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Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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रामकृष्ण परमहंसदेव का जीवन मेरे लिए प्रेरणा का स्रोत था । मैंने इसका उल्लेख पूर्व प्रकरणों में कर दिया है । ऋषिकेश से प्रथम बार लौटने के बाद मैं उनको हररोज याद करता था । मेरे लिए उनका जीवन आदर्श था, आध्यात्मिकता की मिसाल था । उनको मध्येनजर रखकर मैं अपने जीवन के सुधार के प्रयासो में जुटा था । चंपकभाई के साथ मैं रामकृष्णदेव के जीवन की कई बातें करता । चंपकभाई के पास रामकृष्णदेव के वचनामृत की छोटी सी पुस्तिका थी । इससे ज्ञात हुआ की उनको भी रामकृष्णदेव के जीवन में दिलचस्पी थी ।

मेरे पास रामकृष्णदेव की तसवीर थी जिसे मैं हमेशा अपने साथ रखता, मानों वह तसवीर उनके प्रति मेरे प्यार और पूज्यभाव की द्योतक थी । ईश्वर के अनुग्रह से या अन्य किसी वजह से, मुझे रामकृष्णदेव से विशेष प्यार का अनुभव होने लगा । कई बार मैं उनके मनमोहक स्वरूप को मेरे कमरे में सामने खडा हुआ पाता । कभी कभी केवल उनकी मुखाकृति का दर्शन होता । एकाद मिनट के बाद दर्शन बन्द हो जाता, मगर इससे मुझे बहुत आनन्द मिलता था । साधनापथ पर मेरे उत्साह और विश्वास में बढोतरी होती थी ।

महापुरुषों के दर्शन तथा एसे अन्य अनुभव पाने से साधक के मन में उत्साह का संचार होता है । इससे न केवल प्रेरणा की प्राप्ति होती है मगर साधना की सत्यता और यथार्थता की अनुभूति भी होती है । मगर मेरे कहने का कोई यह मतलब न निकाले के हरएक साधक को एसा अनुभव होना आवश्यक है । नहीं, एसा कतै जरूरी नहीं है । जो साधक को एसे अनुभव नहीं होते उन्हें निराश होने की आवश्यकता नहीं है, और ना ही साधनापथ से च्युत होने की । अनुभव न मिले तो साधना की सत्यता के बारे में शंका करना उचित नहीं क्योंकि सभी साधकों को समान अनुभव नहीं होता । साधक की रुचि, पात्रता तथा उसकी प्रकृति के हिसाब से उसे अनुभव मिलते है । इसलिए अनुभव न मिलने पर भी साधक को अपनी साधना जारी रखनी चाहिए, उत्साह और विश्वास को कीसी भी प्रकार बनाये रखना चाहिए । में ये भी कहूँगा कि जिन साधकों को एसे अनुभव मिलते है, उन्हें अहंकारी या प्रमादी होकर बैठे रहने से बचना होगा । अनुभव को सबकुछ मानकर, अनुभव को ही अपना गंतव्य मान लेना ठीक नहीं है । उसे तो अनुभवों से आगे चलकर परमात्मा के दर्शन करने होंगे । साधना के अंतिम ध्येय को प्राप्त करना होगा ।

बचपन से लेकर अब तक मुझ पर ईश्वर की परम कृपा है, जिससे मुझे नियमित रूप से आध्यात्मिक अनुभव मिलते रहें है । श्री रामकृष्णदेव का दर्शनानुभव मेरे लिए अत्यंत लाभप्रद सिद्ध हुआ । रामकृष्णदेव अपने प्रेमी भक्तों पर कृपावर्षा करते हैं और आज भी किसी श्रद्धाभक्ति-संपन्न साधक को उनके दर्शन हो सकते है, यह बात का प्रमाण मुझे मिल गया । रामकृष्णदेव जैसे महापुरुष मानवजाति के मंगल के लिये काम करते है । वे साधको और साधारण व्यक्ति के आध्यात्मिक संस्कारो को जगाने में सहायता करते है । मेरे स्वानुभव से मुझे इस बात का पता चला ।

उन दिनों एक ओर बात हुई । वैसे तो बात छोटी-सी थी मगर उसकी प्रतिक्रया बडी महत्वपूर्ण थी । मैं पूर्व जीक्र कर चुका हूँ कि मुझे ईश्वर को माँ के स्वरूप में देखना ज्यादा पसंद था । माँ के दर्शन करने की और हो सके तो बातचीत करने की मेरी उम्मीद थी । संसार के सर्व पदार्थो में मै माँ की छबी देखता था । काफि अरसे से मेरी यह आदत थी । मगर ज्ञान की भूमिका पर इसका अनुभव करने के अलावा मुझे उसके मधुर स्वरूप के दर्शन की प्रबल इच्छा थी । उसके लिए मैं अपनी ओर से आवश्यक प्रयास करता था । उन दिनों मेरे पास माँ सरस्वती की तसवीर थी । जब से बंबई में वीणापाणिधारिणी माँ सरस्वती ने दर्शन देकर मुझे कृतार्थ किया, तब से उनके प्रति मुझे विशेष आकर्षण हुआ था ।

मुझे लगा कि पानी की तरह जीवन तो चला जा रहा है । सुबह के बाद शाम और शाम के बाद सवेरा । काल अपना कार्य करता रहता है । मेरे जीवन से एक-के-बाद-एक, दिन कम होते जा रहें है । अगर यूँ ही सारे दिन चले जायेंगे तो मेरी इश्वरदर्शन की कामना अपूर्ण रह जायेगी ? मुझे माँ के दर्शन कब होंगे ? माँ के दर्शन के लिए मैं आवश्यक प्रयास कर रहा हूँ मगर मेरे प्रयास पर्याप्त नहीं है । मुझे ओर प्रयास करने चाहिए । मुझे रामकृष्णदेव के वचन याद आये । उन्होंने कहा था, वर्तमान कलियुग में अगर कोई सच्चे दिल से इश्वर को केवल तीन दिन पुकारे और प्रार्थे तो उसे इश्वर जरूर मिलेगा ।

मुझे लगा कि रामकृष्णदेव के वचन व्यर्थ नहीं हो सकते । उनका मन दिनरात इश्वर के अलावा किसी और चिज में नहीं था, और उन पर माँ की परम कृपा थी । इश्वर के साथ अभिन्न एकता का जिसे हर क्षण अनुभव होता था एसे संतपुरुष की बात गलत कैसे हो सकती है ? मुझे स्वयं प्रयोग करके उसे आजमाना चाहिए । तीन दिन ईश्वरदर्शन के लिए प्रार्थना करने की बात मन में उतर गई ।

उन दिनों मैं सुबह-शाम गाय का पाशेर (लीटर का एक चौथाई हिस्सा) दूध लेता था । तीन दिन प्रयोग करने की बात सूझी तो उसका अमल करने में देर कैसी ? शाम से दूध नहीं लेने का और अगले तीन दिन भोजन नहीं करने का संकल्प किया । साथ में जरुरत न हो तो कमरे से बाहर न निकलने का प्रण किया । तीन दिन माँ से केवल प्रार्थना और उसकी कृपा की याचना करने की ठान ली । बस, सुबह होते ही मैंने कमरे का द्वार बन्द कर दिया । माँ सरस्वती की तसवीर सामने रखी और प्रार्थना करना प्रारंभ किया । तसवीर के पास दुध की कटोरी रखी । मुझे विश्वास था कि रामकृष्णदेव के वचनानुसार तीन दिन के अंतर्गत माँ साक्षात् प्रकट होकर मुझे दुध का प्रसाद अपने हाथों से पिलायेगी ।

पहला दिन प्रतीक्षा करने में निकल गया, रात भी गुजर गई । रात को थोडी नींद आयी । दुसरा दिन भी वैसे ही निकल गया । तीसरे दिन की शाम होने आई मगर कोई विशेष अनुभव नहीं हुआ । तीसरे दिन शाम को मैं अपने कमरे से बाहर निकला । कटोरी में रखा दुध तो वैसे भी खराब हो गया था मगर माँ का दर्शन नहीं हुआ । मैंने रामकृष्णदेव को अत्यंत आर्त हृदय से प्रार्थना कि मगर व्यर्थ रही । माँ की तसवीर वैसे ही अचल थी । मैं सोच रहा था कि माँ मेरे प्रयास के बारे में क्या सोच रही होगी ?

चौथे दिन मैंने दुध लिया और भोजन किया मगर मुझे चैन नहीं था । हाँ, एक बात का आत्मसंतोष का कि मेरी समझ और शक्ति के मुताबिक मैंने प्रामाणिक प्रयास किया । अगर मेरा प्रयोग सफल होता तो मेरे आनन्द की सीमा न होती । मगर मेरी मरजी के मुताबिक परिणाम न आने से निराश होने का कोई कारण नहीं था । हमारा कर्तव्य तो सिर्फ पुरुषार्थ करना है । उसका कब, कीतना और कैसा फल प्रदान करना यह ईश्वर के हाथ में है । इसलिए हमें शोक करने की, नाहिंमत होने की या कर्मसंन्यास के बारे में सोचने की जरुरुत नहीं है ।

तो क्या प्रसिद्ध संत श्री रामकृष्णदेव के वचन गलत होंगे ? बिल्कुल नहीं । उनके जैसे अनुभवी और समर्थ संत के वचन गलत कैसे हो सकते है ? मगर उसका शाब्दिक अर्थ लेने के बजाय उसके पीछे छूपे भाव को पकडने की आवश्यकता है । हमारी साधना पद्धति में त्रुटियाँ और कमीयाँ हो सकती है । प्रारब्ध कर्म की प्रबलता भी साधना मार्ग में बाधा डाल सकती है । इसलिए कभी कभी साधक को अपनी मरजी के मुताबिक अनुभव मिलने में देरी लगती है, ज्यादा साधना करने की आवश्यकता पडती है । रामकृष्णदेव के वचनामृत में इस हकीकत का सविस्तार उल्लेख किया गया है । अगर उन सब बातों को मिलाकर हम सोचें तो हमारी शंका का समाधान मिल जायेगा ।

जब तीन दिन का व्रत रखा तो मुझे कहाँ पता था कि ये तो आनेवाले दिनों में होनेवाली व्रतो की शृंखला का प्रथम सोपान मात्र है । माँ की पूर्ण कृपा हासिल करने के लिए मुझे ओर कितना तलसना होगा, कितने कठिन साधना-पथ से गुजरना होगा । तीन दिन के व्रत का यह प्रसंग बताने के पीछे मेरा उद्देश पाठकों को मेरी श्रद्धा और हिम्मत से अवगत कराने का है ।
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