Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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कितनी सारी उम्मीदें लिए मैं गुजरात से हिमालय के लिए निकला था ? दिल में कितने अरमान लिए मैंने ऋषिकेश की पवित्र भूमि पर पैर रखा था ? और शिवानंद आश्रम में प्रवेश करते वक्त मैंने क्या कुछ नहीं सोचा था ? मगर स्वामीजी से मेरा वार्तालाप मेरी अपेक्षा से विपरीत रहा । फिर भी मुझे निराशा नहीं हुई, मैंने हिम्मत नहीं हारी, मेरा उत्साह वैसा ही बना रहा । अगर मुझे आश्रम में रहने की अनुमति न मिले तो ईश्वर की कृपा प्राप्त करने के लिए जो भी आवश्यक लगे, उसे करने के लिए मैं कृतसंकल्प था । जब तक शांति की प्राप्ति न हो, वापिस जाने का सवाल ही नहीं था । मेरा हृदय ईश्वर के अनुराग से भरा था । मेरे अंतर के अंतरतम में शांति की झंखना थी, जिसे कीसी भी तरह मुझे पूर्ण करनी थी ।

आश्रम में प्रारंभ के एक-दो दिन मुझे अच्छा नहीं लगा, मगर आश्रम के अन्य सदस्यों से मेरी जान-पहेचान होने के बाद मेरा दिल लगने लगा । वैसे तो मैं आश्रम में साधना करने के लिए लंबे अरसे तक रुकने की तैयारी करके आया था मगर रुकना मेरे नसीब में नहीं था । मेरे निवास के दुसरे या तीसरे दिन मुझे एक अदभूत अनुभव मिला जिससे मेरा जीवन पूरी तरह से बदल गया । उस अनुभव के पश्चात मैंने कुछ ही दिनों में आश्रम का त्याग किया और स्वेच्छा से गुजरात में पुनःप्रवेश किया ।

आश्रम प्रारंभिक अवस्था में था, उसको शुरु हुए कुछ ज्यादा वक्त नहीं हुआ था । आश्रम आर्थिक रुप से इतना सध्धर भी नही था, अतः आश्रम में रहनेवाले साधको के लिए सिर्फ एक बार भोजन की व्यवस्था हो पाती थी । शाम के भोजन के लिए नेपाली क्षेत्र, जो आश्रम से काफि दूरी पर था, जाना पडता था । एसे हालात होने पर भी, आश्रम में मेरे लिए दो वक्त की रोटी का ईंतजाम किया गया । स्वामीजी की आतिथ्य-सत्कार की भावना का इससे अच्छा उदाहरण ओर क्या हो सकता है ?

मेरे आश्रमनिवास का दुसरा या तीसरा दिन होगा । शाम को भोजन करने के पश्चात मैं कीर्तन में शामिल हुआ । कीर्तन के लिए एक अलग कमरा था, जहाँ भगवान श्री कृष्ण का बडा तैलचित्र था । हररोज शाम को सब आश्रमवासी मिलकर वहाँ एकाद घंटा कीर्तन करते थे, धून-भजन इत्यादि होता था । स्वामीजी भी उस वक्त उपस्थित रहते थे । गंगा के तट पर एकांत और शांतिमय माहौल में होनेवाला कीर्तन मनभावन लगता था और उसे सब लोग पसंद करते थे । मेरे ठहरने का इंतजाम कीर्तन-कक्ष में किया गया था इसलिए कार्यक्रम की समाप्ति होने पर मैं बिस्तर बिछाकर वहीँ सो जाता था ।

उस दिन मेरी भावदशा कुछ अलग थी । प्रेम और भक्ति की अवस्था में मेरा हृदय डूबा रहा । मुझे कुछ भी करके, किसी भी हाल में ईश्वर की कृपा का अनुभव करना था । दिन तो एक के बाद एक करके तेजी से निकल रहे थे । मुझे आश्रम में रखने का निर्णय नहीं हुआ था । एसे अनिश्चित हाल में मैं अपना वक्त गुजार रहा था । समझ में नहीं आता था कि क्या करूँ और इसी वजह से दिल बेचैन था । मैंने निश्चय किया की आज तो मैं पूरी रात जागकर प्रभु से प्रार्थना करूँगा । प्रार्थना की असीम शक्ति में मैं विश्वास रखता था । अपनी निजी जिन्दगी में उसका अनुभव मैं कई बार कर चुका था । जब भी किसी समस्या से परेशान हो जाता तब प्रार्थना के माध्यम से अपनी व्यथा ईश्वररूपी माँ को बता देता । प्रार्थना करके अपने दिल की बात बताने से दिल हल्का हो जाता और एक दृढ भरोसा हो जाता कि इस संसारमें मैं अकेला नहीं हूँ । माँ की अमीमय दृष्टि मुझे सदैव सुरक्षित कर रही है । मैं ये महसूस करता कि वो हमेशा मेरे पास है । आपतकाल में वो मेरी अवश्य सहायता करेगी । मुझे हिमालय आने की प्रेरणा उसने दी है, तो वो ही मेरा योगक्षेम वहन करेगी । मुझे फिक्र करने की कोई आवश्यकता नहीं । इस भरोसेने मुझे पूरी रात जागकर प्रार्थना करने के लिए बाध्य किया । और वैसे भी, परमात्मा के साथ अनुसंधान करने के लिए प्रार्थना से बहेतर साधन ओर क्या हो सकता है

कार्तिक माह चल रहा था इसलिए ठंड अधिक थी । मेरे पास ओढने के लिए कुछ खास नहीं था, एक साधारण कम्बल ही था । रामचंद्र नामक एक सत्पुरुष ने मुझे गर्म कंबल दिया जिससे मेरी ठंड कुछ कम हुई । कीर्तन कक्ष में दिया जल रहा था और उसकी रोशनी में भगवान कृष्ण का फोटो चमक रहा था । मैंने भगवान कृष्ण की तसवीर को लक्ष्य बनाकर उत्कट हृदय से प्रार्थना करना प्रारंभ किया । मैं तो एक साधारण बालक था, मुझमें न तो योग था, न ज्ञान, न संयम और ना ही कोई विशेष भक्ति । मेरी उम्र भी छोटी थी, मेरा अनुभव सिमीत था, मगर मेरा विश्वास अतूट था । मुझे भरोसा था कि मेरे जैसे साधारण बालक की प्रार्थना वो जरूर सुनेगा । ठीक ही तो कहा है कि निर्बल के बल राम – मैं निर्बल और निराधार था । मेरे लिए उसकी कृपा ही सबकुछ थी । भाव की अवस्था में मुझे तुलसीदास की प्रसिद्ध पंक्तियाँ याद आयी ।

अजामिल, गीध व्याघ ईनमें कहो कोन साध,
पंछी को पद पढात, गणिका को तारी ।
दीनन दुःख हरण देव, संतन हितकारी ।

अजामिल, गीध, व्याध और गणिका जैसे कितने लोगों को उसने पार उतारा है, वो क्या मुझे पार नहीं करेगा ? मेरा हृदय प्रश्न करता और तुरन्त अंदर से उत्तर मिलता की मेरी नैया वो जरूर पार उतारेगा, मुझे शांति प्रदान करेगा और मेरा भला करेगा ।

दिल में भावनाओं का प्रवाह अत्यंत प्रबल होता चला । मेरी आँखो से अविरत अश्रु बहने लगे । एसी अवस्था में मेरी आँख कब लग गई उसका मुझे पता नहीं चला । जब आँख खुली तो चारों ओर अंधेरा था, हवा के झोकों के अलावा पूरे कक्ष में सन्नाटा था । शायद रात के दो या तीन बजे थे । कंबल ओढकर, पद्मासन जमाकर मैंने पुनः प्रार्थना करना प्रारंभ किया । मेरा दिल बेकरार था, उसमें अजीब सी बेचैनी थी । ध्यान की उस अवस्था में मेरा देहभान कब चला गया उसका पता मुझे नहीं चला । ध्यानावस्था में शरीरभान लुप्त होने का यह प्रथम अवसर था । यह अनुभव कितने वक्त तक रहा उसका मुझे कोई अंदाजा नहीं रहा । मगर जब मैं देहभान से विमुक्त, समाधि जैसी अवस्था से जाग्रत हुआ तो मेरा मन पूरी तरह से शांत हो गया । अलौकिक शांति का अनुभव जारी था तब यकायक मेरे हृदय की गहराईयों में से एक आवाज आयी । उसके शब्द बडे सुमधुर और स्पष्ट थे । शब्द किसके थे उसका मुझे पता नहीं था मगर मैं उसे ठीक तरह से सुन रहा था, ‘तुम नित्य सिद्ध हो, नित्य बुद्ध हो, नित्य मुक्त हो । संसार के किसी भी कोने में चले जाओ मगर माया तुम्हे नहीं छू पायेगी । बंधन में तुम कभी नहीं फँसोगे इसलिए चिन्ता करने की कोई आवश्यकता नहीं है । अपनी मरजी के मालिक होकर तुम जहाँ चाहे वहाँ जा सकते हो ।’

शब्द बिल्कुल स्पष्ट थे । बडौदा में भगवान बुद्ध का जाग्रत अवस्था में दर्शन मिलने के बाद यह दुसरा अलौकिक अनुभव था । इससे मुझे अपार शांति मिली, मेरी बेचैनी चली गई, दिल में खुशी के फव्वारे फुटने लगे । मेरा जीवन धन्य हो गया । ईश्वर ने मेरे जैसे साधारण बालक पर अलौकिक कृपा की वर्षा की । मुझे लगा कि मेरा हिमालय आना सफल हुआ ।

मेरे लिए यह अनुभव बिल्कुल अनपेक्षित और अभूतपूर्व था । मैंने धर्मग्रंथो में आकाशवाणी और आत्मा की आवाज के बारे में पढा था । क्या मेरा अनुभव उसी कक्षा का था ? अगर एसा न हो तो भी मुझे कोई फर्क नहीं पडता । इस अनुभव से मुझे जो आनंद और शांति मिली उसे मै शब्दो में बयाँ नहीं कर सकता । मेरी डायरी के पन्नो में उसे लिपिबद्ध करके मैं कक्ष के बाहर झाँकने लगा । जिस तरह मेरे दिल में माँ की करुणा रूपी बारिश हुई थी उसी तरह बाहर भी हल्की बारिश हो रही थी । मैं सुबह होने की प्रतिक्षा करने लगा ।