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Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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सुबह होने पर कक्ष का दरवाजा खोलकर मैं बाहर निकला । ब्राह्ममूहूर्त में हुए अलौकिक अनुभव की असर अब भी दिलोदिमाग को तरबतर कर रही थी । मेरे अंग-अंग में अवनविन चेतना का संचार था, एसा लगता था मानो मेरा नया जन्म न हुआ हो ? हिमालय-प्रवेश के कुछ ही दिनो में ईश्वर की कृपा का अनुभव होने से मेरा हृदय भावुक हो गया । मेरा जीवन, मेरी यहाँ तक आने की महेनत सार्थक लगी । दिल पर जो अशांति, द्विधा और असमंजस का बोज था वो उतर गया और उसकी जगह आनंद, शांति और निश्चिंतता फैल पडी । कितनी अदभूत क्षण थी वो ?

मैं कक्ष से बाहर निकला और आश्रम में टहलने लगा । गंगा का आकर्षक प्रवाह सामने दिखाई पडा । मैं सोचने लगा कि मेरे जैसे कितने अनगिनत साधक गंगा के प्रशांत तट पर साधना करके शांति-संपन्न हुए होंगे ? भागीरथी के इस पवित्र प्रवाह ने अध्यात्म मार्ग के कितने प्रवासीओं को नवजीवन की प्रेरणा दी होगी ? कितने श्रेयार्थी यहाँ सिद्ध और समर्थ महापुरुष बनकर पूर्णता में प्रतिष्ठित हुए होंगे ? कई सदीयों से माँ गंगा अपने बच्चों को यहाँ अपना प्यार बाँट रही है । उसकी ईश्वरीय शक्ति को मैंने मनोमन प्रणाम किया । आनंद और भावविभोर होकर मैंने हल्की बारिश में आत्मा और परमात्मा की एकता का गीत गुनगुनाया । बिल्कुल उसी वक्त स्वामीजी मेरे पास आये । वैसे तो हररोज सुबह वो मुझे एक बार देख लेते मगर मेरी आज की अवस्था को देखकर उन्हें ताजुब्ब हुआ । मैं इतना खुश और हर्षित क्यूँ हूँ ये उनकी समझ में नहीं आया । मैंने उनकी जिज्ञासावृत्ति को शांत करते हुए खुलासा किया, ‘आज सुबह करीब ब्राह्ममूहुर्त में मुझे एक अदभूत अनुभव मिला, साथ में देहातीत अवस्था का आनन्द भी । मुझे अनुभूति हुई की मैं शुद्ध, बुद्ध और मुक्त आत्मा हूँ तथा किसी भी प्रकार के बंधन से मैं मुक्त हूँ । इस अनुभव के दिव्य आनंद को व्यक्त करने के लिए मैं गुनगुना रहा था ।’

मेरे स्पष्टीकरण से वे प्रसन्न हुए । जिससे थोडी जान-पहचान थी एसे आश्रम के अन्य सदस्य भी मेरे अनुभव से प्रसन्न हुए । उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ कि आश्रम में निवास करते बरसों बीत गये और कई दफा कीर्तन कक्ष में भजन गायें मगर एसा अनुभव उन्हें कभी नहीं हुआ, और आश्रम निवास के चंद दिनों में मुझे एसा अलौकिक अनुभव मिला । मगर इसमें कोई हैरानी की बात नहीं है । बात यूँ थी की मेरे आश्रम में आने के पूर्व लंबे अरसे से मैं जीवनशुद्धि के प्रयासों में जुटा था । शांति की झंखना मेरे दिल में कायम थी । पूर्वजन्म के संस्कारों की बात को नजरअंदाज करे फिर भी परमात्मा के साक्षात्कार के लिए मैंने अब तक जो प्रयास किये थे उसका यह नतीजा था । मेरे कहने का यह मतलब है कि मुझे जो अनुभव मिला वो बिल्कुल आकस्मिक नहीं था, उसके पीछे कुछ पूर्वभुमिका, कुछ आवश्यक तैयारी अवश्य थी । मेरी अब तक की जीवनकथा को पढनेवाले वाचक इस बात से अच्छी तरह से ज्ञात होंगे । हाँ, मैं यह अवश्य मानता हूँ कि ईश्वर की लीला अनंत है और वो किसी भी व्यक्ति को अपनी ईच्छा से कोई भी अनुभव देने में समर्थ है । वो किसको कब, कहाँ और किस प्रकार का अनुभव देता है यह उनके उपर निर्भर करता है । उसके बारे में टिप्पणी करने वाला मैं कौन होता हूँ ?

अनुभव मिलने पर मेरी कायापलट हो गई । मेरी शांति की झंखना कुछ हद तक शांत हुई । वैसे भी आश्रम में मुझे रहने की अनुमति नहीं मिली थी । स्वामीजी से प्रथम दिन जो बातचीत हुई थी वो कुछ खास उत्साहवर्धक नहीं थी । मुझे लगा कि हिमालय आनेका मेरा निर्णय सिद्ध हुआ, अब यहाँ ज्यादा रुकने की कोई आवश्यकता नहीं है । मैंने बडौदा रमणभाई को पत्र लिखकर सब हकिकत बयाँ की और बडौदा वापिस आने के लिए धनराशि का इंतजाम करने को कहा । उनका मनीओर्डर आने तक आश्रम में रुकने का मैंने निश्चय किया ।

मेरा निश्चय जानने के बाद स्वामीजी तथा आश्रम के अन्य सदस्य मुझसे नाराज हुए । उन्हें मुझसे थोडा लगाव-सा हो गया था । उनकी इच्छा थी की मैं आश्रम में हमेशा के लिए रुक जाउँ । वे मुझे समझाने लगे, ‘आश्रम के आध्यात्मिक वातावरण में रहने से तुम्हारी आध्यात्मिक उन्नति जल्दी होगी । वक्त आने पर तुम स्वामी विवेकानंद की तरह विदेश जाकर धर्मप्रचार कर पायेगें, यश और किर्ती प्राप्त कर सकेगें ।’

उनके एसे अभिप्रायों के बावजूद मेरा बडौदा वापिस जाने का निर्णय यथावत रहा । ईश्वर की शायद यही ईच्छा थी की मैं गुजरात वापिस आउँ । अगर उसकी मरजी गुजरात ले जाने की थी तो मैं ऋषिकेश कैसे रह सकता था ? अगर शिवानंद आश्रम में मैं रुक जाता तो मेरी आध्यात्मिक प्रगति कैसी रही होती ये कौन बता सकता है ? मगर एक बात निश्चित है की मेरा जीवनपथ आज जो है उससे पाफि हद तक अलग होता । शायद ईश्वर की ईच्छा मुझे आश्रमजीवन से मुक्त रखने की थी और मेरे लिए उसकी यह योजना मंगलकारक सिद्ध हुई । मेरे वापिस गुजरात जाने के निर्णय से मुझे लाभ ही हुआ ।

शिवानंद आश्रम से कुछ दूरी पर रामतीर्थ लायब्रेरी थी, जो स्वामी रामतीर्थ के नाम से जुडी हुई थी । फुर्सत के वक्त में मैं वहाँ जाकर किताबें पढता । पढते-पढते स्वामी रामतीर्थ के जीवन के कई प्रसंग मेरी मन की आँखो के सामने दिखाई देतें और मेरा हृदय अजीब संवेदना से भर आता ।

कुछ ही दिनों में बडौदा से मनीओर्डर आ पहूँचा । स्वामीजी ने मुझे आश्रम में रुकने के लिए कहा मगर मेरा मन नहीं माना । मुझे लगा कि मेरा हिमालय आने का हेतु सिद्ध हो गया इसलिए आश्रम में ज्यादा रुकने की जरूरत नहीं रही ।

मैने कहा, ‘अब मैं गुजरात वापिस जाउँगा । मुझे अब सभी जगह परमात्मा की झाँकी हो रही है ।  इसलिए मै कहीं पर भी रहूँ, मुझे कोई फर्क नहीं पडता । मैं सदैव दिव्य आनंद का अनुभव करुँगा ।’

‘तो फिर ये रूपये अपने पास क्यूँ रखते हो ? उसे गंगा में क्यूँ नहीं फेंक देते ?’ स्वामीजी ने मेरी बात काटते हुए कहा ।

मैंने कहा, ‘रूपया, गंगाजी और फैंकनेवाला सब एक है, तो फिर कौन किसको कहाँ फैंकेगा ? और क्यूँ फैंकेगा ? यह रूपये तो बडौदा जाने के काम आयेंगे । उसे फैंकने का मतलब उसका तिरस्कार करना होगा जो भेद दृष्टि के अलावा नहीं हो सकता ।’ 

स्वामीजी मेरे उत्तर को सुनकर हँसने लगे । उनका स्वभाव बड़ा नम्र और सरल था । आज तो उनकी ख्याति चारों ओर फैल पडी है । हिमालय का उनका आश्रम कई जिज्ञासु लोगों के आकर्षण का केन्द्र बन चुका है । भारत की सीमाओं का अतिक्रमण करके उनका नाम और उनका काम सारी दुनिया में फैल गया है । भारत के वर्तमान संतपुरुषों में उनकी अपनी विशेष जगह है ।

आश्रम में करीब पंद्रह दिन ढहरने के बाद मैं वहाँ से निकल पडा । हालाकि वो पंद्रह दिन मेरे लिए बहुत महत्वपूर्ण थे । उन दिनों ने मुझे बहुत कुछ सिखाया । वहाँ जाने से पहले मैं एक साधारण साधक था मगर अब शांति प्राप्त करनेवाला सफल प्रवासी था । आज बरसो बाद मैं कह सकता हूँ कि वो अनुभव उत्तम जरूर था मगर सर्वोत्तम नहीं था । ईश्वर के साक्षात्कार और पूर्ण कृपा की प्राप्ति के लिए  मुझे विशेष साधना करने की आवश्यकता थी । मेरा सदभाग्य था की यह समझने में मुझे देर न लगी ।

जिस दिन मुझे वह अलौकिक अनुभव मिला, उस दिन मैंने एक गीत लिखा । उसके शब्दों से मेरी मनोदशा का अंदाजा होगा । उस गीत को गुनगुनाते हुए मैंने ऋषिकेश से विदाय ली ।

 

परमानंद स्तोत्र

जो संशय थे वो सब चले गये,

जो मैल था वो साफ हुआ,

मैं चाहे जंगल में रहूँ या महल में,

मुझे कहीं कोई बाँध नहीं सकता ।

 

मैं सदा मुक्त बुद्ध और चैतन्य मूर्ति हूँ,

मैं स्वरूप-स्थित, कूटस्थ और शांति मूर्ति हूँ,

मैं चाहे जंगल में रहूँ या महल में

मैं सदानंद मूर्ति हूँ, मुझे कोई बंधन नहीं है ।

 

मैं सृष्टि के आरंभ में था, और आज हूँ,

मैं भिन्न हूँ और अलिप्त रहूँगा,

मैं चाहे जंगल में रहूँ या महल में

मैं सदामुक्त मूर्ति हूँ, मुझे कोई बंधन नहीं है ।

 

योगी और मुनिजन जिसे ढूँढते है,

भक्त जिसका दर्शन करने की कामना करते है,

जंगल या महल – मैं सब जगह उसे देखता हूँ,

मैं सदानंद मूर्ति हूँ, मुझे कोई बंधन नहीं है ।

 

मुझे मौत नहीं, ना ही कोई बंधन,

मुझे किसी प्रकार का कोई लेपन नहीं है,

मैं सच्चिदानंद स्वरूप हूँ, दैवी हूँ,

मैं सदा मुक्त मूर्ति हूँ, मुझे कोई बंधन नहीं है ।

 

भगवे वस्त्र धारण करके धुमने की जरूरूत नहीं

आश्रम या गिरिकंदराओं में रहने की जरुरत नहीं,

मैं सदैव शुद्ध हूँ, सब से जुडा हुआ हूँ,

अब मैं सब जगह आत्म-तत्व का दर्शन करता हूँ ।

 

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