फिर ईश्वर उसका सबकुछ सम्हालता है ।
पर्वतीय मार्ग जीवन की राहों की तरह हैं, उन पर सुरक्षित मुसाफरी करना आसान नहीं होता । मैं तो ये कहूँगा की जिन्दगी की राह पहाडी मार्गो से भी ज्यादा जटिल होती है । उसमें यात्री को तरह तरह के मोड से गुजरना पडता है और विविध प्रलोभनों का सामना करना पडता है । जिन्दगी की राह में कभी काँटे तो कभी फूलों से गुजरना पडता है, कभी हर्ष का अनुभव होता है तो कभी शोक का, कभी प्रसंशा मिलती है तो कभी द्वेष और टीका का सामना करना पडता है । मगर किसी भी हालात में यात्री को जाग्रत रहेना होगा, परिस्थिति चाहें अनुकूल हो या प्रतिकूल, अपने चित्त की स्थिरता को बनाये रखना होगा । आघात और प्रत्याघातों से अपने मन को बचाये रखना होगा । संसार में रहकर उसे संसार से अलिप्त रहने की कला सिखनी होगी और आत्मोन्नति के लक्ष्य को मध्येनजर रखकर परिश्रम करना होगा । सुखदुःख, हर्षशोक, निंदास्तुति – सभी अवस्था में निरपेक्ष रहकर, उसे ईश्वर की इच्छा मानकर, खुश रहेना होगा । तभी वह अपने गंतव्यस्थान पर पहूँच सकेगा, अपने प्रयास में विजयी हो सकेगा ।
मैं भी एक साधारण मुसाफिर था, जीवन और पर्वतीय मार्ग – दोनों का, और अपने आत्मबल पर धीरेधीरे आगे बढ रहा था । देवप्रयाग से थोडी दूरी पर बागी नामक गाँव है, जो गंगा के तट पर है । वहाँ खेतीबाडी अच्छी होती है । देवप्रयाग से मुझे बिदा करने आये सदगृहस्थ के साथ मैं वहाँ तक आ पहूँचा । मुझे छोडकर वे देवप्रयाग के लिये वापिस लौटे और मैं टिहरी के रास्ते चल पडा । मैंने सोचा की मैं जितना हो सके, जल्दी-से टिहरी पहूँच जाउँ और फिर विश्राम करूँ, इसलिये मैंने अपनी गति बढायी । सर्दीयों के दिन थे इसलिये धूप की फिकर नहीं थी । आसपास के नैसर्गिक सौंदर्य को निहारता हुआ और मन-ही-मन ईश्वर का स्मरण करता हुआ मैं आगे बढने लगा ।
टिहरी का पैदल मार्ग सुविधाजनक नहीं है, क्योंकि बहुत कम लोग उसका उपयोग करते हैं । कुछ साल तक टिहरी से धरासु होकर गंगोत्री और जमनोत्री जाने के लिये यह मार्ग का उपयोग होता था, मगर जब से ऋषिकेश से टिहरी और धरासु की बसें चलने लगी, इस पैदल मार्ग पर यातायात बिल्कुल कम हो गया । मुझे पैदल जाना था इसलिये मैंने बस का मार्ग न लेकर यह मार्ग पसंद किया था । इस मार्ग पर धर्मशालाएँ नहीं है, और गाँव भी यात्रामार्ग से कुछ दूरी पर है । मैं 'श्री कृष्ण गोविंद हरे मुरारे, हे नाथ नारायण वासुदेव' की मनोमन गान करता हुआ चलता रहा । मैं चलते-चलते मनोमन प्रार्थना करता था तथा पीछले कुछ दिनों में मिले अनुभवों का स्मरण करता था ।
पैदल मार्ग गंगाजी के प्रवाह के इर्दगिर्द चलता है इसलिये चलते-चलते गंगा के दर्शन होते हैं । कभी मंद गति से तो कभी तीव्र गति से भागती हुई और मोड आने पर अंगडाईयाँ लेती हुई गंगा कोई ऋषिकन्या समान दिखाई पडती है । गंगा के प्रवाह से पहाडों का सौंदर्य ओर निखरता है । कुदरती सौंदर्य का पान करने से आनंद मिलता था, इसलिये थकान या प्रमाद का सवाल पैदा नहीं हुआ । चलते-चलते एक कंधे पे बोज लगने लगा तो दूसरे कंधे पर थेला रख दिया । बीच में झरनें आयें तो सामान नीचे रखकर पानी पी लिया, तनिक ठहरा और फिर आगे चल पडा ।
शाम का वक्त हुआ । संध्या के वक्त आसमान की शोभा देखते ही बनती है । मुझे लगता है की उषा और संध्या – दोनों कुदरत की कविताएँ है । संध्या जीवन के अंत और मृत्यु की याद दिलाकर हृदय को गंभीर, विचारशील और वैराग्यभाव से भर देती है, जब की उषा स्फूर्ति, चेतना और जीवन की प्रेरणा से उत्साहित करती है । पहाडों में संध्या अल्पकालिन होती है । सूरज ढलने के बाद तुरन्त अंधेरा छा जाता है । संसार के सभी पदार्थ और उसकी सुंदरता जिस तरह हमेशा नहीं रहती, संध्या के रंग आसमान में ज्यादा वक्त तक नहीं रहते । आदमी अपने जीवन में सुख-दुःख, हर्ष-शोक आदि भावों का अनुभव करता है और जीवनसंध्या आने पर शरीर का त्याग करके लीला समेट लेता है । बिल्कुल उसी तरह शाम होने पर नभ में अवनवीन रंगो की रंगोली सजती है और फिर अंधेरा छा जाता है । प्रकृति भी हमें मानो कहेती है की यहाँ कुछ भी कायम नहीं रहता ।

