Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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नर्मदा तट पर निवास करने से पूर्व मगर स्वामीने अपने जीवन का कुछ वक्त हिमालय में ऋषिकेश और उत्तरकाशी में बिताया था । बडौदा में उनके भोजन का प्रबंध रणमुक्तेश्वर मंदिर में किया गया था इसलिए उन्हें भिक्षा लेने के लिए बाहर जाने की आवश्यकता नहीं थी ।

एक दिन स्वामीजी ने मुझे उनके बिस्तर के पीछे पडी कोई चिज उठाकर लाने को कहा । बिस्तर के उस पार जाने के लिए मैंने उनके बिस्तर पर पैर रखा । यह देखकर स्वामीजी क्रोधित हो उठे और बोले, अरे, तुमने ये क्या किया ? कहाँ तुम्हारा आश्रम और कहाँ मेरा ?

उनका उग्र रुप देखकर मेरे मन में तरह-तरह के विचार आने लगे । मुझे लगा की स्वामीजी बडे अहंकारी है । उनका उग्र रुख मुझे पसंद नहीं आया मगर जब मैं हिमालय गया तो मुझे लगा कि मेरी प्रतिक्रिया अनपेक्षित थी । लोग संत-महात्मा के पास जाकर उनके बाह्य व्यवहार से उनकी निजी जिंदगी के बारे में अनुमान करते है । यहाँ तक की उसे यथार्थ मानकर औरों को ठसाने की कोशिश करते है । मगर उनसे मेरा अनुरोध है कि किसी भी संतमहात्मा के बारे में अभिप्राय देने से पहले उनके वाणी-वर्तन के पीछे क्या हेतु है उसे जानने की कोशिश करनी चाहिए । उनके किसी व्यवहार से शंका हो तो उसका समाधान पाने की कोशिश करनी चाहिए । बहुत कम लोग एसा करते है । ज्यादातर लोग पूर्वग्रह से पीडित होकर अपना अभिप्राय बाँध देते है, जिससे नुकसान उन्हीं का होता है । किसी भी महात्मा पुरुष के व्यवहार के बारे में अपना अभिप्राय देने से पहले विवेकबुद्धि का उपयोग करके सोचना चाहिए । अगर उनके व्यवहार में कोई बात असंगत लगे तो उनसे पूछकर उसका समाधान करना चाहिए ।

आज मुझे लगता है कि स्वामीजी के शब्दों को सहानुभूति से समझने की आवश्यकता थी । सामान्यतः जो संत-महात्मा उच्च अवस्था पर आसीन्न है या विधिनिषेध के ज्ञान से पर है, उन्हें किसीके बूरे बर्ताव पर कोई आपत्ति नहीं होती, उन्हें क्रोध नहीं आता । मगर कदाचित किसीके व्यवहार पर वे अपना विरोध प्रकट करें तो उसका गलत अर्थ नहीं निकालना चाहिए । उनकी टिप्पणी की वजह स्वयं बडप्पन दिखाना या अहंकार का प्रदर्शन करना नहीं होती बल्कि कर्ता की आचार या विचारशुद्धि की भावना होती है । समाज और संस्कृति के संरक्षक होने के कारण एसा करना उनका पवित्र फर्ज बनता है । इसीलिए उन्हें लोकशिक्षक या गुरु कहा जाता है । हमारे समाज में एसे कई लोग है जो संत या महात्मा के वस्त्र, आसन, उनके स्थान तथा उनकी निजी चिजों का अनधिकृत उपयोग करते है । यह सरासर गलत है, एक किस्म का व्यवहार-दोष है । आध्यात्मिक विकाससंपन्न महापुरुष पूजनीय होते है । उनका एक विशिष्ट स्थान होता है । उनके साथ व्यवहार करने का अलग तरीका होता है । एसा करने से संत-महात्मा और धर्म की मर्यादा का पालन होता है । स्वामीजी के आसन पर मेरा पैर रखना किसी दृष्टि से उचित नहीं था, बचाव के योग्य नहीं था ।

इतनी चर्चा के बाद पाठकों को मेरे कहने का मर्म अच्छी तरह से ज्ञात हुआ होगा । स्वामीजी का उस दिन का व्यवहार और उसका रहस्य कुछ अरसे बाद मेरी समझ में आया । बात भले छोटी हो मगर उसका अनादर नहीं करना चाहिए । कभी-कभी छोटी बातों में बडे रहस्य की कूँची होती है । साधक और सभी विवेकी पुरुषों को चाहिए की छोटे-छोटे प्रसंग का मंथन करके नवनीत निकाले और उसके मर्म से अपनी साधना का विकास करें ।

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स्वामीजी अंग्रेजी और संस्कृत में कुशल थे । वे योगी थे और उन्होंने संस्कृत में योग विषयक ग्रंथ लिखा था । विद्वान होने पर भी वे बडे नम्र, निराभीमान और प्रेम की मूर्ति समान थे । मेरा ईरादा उनसे योग की विविध क्रियाएँ सिखने का था । योग के ग्रंथो में मैंने खेचरी मुद्रा के बारे में पढा था । खेचरी मुद्रा की सिद्धि होने से समाधि में सहज प्रवेश होता है और नित्य यौवन तथा आकाशगमन जैसी कई सिद्धियाँ प्राप्त होती है । मैंने स्वामीजी से खेचरी मुद्रा के बारे में जीक्र किया । स्वामीजी ने मुझे तसल्ली दिलाते हुए कहा कि उन्होंने खेचरी मुद्रा का अभ्यास किया है और किसी दिन मुझे उसका प्रयोग करके दिखायेंगे । उन्होंने ये भी कही की खेचरी मुद्रा से समाधि में किस तरह प्रवेश होता है उसका प्रत्यक्ष निदर्शन करके दिखायेंगे ।

कुछ ही दिनों बाद उन्होंने मुझे खेचरी मुद्रा करके दिखाई और उसे करने का तरीका भी बताया मगर उसके प्रयोग से समाधि में कैसे प्रवेश होता है यह देखने का मुझे मौका नहीं मिला । उस विषय में फिर कभी चर्चा नहीं हुई । स्वामीजी में एक बात खास थी की वो स्वयं सिखने के बाद ही किसीको सिखाने की बात करते थे । बहुत कम लोगों में यह गुण देखने में आता है ।

स्वामीजी का स्वभाव शांत था । मेरी योगाभ्यास की उत्कट ईच्छा को देखते हुए उन्होंने एक दिन मुझसे कहा, मैं तुम्हें दीक्षा देना चाहता हूँ ।

कुछ देर तक पंचांग में देखने के बाद उन्होने कहा, आनेवाली नवरात्रि का पांचम का दिन शुभ है । पांचम के दिन सुबह में यहाँ आ जाना ।

उनके वचनों से मुझे बडी खुशी हुई । उन्होंने पांचम का ही जीक्र किया था यह मुझे पूरी तरह से अभी याद नहीं पडता, मगर शायद उन्होंने यही कहा था ।

नवरात्रि के दिन आ पहूँचे । उन्होंने जो दिन मुझे बताया था उसकी पूर्व संध्या पर कहा, दीक्षा लेते वक्त कुछ न कुछ लाकर गुरु को अर्पण करने का विधान है । फूल या फल से काम चल जायेगा । तुम क्या लेकर आओगे ? एसा करो, तुम दो फल लेकर कल सुबह में आ जाना ।

दुसरे दिन सुबह मै एक दर्जन फल लेकर उनके पास गया । प्रणाम करने के बाद प्रतीक्षा करके बाहर बैठा । कुछ ही देर में उन्होंने मुझे कमरे में बुलाया । वे एक आसन पर बिराजमान हुए और मुझे उनके सामनेवाले आसन पर बैठने को कहा । उन्होंने तीन बार उच्चारण करके मुझे मंत्र प्रदान किया । कुछ प्राणायाम करने की विधि बताई । फिर मुद्रा का अभ्यास करवाया । बाद में मुझे पूछा, कैसा अनुभव हो रहा है ?

मैंने कहा, सब जगह प्रकाश दिखाई पडता है ।

उन्होंने कहा, तब तो तुम्हारी कुंडलिनी जाग्रत है । अब सब काम आसान हो जायेगा ।

उनके शब्दों का क्या अर्थ निकलता था यह मुझे ठीक तरह से समझ में नहीं आया, मगर उनकी बात सुनकर मुझे आनंद अवश्य हुआ । 

स्वामीजी से दीक्षा लेने के तीन-चार मास पूर्व मैंने नमक और हल्दी खाना छोड दिया था । तेल, मीर्च और आमली जैसे खट्टे पदार्थो का त्याग किया था । सब्जी पानी में पकाकर खाता था । गाय का बना दुध और घी लेता था । स्वामीजी के सुचनानुसार प्राणायाम की साधना के लिए एसे आहार-संयम की आवश्यकता थी ।

मंत्रदीक्षा मिलने पर मैंने जोरों से साधना में मन लगाया । योगी होकर जीवन में कुछ हासिल करने की नयी आशा का मुझमें संचार हुआ था । ईश्वर को समर्पित होकर, अपने मूल स्वरूप की ओर मुझे चलना था । प्रकाश स्वरूप आत्मा की खोज करके प्रकाश के स्तोत्र एसे परमात्मा को पाना था । जब तक अपने ध्येय में कामयाबी न मिले तब तक दटकर अपने मार्ग पर चलते रहेना था । हिंमत, धीरज और श्रद्धा से मैं मार्ग पर कदम रखने लगा ।