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Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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कई साहित्यकारो ने जीवन की तुलना सरिता से की है । जैसे सरिता सागर की ओर बहेती है वैसे ही मनुष्य का जीवन पूर्णता की खोज में आगे बढता है । सरिता कभी पथ्थरों के बीच अपना मार्ग निकालती है, कभी पहाडों से होती हुई तो कभी मैदानी ईलाकों से निकलती हुई आगे बढती है । कभी उसकी गति तेज होती है, कभी धीरगंभीर और शांत, मगर अपने लक्ष्य की ओर हमेशा आगे बढती है । मार्ग में जो पिपासु आते है, उसकी प्यास बुझाती है । संसार के ताप से तप्त लोग सरिता में स्नान करके ताप से मुक्ति पाते है, अपनी अंतर-तृषा छीपाते है । सर्दी में या गर्मी में, निंदा में या स्तुति में, भिन्न भिन्न परिस्थितियो में अपना संतुलन बनाये रखकर बहेती रहेती है । कर्तव्य प्रति बद्धता और प्रमाद का परित्याग उसका जीवनसंदेश है ।

मेरा जीवन-प्रवाह भी सरिता की भाँति विभिन्न परिस्थितियों से निकलकर ईश्वरप्राप्ति के लक्ष्य की ओर प्रवाहित था । ईश्वरेच्छा से मेरा जीवनप्रवाह भादरण से मुड़कर बडौदा की भूमि पर आ पहूँचा । मैंने बडौदा में नौकरी की तलाश करना शुरु किया । कुछ ही दिनो में मुझे नौकरी मिल गई । लोहाणा बोर्डींग के गृहपति श्री भवानीशंकर शास्त्री, जो बहुत ही अनुभवी और विद्वान पुरुष थे, उन्होंने मुझे छात्रों की देखभाल करने का काम सोंपा । छात्रों में अच्छे संस्कार डालना, उनका चारित्र्य सुधार करना मेरी जिम्मेवारी थी । उनकी शिकायतें सुनकर उनके प्रश्नो का निराकरण करना मेरा प्रधान कार्य था । जीवन के कई साल मैंने अनाथाश्रम में बीताये थे । बच्चों के मानस का और उनकी समस्याओं का मुझे अच्छी तरह से अंदाजा था । मेरे छात्रालय के दिनों में मैंने छात्रों और संचालको के रिश्तों के बारे में काफि मंथन किया था । जब शास्त्रीजीने मेरी नियुक्ति छात्रालयमें की तो मुझे बडी खुशी हुई । शास्त्रीजी की ईच्छा थी की मैं उनसे सब तौर-तरीके सीख लूँ ताकि वो उनकी जगह पर मुझे नियुक्त कर सके । उन्होंने कई दफा इसका जीक्र किया, मगर कुछ काल पश्चात मेरे जीवन में अचानक बदलाव आया, जिससे उनकी ईच्छा पूर्ण न हो सकी ।

लोहाणा बोर्डींग के निवासकाल में छात्रो की समस्याओं को सुलझाने की मैं कोशिश करता । साथ में छात्रों को समूह प्रार्थना करवाता । मेरा विशेष लक्ष्य उनको सदाचारी, स्वच्छ और निर्भय करने में लगा था । मेरा विशेष ध्यान छात्रों के साथ आत्मीय व्यवहार करने पर था जिसके फलस्वरूप वे मुझे आदर और प्यार से देखने लगे । हर इतवार को चर्चासभा का आयोजन करता जिसमें छात्र किसी एक विषय पर अपने विचार प्रकट करते । उनके वकतव्य पर टिप्पणी करके मैं उन्हें ओर बहेतर बनाने की सीख देता । छात्रों में यह कार्यक्रम अत्यंत लोकप्रिय सिद्ध हुआ ।

१९४२ का साल भारत के सत्याग्रह जंग में महत्वपूर्ण था । आजादी की लडाई उस वक्त पूरे जोश में चल रही थी । करेंगे या मरेंगे की भावना से नेता और जनता उसमें संमिलित हो रहे थे । आंदोलन पूरे देश में फैल गया था और देशी राज्य भी उनसे अछूत नहीं थे । बडौदा में आंदोलन का काफि प्रभाव था । ९ अगस्त को गांधीजीने भारत छोडो का एलान किया । सभी लोगों ने उसे जोश और जूनुन से स्वीकार किया । भारत की आझादी के इतिहास में वो दिन सुवर्ण अक्षरो से अंकित किया जायेगा । आजादी पाने की तमन्ना लोगों के दिलो में बुलंदी पर थी । मेरे हृदय में भी देशप्रेम की भावनाएँ उछल रही थी । देश और उसकी आजादी मुझे अत्यंत प्यारी थी । स्वतंत्रता की जंग को मैं अत्यंत सम्मान और आदर से देखता था । मुझे पक्का यकीन था कि ईश्वर की ईच्छा से हमारा देश अवश्य आजाद होगा । धर्म, अध्यात्म या फिलोसोफी के आधार पर जो व्यक्ति अपने घर, समाज, परिवार या देश और दुनिया के प्रश्नो को नजरअंदाज करे वो मुझे पसंद नहीं था । एसी विचारधारा में विश्वास करनेवाला व्यक्ति चाहे कितना ही महान क्यूँ न हो, मैं उससे आकर्षित होनेवालों में से नहीं था । गाँधीजी देश और दुनिया की भलाई चाहते थे । उनके हृदय में दीन, दुःखी तथा पीडित व्यक्तिओं के लिए सहानुभूति थी और यही वजह थी की मुझे गांधीजी और उनकी विचारधारा से प्रेम था । गाँधीजी की सभी हिलचाल और समाचार मैं अत्यंत रसपूर्वक पढता ।

गांधीजी ने अपनी विचारधारा से मेरे जीवन पर गहरी छाप छोडी । उससे प्रभावित होकर मैंने नियमित रूप से चर्खा चलाना शुरू किया । खादी के वस्त्र तो जी. टी. बोर्डिंग के दिनों से मैं पहनता आया था, यह क्रम यहाँ भी जारी रहा ।

गांधीजी कोंग्रेस की रणनीति तय करते थे और देश की स्वतंत्रता की लडाई की अगवानी कर रहे थे । आजादी के जंग में हिस्सा लेने का मुझमें जोश था मगर मेरी मर्यादाओं का मुझे अच्छी तरह ज्ञान था । वैसे भी आजादी के जंग में हिस्सा लेने का मेरा दृष्टिकोण कुछ अलग था, जिसका जीक्र मैं महर्षि अरविंद को लिए खत में कर चुका हूँ । मेरे हिसाब से मुझे साधनापथ पर आगे चलकर लोकोत्तर शक्तियों से संपन्न होने की आवश्यकता थी । मैं मानता था कि एसी विशेष शक्तियाँ मिलने पर मैं गांधीजी को सहायता पहूँचा सकूँगा । जब तक एसा न हो, तब तक दूर खडे खडे तमाशा देखने के अलावा मेरे पास ओर कोई चारा नहीं था । आजादी के जंग में हिस्सा लेने के लिए सभा-सरघस में शामिल होना, भाषण करना या जेल में जाना अपने आप में महत्वपूर्ण था मगर मेरे प्रकृति और विचार से उसका तालमेल नहीं था । मेरा स्वभाव हमेशा से सर्वश्रेष्ठ बनने का था । किसी सेना के सैनिक होने के बजाय उसका कप्तान होना मुझे ज्यादा पसंद था । बचपन से ही मेरा मन असाधारण और सर्वोत्तम की उपासना करता आया था । उसे किसी साधारण बातो में दिलचस्पी नहीं थी ।

जैसे की यह संस्कृत श्लोक में बताया गया है कि 

कुसुमस्तवकस्यैव द्वे गतीस्ते मनस्विनः ।

मुर्ध्नि वा सर्वलोकस्य विशीर्येत वनेऽथवा ॥

फुल या तो माला में पिरोकर ईश्वर के गले का हार बनता है या तो वन में गुप्तरूप से प्रकट होकर वहीं दम तोड देता है । उन दिनों मेरे मन की भावदशा कुछ वैसी ही थी ।

 

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