ऋषिकेश में करीब दस महिने बीते होंगे की मेरे लिए यात्रा का प्रसंग उपस्थित हुआ । अहमदाबाद से एक परिवार यात्रार्थ ऋषिकेश आया था । मेरी उन लोगों से जान-पहेचान हुई । परिवार के मुखिया दामोदरदास बहुत ही सज्जन और भले आदमी थी । अपनी महेनत व लगन के बलबूते पर साधारण आर्थिक स्थिति से उभरकर वे सर्वसंपन्न हुए थे । उनकी नम्रता और सेवाभावना प्रशंसापात्र थी । उनसे किसीका दुःख नहीं देखा जाता था । औरों का भला करने की कामना उनके दिल में हमेशा रहेती थी । उन्हें ईश्वर पर पूरा भरोसा था । साधु तथा संत-महात्माओं के समागम के लिए वो हमेशा तैयार रहते थे । उनके नवयुवान और आशास्पद पुत्र की कुछ समय पहले मौत हुई थी जिसकी वजह से उनका दिल बेचैन था । हिमालय के पुण्यक्षेत्र में किसी समर्थ संत का समागम हो जाय तो उनकी बेचेनी मिटे और मन शांति का अनुभव करे – ऐसी कामना लेकर वे ऋषिकेश आये हुए थे । इश्वर की ईच्छा या पूर्व के किसी संस्कारवश मेरी उनसे भेंट हुई । उनको मेरे प्रति प्यार और पूज्यभाव हुआ और वह दिनप्रतिदिन बढ़ता गया । मैं उन्हें भतृहरि के वैराग्यशतक तथा अन्य धर्मग्रंथों से कुछ सुनाता था जिससे उनका मन स्वस्थता का अनुभव करें ।
जाड़े की लगभग शुरूआत थी इसलिए उन्हें हिमालय-चार धाम की यात्रा करने की इच्छा नहीं थी मगर देवप्रयाग तक अवश्य जाना था । कारण, वहाँ के पंडा श्री चक्रधर जोशी से उनकी जानपहचान थी । अतः उन्होंने देवप्रयाग जाकर जोशीजी को मिलने का सोचा । कुछ दिनोंकी आपसी पहचान से उनको लगा की मेरे साथ चलने से उनको शांति मिलेगी, अतः उन्होंने मुझे भी साथ चलने को कहा । हिमालय के विभिन्न प्रदेश को देखने के लिए मेरा मन आतुर था इसलिए मैंने उनका प्रस्ताव बेजिझक स्वीकार कर लिया । मेरी संमति से वह अति प्रसन्न हुए ।
सुबह होने पर हम देवप्रयाग के लिए रवाना हुए । पहाडों में मुसाफरी करने का यह मेरा प्रथम अवसर था । ऋषिकेश से देवप्रयाग का मार्ग अत्यंत मरोडदार रास्तों से भरा है । सीधा रास्ता बहुत ही कम है । वाहन को चढाई और उतराई करते हुए वहाँ पहुँचना पडता है । चट्टानों को चीरकर बनाये गये मार्ग का अवलोकन करना अपने आप में मनभावन लगता है । रास्ते के एक ओर बड़े बड़े पर्वत और दूसरी ओर साँप की भाँति चलनेवाली गंगा का दृश्य मन को मोह लेता है । दिल में ऐसा होता है कि यह रास्ता खतम ही न हो । मगर मोटर को अपना काम करना था ।
ऋषिकेश से देवप्रयाग के मार्ग पर करीब आधे रास्ते हमारी मोटर रुकी । वहाँ दो-तीन छोटी-छोटी दुकानें लगी हुई थी, जहाँ चाय दूध वगैरह मिलता था । पास में सुंदर झरना था । पहाडों की बीचोबीच कुदरती सौंदर्य से भरी हुइ यह जगह आकर्षक लगी । दामोदरदास शेठ के आगमन की खबर पाकर देवप्रयाग से चक्रधरजी उन्हें लेने के लिए वहाँ आये हुए थे । देवप्रयाग से कुछ समय पहले बस से वे यहाँ आ चुके थे । शेठ को देखकर वो सामने आये और हाथ जोडकर खड़े रहे । उनका स्वभाव मुझे सरल और मधुर लगा । उनका विवेक और मृदुता देखकर मुझे आनंद हुआ । दामोदर शेठ के कारण हमारी आपसी जानपहेचान हुई ।
देवप्रयाग में हमें उनके घर रुकना था । ठीक गंगा के पास उनका घर था । देवप्रयाग गंगातट पर फैले पहाडों पर बसा हुआ है । देवप्रयाग में अलकनंदा और भागिरथी का संगम होता है । उसकी शोभा अपार है । किनारे पर स्नान करने के लिए घाट और बड़े-बड़े पत्थर हैं । पास में दो गुफा है जहाँ अक्सर साधुसंत निवास करते है । संगम के बाद पहाडों के बिच से नीकलती हुई गंगा का प्रवाह अत्यंत आकर्षक लगता है ।
देवप्रयाग में तीनचार दिन निवास करने पर हमें ज्ञात हुआ कि देवप्रयाग से तकरीबन चार मिल की दूरी पर दशरथाचल नामका सुंदर पर्वत है । वहाँ घास के मैदान है और वहाँ से अर्धचंद्राकर रूप में फैले हुए बर्फाच्छादित हिमालय का अनुपम दर्शन होता है । सुनकर मुझे वहाँ जाने की तीव्र ईच्छा हुई । दूसरे दिन सुबह होते होते हम चक्रधरजी के साथ चल पडे । साथ में शेठ, और उनके दो पुत्र भी साथ चलें, हालाकि उनके लिये दंडी की व्यवस्था की गई ।
छोटे पर्वतीय मार्ग से निकलते हुए हम आखिरकार सात हजार फिट की उँचाई पर स्थित दशरथाचल पर आ पहूँचे । रास्ते में तीन गाँव आये मगर पर्वत पर केवल चीड का वन था । अब शाम होने ही वाली थी । सर्दीयों के दिन थे और हम सात हजार फीट की उँचाई पर थे । तनबदन को चीरती हुई ठंडी हवा जोरों से चलने लगी । यूँ मान लो, निर्जन पर्वत पर काफि अरसे के बाद आदमीयों को देखकर पवन पागल हुआ था । पर्वत पर ठहरने की कोई जगह नहीं थी । किसी जमीनदार का पुराना छपरे-जैसा मकान था । एसे एकांत पर्वतीय स्थान पर आकर मेरे दिल में अवनविन भाव उत्पन्न हुए । मन शांति का अनुभव करने लगा । मुझे लगा की अगर कुछ देर तक यहाँ रहने का योग मिलें तो मेरा आध्यात्मिक विकास तीव्र गति से हो सकता है । पर्वत का प्रदेश मुझे चिरपरिचित लगा ।
दूसरे दिन सुबह हम आसपास के क्षेत्र में घुमने चले । पर्वत वैसे तो सभी प्रकार से साधना के लिये उत्तम लगा मगर वहाँ पानी की समस्या थी । झरना काफि दूर था और वहाँ पानी बूँदकी भाँति टपकता था । पानी भी इतना ठंडा था की पीने पर लगता मानो किसी औषधि का सेवन न किया हो ।
दोपहर के बाद हम देवप्रयाग की ओर चल पडें । दशरथाचल पर केवल एक दिन रहें मगर उसने मेरे दिल का कब्जा कर लिया । दिवाली और नूतन वर्ष के मंगल दिन देवप्रयाग में बीताकर हम ऋषिकेश के लिये रवाना हुए । ऋषिकेश आकर मैं दामोदरदास शेठ के साथ हरिद्वार गया । उन्होंने मुझे उनके साथ अहमदाबाद चलने के लिए आग्रहपूर्वक कहा । बोले, अहमदाबाद आकर हमारे साथ रहो और व्यापार में हाथ बटाओ ।
मेरा मन नहीं माना । मैंने कहा, फिलहाल तो मैं प्रभु के नाम का व्यापार कर रहा हूँ । मेरी कामना उसमें सफल होने की है । जीवन का प्रमुख ध्येय शांति की संप्राप्ति है । ईश्वर कृपा से मुझे जो अवसर मिला है, मुझे उसका भरपूर लाभ उठाना चाहिए ।
मेरा प्रत्युत्तर सुनकर उन्होंने कहा, अगर व्यापार में प्रवृत होने की इच्छा न हो, तो कम-से-कम थोडा वक्त अहमदाबाद आकर हमारे साथ रहो ।
मैंने उनके प्रस्ताव का स्वीकार किया मगर ईश्वर की इच्छा कौन जान सकता है । अहमदाबाद पहूँचने के कुछ दिनों बाद शेठ का देहावसान हुआ, यद्यपि हमारी मुलाकात न हो पाई । आज भी, उनका उल्लेख करते हुए मुझे उनके सदगुणों की स्मृति होती है । वे समचुच एक देवपुरुष थे इसमें कोई दोराय नहीं । कर्मसंस्कार से बँधे रहकर हमें मिलना और बिछडना पडता है, मगर शेठजी जैसे सदगुणी व्यक्ति की स्मृति मानसपट पर अभी भी अंकित है ।

