Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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पूर्ण और सिद्ध योगी बनने की प्रबल महत्वकांक्षा मेरे दिल में थी । उस मंझिल तक पहूँचने के लिए आवश्यक साधन की मुझे तलाश थी । उत्कट मनोमंथन के दिन थे । दिनरात एक ही रट मन में लगी थी की मुझे सिद्ध योगी बनना है । एसा योगी जो जन्म, जरा और व्याधि से मुक्त हो, पंचमहाभूत का स्वामी हो और अखंड आत्मानंद में प्रतिष्ठित हो । उसकी पूर्ति के लिए आवश्यक साधना करने के लिए मैं तैयार था । गंगा को स्वर्ग से पृथ्वी पर अवतीर्ण करने के लिए भगीरथ ने अपार परिश्रम किया था । साधना की सिद्धिगंगा को मेरे जीवन में अवतीर्ण करने के लिए जो भी कठिन तपव्रत आवश्यक है, उसे करने के लिए मै तैयार था । निराश, नाहिंमत या हारकर बैठना मेरा स्वभाव नहीं था । समाधि का अनुभव मुझे नहीं था और ना ही माँ जगदंबा के साक्षात दर्शन का । मेरी शक्ति सीमित थी और मेरी त्रुटियों से मैं अच्छी तरह से वाकिफ था । मेरी खामीयों को सुधारकर ध्येय प्राप्त करने के लिए मैं योग साधना प्रति आकर्षित हुआ ।

मगर केवल आकर्षित होने से क्या होता है ? कार्यसिद्धि के लिए दृढ ईच्छा सबकुछ नहीं होती । प्राणायाम और योग की गहन क्रियाएँ सीखानेवाला कोई अनुभवी महापुरुष भी मिलना चाहिए । कोई सिद्ध योगी के मार्गदर्शन में साधना करने से सिद्धि और पूर्णता हासिल की जा सकती है । उसके लिए रामकृष्ण परमहंस जैसे कोई समर्थ संतपुरुष की जरूरत थी । आदर्श प्रशिक्षक की तलाश में मैं बहुत सारे भगवा वस्त्रधारी साधु संन्यासीओं से जाकर मिला मगर जिसके दर्शन मात्र से संतृप्ति हो, अंतर में शांति का अनुभव हो, एसी कोई विभूति नहीं मिली । योग की साधना में प्राणायाम का विशेष महत्व है, और प्राणायाम में महारथ हासिल हो एसे किसी संत, साधु, महात्मा या उच्च कोटि के साधक की मुझे तलाश थी ।

कहा गया है कि दर्द के पैदा होने के साथ दवा जन्म लेती है । मेरे लिए यह बात सत्य साबित हुई । मेरी खोज परिसमाप्त हुई । मुझे रामकृष्ण परमहंसदेव जैसे महापुरुष तो नहीं मिले मगर मेरी जिज्ञासा की आवश्यक पूर्ति कर सके एसे महात्मा पुरुष अवश्य मिले । एक दिन बडौदा चोखंडी क्षेत्र में योगाश्रम के प्रशिक्षक गिरधरभाई से मै वार्तालाप कर रहा था । उस वक्त एक छोटा-सा बालक आकर कहने लगा, रणमुक्तेश्वर महादेव में संन्यासी महात्मा बसे है, जो प्राणायाम में कुशल है । बस ये कहकर वो बालक निकल गया ।

वो बच्चा कौन था ? मैंने तो उसको पहले कहीं देखा नहीं था मगर उसने मेरे लिए देवदूत का काम किया । मेरे जीवन में जब चिंता की लकीरें खींच रही थी तब उसने आशा की कीरण फैलाई । ईश्वर की कृपा सचमुच आकस्मिक और अनोखे ढंग से होती है । जो ईश्वर के चरणों में मन लगाकर, अपने अंतर के अंतरतम से प्यार करता है, उसकी हरएक जरुरत, चाहे वो छोटी हो या बड़ी, वो जरूर पूरी करता है । अपने शरणागत भक्तों का ख्याल करना उसका स्वभाव है ।

उस वक्त हल्की बारिश हो रही थी मगर मुझे उसकी परवाह नहीं थी । बारिश में भीगते हुए मैं रणमुक्तेश्वर महादेव की ओर निकल पडा । वो बालक ने जिसका जीक्र किया वो महात्मा पुरुष के दर्शन के लिए मेरा दिल बेचैन हो उठा । रणमुक्तेश्वर महादेव का रास्ता गोयागेट से होकर निकलता है । वहाँ पहुँचने में मुझे ज्यादा वक्त नहीं लगा । स्वामीजी मंदिर के उपर के मजले पर निवास करते थे । उनका नाम शांताश्रम था मगर लोग ज्यादातर उन्हें मगर स्वामी के नाम से पहचानते थे । उनका मुख तेजस्वी और शांत था । वे एक गद्दे पर, जिन पर गेरुआ रंग की चद्दर बिछाई हुए थी, बैठे थे । उन्होंने गेरुआ वस्त्र धारण किये थे । पीछे उनका दंड था, जिससे वो दंडी स्वामी थे एसा मालूम पडता था । सामने एक लकडी की पेटी थी जिसमें कुछ ग्रंथ थे । मैंने अनुमान लगाया की महात्मा विद्वान और पढाई के शौकिन है । आसन के पीछे उनका कमंडल पडा था । कमरे का वातावरण शांत और प्रेरणात्मक था । स्वामीजी ने मेरे निवास के बारे में पूछताछ की । बातचीत ज्यादा लंबी न चली । कुछ ही देर में शाम का वक्त हुआ । स्वामीजी ने कहा की अब शाम ढल चुकी है अतः घर जाकर संध्याकर्म करना चाहिए ।

स्वामीजी गुजराती समझते थे । उनका जन्म बंगाल में हुआ था मगर लंबे अरसे से वे गुजरात में रहते थे इसलिए ज्यादातर बात हिन्दी में करते थे ।

शाम के वक्त आसमान संध्या के अवनविन रंगों से भर गया । चिडीयाँ अपने अपने घोंसले की ओर जाने लगी । स्वामीजी अपने कमरे में संध्यापूजा की तैयारी करने लगे ये देखकर मैंने उनको प्रणाम किया और घर की ओर निकल पड़ा ।

यह मेरी प्रथम मुलाकात थी । भले वो छोटी थी मगर उसकी असर शकवर्ती थी । वृक्ष का बीज कितना छोटा और साधारण होता है ? मगर वही बीज से हैरत में डालनेवाले विशाल वटवृक्ष का निर्माण होता है । आग का एक सूक्ष्म अंगार कितना छोटा होता है ? मगर उसी अंगार से दावानल का सर्जन होता है । बिल्कुल उसी तरह सत्संग भले कुछ ही क्षण का हो, उनमें जीवन परिवर्तन की ताकत होती है ।

स्वामीजी के प्रथम परिचय से मेरा होसला बुलंद हुआ । मुझे यकीन हो गया कि उनके मार्गदर्शन से मेरी आत्मिक उन्नति का मार्ग निष्कंटक हो जायेगा । ईश्वर की कृपा से यकायक मुझे उनके जैसे समर्थ संतपुरुष के मिलन का सौभाग्य मिला । भावनाओं के प्रबल प्रवाह में जोशीले कदम से चलता हुआ मैं कब वापिस घर आया उसका मुझे पता नहीं चला ।

फिर तो रणमुक्तेश्वर महादेव जाना मेरा नित्यक्रम बन गया । हररोज कम-से-कम एक दफा और कई बार दो दफा मैं वहाँ जाता । स्वामीजी से कुछ खास बातचीत नहीं हो पाती क्योंकि उनका स्वभाव शांति से कमरे में बैठे रहने का था, मगर प्रेम और उत्साह से भरा मैं हररोज उनकी संनिधि में जाकर बैठता ।

किसीको लगेगा की यह तो बडा आसान काम है, मगर हररोज जाकर एक जगह पर शांतिपूर्वक बैठना कोई आसान काम नहीं है । ज्यादातर लोग मौन पसंद नहीं करते, उन्हें बाते करना अच्छा लगता है । मुझे तो अकेले घुमने का, एक जगह शांतिपूर्वक बैठने का अभ्यास था, इसलिए जो काम औरों के लिए मुश्किल था, वो मेरे लिए आसान हो गया । स्वामीजी का मौन आकर्षक लगने लगा था । उनकी संनिधि में शांति से बैठने में बडा मज़ा आता था ।

स्वामीजी मगरस्वामी के नाम से प्रसिद्ध हुए उसके पीछे रोचक इतिहास था । मैंने कहीं से उनके बारे में सुना । बाद में स्वयं स्वामीजी ने उसका अनुमोदन किया । स्वामीजी वरसों तक सिनोर, जो की नर्मदातट पर स्थित है, वहाँ के शिव मंदिर में रहे । सिनोर में नर्मदाजी का पानी गहरा है और उसमें कई मगर (घडीयाल) रहते है । एक दफा, जब स्वामीजी स्नान करते करते गहरे पानी में चले गये । दुर्भाग्यवश एक मगर ने उनका हाथ पकड लिया । अगर स्वामीजी के जगह कोई दूसरा होता तो वो घबराहट के मारे दम तोड देता मगर स्वामीजी संपूर्ण स्वस्थ रहें । कुशल तरवैया होने के साथ साथ वे प्राणायाम के अभ्यासी थे । उन्होंने मगर का दटकर मुकाबला किया । अपने आपको बचाते हुए वो तट तक आ पहूँचे । गाँव के लोग वहाँ ईकठ्ठा हो चुके थे । स्वामीजी ने किसी भी तरह अपना हाथ मगर से छुडा लिया । मगर ने हाथ का माँस नोंच लिया था । मगर का जहर लगने से उन्हें बहुत पीडा हुई । उन्हें अस्पताल में भर्ती करना पडा । लंबे अरसे की सारवार के बाद वे अस्पताल से रिहा हुए । उनका हाथ पहले की तरह कार्यक्षम नहीं रहा मगर ईश्वर की कृपा से उनके प्राणों की रक्षा हुई । इस घटना के पश्चात उन्होंने नर्मदाजी का त्याग किया । तब से वो मगर स्वामी के नाम से प्रसिद्ध हुए । कुछ दिनों बाद गाँव के लोगो ने मगर को मार दिया ।