मगर स्वामी की सूचना थी की मुझे हररोज कम से कम एक हजार मंत्रजाप करना पडेगा । उन्हों ने ये भी कहा था कि एसा न करने पर मुझे पाप लगेगा ।
जप करना अत्यंत लाभदायी है और उसको जितनी भी मात्रा में किया जाय उतना कम है । जप से एकाग्रता और साधना में बडी मदद मिलती है । एक हजार ही क्यूँ, हजारों की संख्या में जप करना उत्तम है । जिसमें गिनती की चिंता न हो एसे सतत होनेवाले जप आदर्श माने जाने चाहिए । मगर जप न करने से पाप लगे यह बात मेरी समझ में नहीं आती । दिन में एक हजार जप न करने से मैं पापी कैसे हो जाउँगा, यह मेरी समज से बाहर था । एसा कहकर स्वामीजी मुझे क्या जताना चाहते थे ये तो वो ही जाने मगर शायद उनका कहने का मतलब ये था कि मानवजीवन अत्यंत मूल्यवान है । उसकी प्रत्येक क्षण का सदुपयोग करके हमें अपने मन को प्रभुस्मरण में जोडना चाहिए । प्रभुस्मरण के अलावा जो समय व्यतित होता है वो व्यर्थ है । जप करने से मन की शुद्धि होती है, मन स्थिर और एकाग्र होता है, ईश्वरप्रेम प्रबलता धारण करता है और एक दिन ईश्वर के दर्शन होने से जीवन कृतार्थ हो जाता है । एसी विवेकपूर्ण सोचसमझ से जप का आधार लेने से अवश्य लाभ होता है । इसलिए साधक को चाहिए की वो अपना पूरा ध्यान नामस्मरण या एसी कोई अन्य साधना में लगाए और किसी भी प्रलोभन का शिकार न होते हुए अपने गंतव्य की ओर बढ़ता चले ।
मेरे कहेने का मतलब है कि साधना के लिए भय की बजाय प्रेम और प्रलोभन के बजाय विवेकबुद्धि का इस्तमाल करने की आवश्यकता है । भय और प्रलोभन के बलबूते पर बनी साधना की इमारत मजबूत नहीं बन सकती और लंबे अरसे तक नहीं टिक सकती । आज भी कई लोग, संत-महात्मा इसका बेझिझक उपयोग करते हुए दिखाई पडते है । वे अक्सर कहते है कि यह नहीं करने से पाप लगेगा, नर्क में जाना होगा वगैरह तथा यह करने से आपको पुण्य मिलेगा, आप स्वर्ग के हकदार होंगे, आपको मरणोपरांत उत्तम गति और भोगपदार्थो की प्राप्ति होगी वगैरह । लोगों को अध्यात्मपरायण करने का शुभ कार्य करने में मैं यकीन रखता हूँ मगर भय और प्रलोभन दिखाकर नहीं । भय और प्रलोभन के बजाय सदभाव और सहानुभूति से काम लेना होगा । उसके बलबूते पर बनी साधना की इमारत कठिनतम हालातों में बनी रहेगी । मेरे दिमाग में उस वक्त एसे विचार चल रहे थे इसलिए मैंने स्वामीजी की एक हजार की संख्या को नजरअंदाज करके केवल लक्ष्य की ओर अपना मन कैन्द्रित किया और नामजप तथा ध्यानादि साधना में अपना मन पिरोया ।
जप से क्या हासिल करना था इसका मुझे ठीक तरह से अंदाजा नहीं था । ईश्वर को माँ के रूप में पूजना मुझे अच्छा लगता था । इसलिए मुझे माँ के साक्षात दर्शन करने में सहायभूत हो एसे कोई मंत्र की आवश्यकता थी । मगरस्वामीने मुझे जो मंत्र दिया था वो निर्गुण मंत्र था । हाँ, यह बात सही है की निर्गुण मंत्र से भी माँ के दर्शन और समाधि का अनुभव हो सकता है मगर मेरा मन माँ की कृपा प्राप्त करने के लिए बेचैन था । साथ में मुझे समाधि के अनुभव की अत्यंत उत्कंठा थी । वैसे भी ध्यान के वक्त मेरा मन शांत व स्थिर रहता था । औरों की तरह मेरा मन ध्यान में खास भटकता नहीं था, मन में विचारों का उपद्रव नहीं होता था । हाँ, शरीर का भान कायम रहता था । जब शरीर का भान चला जाय और मन परमात्मा से पूर्णतया एक हो जाय तब समाधि दशा में प्रवेश होता है, एसा मैंने सुना था । जब मैं ऋषिकेश शिवानंद आश्रम में गया था तब मन की एसी निर्विचार दशा का मुझे अनुभव हुआ था । मगर वो अनुभव में स्थिति करने की मेरी इच्छा थी । ऋषिकेश का प्राकृतिक सौंदर्य से भरपूर प्रदेश बारबार मेरी मन की आँखो के सामने आता था । मुझे लगा कि वहाँ जाकर साधना करने का सौभाग्य मिल जाय तो मेरा ध्येय सिद्ध हो सकता है । मगर फिर से हिमालय जाने का योग कैसे हो ?
ईश्वर की योजना निराली है । उसने मुझे फिर हिमालय ले जाना चाहा । यह कैसे हुआ यह जानना रसप्रद होगा । ऋषिकेश में देवकीबाई गुजराती धर्मशाला है । उसकी संचालिका देवकीबाई का देहांत हुआ । धर्मशाला के ट्रस्टी बंबई में रहते थे । देवकीबाई की अनुपस्थिति में धर्मशाला का संचालन करने हेतु मेनेजर की नियुक्ति करनी आवश्यक थी । योग्य व्यक्ति पसंद करने की जिम्मेवारी बंबई स्थित ट्रस्टीओ पर आ पडी । उनमें से एक ट्रस्टी हमारे लोहाणा बोर्डींग के शास्त्रीजी को अच्छी तरह से पहचानते थे । शास्त्रीजी यह भी जानते थे की मै एक दफा ऋषिकेश जा चुका हूँ । मेरी साधना की अभिरुचि व अन्य हकीकत से वे अच्छी तरह वाकिफ थे । उनके मन में मेनेजर के पद के लिए मेरा विचार आया । उन्होंने इसके बारे में मेरी राय जाननी चाहि । मेरे मन में दो बातें चल रही थी । एक तो मेनेजर होने से आजीविका का प्रश्न हल हो जायेगा और दूसरा, साधना के लिए ऋषिकेश का सानुकूल माहौल मिलेगा । मैंने तुरन्त हाँ कर दी । ईश्वर-कृपा के अलावा एसा सुयोग्य अवसर अचानक कैसे पैदा हो सकता था ?
शास्त्रीजी ने ट्रस्टीओ को मेरे बारे में जानकारी दी । उन्होंने मुझे प्रत्यक्ष मुलाकात हेतु बंबई बुलाया । काफि अरसे के बाद मैं बंबई गया । महालक्ष्मी स्थित मंगल शेठ के घर मेरे रहने का इंतजाम था । मुझे देखकर वे प्रसन्न हुए । बाकी के ट्रस्टीओं को मैं पसंद आया । उन्होंने मुझे धर्मशाला के रोजबरोज के वहीवट से अवगत किया और ऋषिकेश जाने के लिए आवश्यक खर्च की धनराशि दी, जिसे लेकर मैं बडौदा आया ।
बडौदा आकर मैं माताजी से मिलने सरोडा गया । उनको ऋषिकेश जाने के बारे में हुई सभी गतिविधियों से अवगत कराया । गुजरात से दूर जाने के बात थी फिर भी उन्होंने मेरे निर्णय पर कोई विरोध व्यक्त नहीं किया ।
उनको तसल्ली बँधाते हुए मैंने कहा कि ऋषिकेश बहुत सुंदर स्थान है । चिंता करने के कोई वजह नहीं है । कुछ वक्त वहाँ के माहौल से परिचित होने के बाद मैं आपको वहाँ बुला लूँगा ।
मैंने मगर स्वामी को यह समाचार सुनाया । मेरे ऋषिकेश जाने की बात सुनकर वह प्रसन्न हुए । उन्होने मुझे प्रोत्साहन प्रदान करते हुए कहा की साधना करने के लिए ऋषिकेश उत्तम स्थान है । वहाँ रहकर शांति से साधना करो ।
मैंने तो अपना निर्णय ले लिया था । प्रस्थान का दिन आ गया । दिवाली के बाद बडौदा से मैंने ऋषिकेश के लिए प्रस्थान किया ।

