उन दिनों गांधीजी ने एक निवेदन प्रसिद्ध किया, जिसमें उन्होंने बताया कि जवाहरलाल नहेरु उनके राजकीय वारिस है । मुझे वो दिन बराबर याद है । मैंने बडौदा की लायब्रेरी में यह निवेदन पढा । पढकर मेरे मन में तरह तरह के विचार उमड पडे । मुझे लगा कि गांधीजी को मेरे बारे में पता नहीं है वरना वे जवाहरलाल को नहीं मगर मुझे अपना वारिस बताते । जवाहरलाल शायद उनके राजकिय वारिस हो सकते है, मगर उनके आध्यात्मिक वारिस होनेकी काबिलयत मुझमें भरी है । उनके बाद उनके आध्यात्मिक संदेश को दुनिया के सामने रखने का कार्य मुझे करना होगा और मेरा जन्म उस की पूर्ति के लिए हुआ है । ईश्वर यह चाहता है की मैं यह करूँ और वक्त आने पर ये सिद्ध होकर रहेगा । एसा सोचकर मेरा मन भावविभोर हो गया । आज भी मुझे उस बात की स्मृति है ।
मगर यह पढकर किसीको हैरान होने की आवश्यकता नहीं है, ना ही कोई गलत अर्थ निकालने की । इसमें मिथ्या अभिमान की बात भी नहीं है । मैंने इसका उल्लेख सिर्फ इसलिए किया ताकि वाचकों को पता चले कि मेरे मन की भूमिका उस वक्त कैसी थी । मेरे मन में कल्पना और आशा के अनंत तरंग फूटा करते थे । दिल में कुछ असाधारण और सर्वोत्तम बनने कि मेरी महत्वकांक्षा थी । आध्यात्मिक साधना के सर्वोत्तम शिखर सर करके मैं देश और दुनिया में आध्यात्मिक क्रांति करना चाहता था । मैं कितनी उच्च भूमिका की तलाश में था, उसका अंदाजा आपको हो सके इसलिए मैंने यहाँ इसका जीक्र करना उचित माना ।
एक ओर बात का यहाँ उल्लेख करना मैं मुनासिब समझता हूँ । स्वामी विवेकानंद और स्वामी रामतीर्थ ने अपने व्याख्यानो में बताया था कि प्रगति का सूर्य पूर्व से पश्चिम की ओर चला गया है मगर वह कुछ ही समय में वो वापिस अपनी प्रदक्षिणा पूर्ण करके पूर्व की ओर चल पडेगा । खास करके भारत उन्नति और समृद्धि के शिखर पर पहूँचेगा और सारे संसार को आध्यात्मिकता का संदेश देगा । विवेकानंद के व्याख्यानो में एसा उल्लेख है कि आनेवाले पचास सालों में भारत की आध्यात्मिक उन्नति का सुवर्णकाल शुरु होगा । विश्वगुरु बनकर भारत विश्व को शांति का मंत्र प्रदान करेगा । विवेकानंद ने यह भी बताया था कि आध्यात्मिक गुरुपद के लिए भारत को समर्थ महापुरुष की आवश्यकता है, जिसमें शंकर का मस्तिष्क, बुद्ध का हृदय तथा कृष्ण का कर्मयोग हो । रामकृष्ण परमहंसदेव को वो अक्सर एसे महापुरुष बताते थे और उनकी विशेषताओं का जीक्र करते थे । विवेकानंद की बातें सुनकर मुझे अक्सर एसा लगता कि ये सब मुझे ध्यान में रखकर कहे गये है । भारत और समस्त संसार को शांति और आध्यात्मिकता का राह दिखानेवाला ओर कोई नहीं मगर मै हूँ ।
विवेकानंद और रामतीर्थ तो अपना कार्य संपन्न करके चल बसे । उनके मुताबिक भारत और पूर्व के देश उन्नति के पथ पर अग्रेसर हो रहे है । भारत गुलामी से आजाद हुआ है । महात्मा गांधीने शांति और आध्यात्मिकता के मंत्र बताये है । उनके नक्शेकदम पर चलकर उनके राजकीय वारसो नें शांति की नीति अखत्यार करके भारत की प्रतिष्ठा बढाई है । भारत समृद्धि के पथ पर अग्रेसर हो रहा है और आगे बढता रहेगा ये निश्चित है । पिछले पचास सालों में भारत में कई आध्यात्मिक विभूतियाँ पैदा हुई, जिनमें श्री रमण महर्षि और श्री अरविंद के नाम विशेष उल्लेखनीय है । भविष्य में क्या होगा यह तो सिर्फ ईश्वर के हाथ में है मगर आध्यत्मिक परंपरा भारत में हमेशा रहेगी यह मेरा मानना है ।
मेरी सोच उस वक्त कच्ची या तो शैशव दशा में थी यह कहेना मुनासिब होगा । मेरी शक्ति, मेरी भूमिका और मेरी योग्यता कुछ भी नहीं थी, मगर मेरे खयालात, मेरी भावनाएँ और मेरे सपने आकाश को छूने के थे । मेरी भावनाओं की उचाँई बताने के लिए ही मैने गांधीजी के निवेदन और उनसे मेरे मन में उत्पन्न भावनाओं का जीक्र यहाँ पर किया है । यह पढकर कोई मुझे महात्मा, महापुरुष या ज्योतिर्धर मानने की भूल न करें, ना ही मुझे प्रभु का प्रतिनिधि या ईश्वर का कोई पार्षद मानें । मेरा एसा कोई दावा नहीं है । मैं तो एक साधारण मनुष्य हूँ और मेरी शक्ति तथा सोच सीमित है । ईश्वर मुझे जो प्रेरणा करता है, मैं वैसा करता हूँ । वो अपनी मरजी से मेरे व्यक्तित्व का निर्माण कर रहा है । मेरा कहने का भावार्थ ये है कि आदमी चाहे कितना भी साधारण क्यूँ न हो, वो असाधारण सपनें देख सकता है, भावना तथा कल्पनाओं के तरंगो में बह सकता है । बडौदा-निवास के उन दिनों में मेरी हालत बिल्कुल वैसी थी ।
मगर हाँ, इतना मैं जरूर कहूँगा कि मै केवल स्वप्नशील नहीं था । भावना तथा कल्पनाओ के तरंग मेरे मन में फूट रहे थे मगर मैं उस आभासी दुनिया में नहीं रहेता था । मैं उद्यमी था और मेरे सपनों को हकीकत में बदलने के लिए कोशिश करता था । मेरे सपनों को सिद्ध करने के लिए मैं चारित्र्यसुधार और साधना का आश्रय ले रहा था । आत्मबल की वृद्धि करके सही मायने में महान बनने की कोशिश में जुटा था ।
सन १९४२ अगष्त में भारत छोडो अभियान शुरु हुआ । उस वक्त अंग्रेज सरकारने गांधीजी सहित कई नेताओ को पकडकर जेल में बन्द कर दिया । उस दौरान मैंने हरिजन बन्धु के लिए तीन लेख लिखकर भेजे थे । हालाकि कुछ ही दिनो में हरिजनबंधु बन्द होने की वजह से लेख अप्रसिद्ध रहे वो अलग बात है । अगर हरिजन बन्धु बन्द न हुआ होता तो मेरे लेख उनमें छपते या नहीं ये मै नहीं कह सकता । मगर अगर वे प्रसिद्ध होते तो हरिजन बन्धु के लिए नियमित रूप से लेख लिखने का मेरा विचार था । यह सब बताने से पाठको को उस वक्त के मेरे उत्साही और आदर्शवादी जीवन की थोडी झाँकी मिलेगी । मेरे तन, मन और अंतर कीस मीट्टी से बना था उसका थोडा अंदाजा आपको होगा ।
बचपन से ही मेरे जीवन में दो तरह के भावनात्मक प्रवाह काम कर रहे है । एक मेरी व्यक्तिगत साधना या तो जीवनविकास का प्रवाह । बेशक उसकी असर मेरे जीवन पर प्रमुखतया देखी जा सकती है । उसके प्रभाव से ही इतनी कम उम्र में मेरा आध्यात्मिक विकास हुआ और ईश्वर-प्रेम से मेरा जीवन भर गया । दुसरा प्रवाह, समष्टि के लिए कार्य करने का, औरों को सहायता करने का, आध्यात्मिकता या धर्म के प्रचार और प्रसार का है । उसे आप ईश्वरीय महिमा का गुणगान कहो या धार्मिक जागृति का प्रयास कहो, या जनसाधारण की भलाई और सुखशांति के लिए किया गया कर्म कहो – शब्द अलग है मगर उसका भावार्थ एक है । उसका विस्तार मानवजाति और समस्त सृष्टि तक व्यापक है । गंगा और यमुना जैसे दो प्रवाह मेरे जीवन में साथ साथ चल रहे है – आज भी और उस वक्त भी ।
मुझे अपने आध्यात्मिक विकास की फिक्र थी । सर्वप्रथम मुझे शक्तिसंपन्न बनना था, आध्यात्मिक सिद्धियों से विभूषित होना था और फिर जनसमुदाय को सुखशांति का मार्ग बताना था । बुद्ध, ईशु, कृष्ण या रामकृष्णदेव की तरह परमात्मा की संपूर्ण कृपा प्राप्त करने के बाद औरों का सहायता करने की बात मेरे मन में बसी थी । मुझे लगता था कि मेरे ध्येय को हासिल करने के लिए काफि साधना की जरूरत है । शिवानंद आश्रम में हुए अलौकिक अनुभव से मुझे बेहद खुशी मिली थी मगर मेरी पूर्णता के पंथ की यात्रा अभी असमाप्त थी । मुझे उस पथ पर चलकर बहुत आगे पहूँचना था ।
मेरा मन योगाभ्यास के लिए आतुर हुआ । मुझे लगा कि योगाभ्यास का आधार लेने से मेरी ध्येय-प्राप्ति आसानी से हो सकेगी ।

