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Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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भारत की आध्यात्मिक क्षितिज पर पीछले दोसो वर्ष में जो असाधारण शक्तिसंपन्न महापुरुषों का आविर्भाव हुआ है, इसमें भगवान रमण महर्षि प्रमुख है । उनके स्थूल देहत्याग के बाद भी वो काम कर रहे है, एसा कई लोगों का अनुभव है । आज भी जो उनके अनुग्रह की कामना करता है, उसे महर्षि की संनिधि का लाभ मिलता है । मैं इसके समर्थन में अपने कुछ स्वानुभवों को यहाँ बाँटना चाहूँगा ।

सन १९६९ के मार्च महिने में मैं बंबई था । तब बिना किसी पूर्व परिचय, आर. आर. शेठ कंपनी के श्री भगतभाई और श्री धीरुभाई मुझे मिलने आये । उन्होंने मेरे आगे रमण महर्षि के जीवन और कार्यों पर ग्रंथ तैयार करने का प्रस्ताव रक्खा । महर्षि के प्रति मेरा विशेष स्नेहभाव था, इसलिये मैंने फौरन हाँ कर दी । मुझे लगा की उनके ज्योतिर्मय जीवन का आलेखन करने से आम जनता को लाभ होगा । मुझे ये भी लगा की महर्षि की प्रेरणा से यह प्रस्ताव मेरे पास आया है । मैंने ग्रंथ लिखने के लिये उनकी नहीं बल्कि उन्होंने इसे लिखवाने के लिये मेरी पसंदगी की है । मैं केवल निमित्त हूँ, सभी काम उनको करने है । एसे कार्य में सहभागी होने का अवसर मिलने पर किसको आनंद नहीं होगा ?

मैंने रमणाश्रम से कुछ किताबें मँगवाई । लेखन का आरंभ महर्षि के जीवनप्रसंगो से किया । बीच में भगतभाई मुझसे मिलने आये । उस वक्त मैं अहमदाबाद था । उन्होंने महर्षि के जीवन पर लिखे हुए देढसो पृष्ठ देखें । इससे प्रसन्न होकर वो बोले: 'आपकी कलम बहुत अच्छी चल रही है । मगर एक मुश्किल आन पडी है । इसके कारण किताब के प्रकाशन का कार्य बन्द रखना पडेगा ।'
मैंने पूछा, 'कैसी मुश्किल ?'
'हमने महर्षि के जीवन पर पुस्तक प्रसिद्ध करने के लिये रमणाश्रम से अनुमति की याचना की थी मगर उन्होंने एसा करने से इन्कार कर दिया है । अपनी सफाई में उन्होंने कहा है की महर्षि के जीवन पर बहुत सारी किताबें उपलब्ध है, इसमें और इजाफा करने की आवश्यकता नहीं है । उनकी रजामंदी के बिना हम कुछ नहीं कर सकते । इसलिये हमें ग्रंथ के प्रकाशन का विचार मुलत्वी रखना होगा ।'

मैं सोच में पड गया । महर्षि के जीवन पर कोई भी व्यक्ति अपनी मरजी से लिख सकता है, इसमें आश्रम को क्या आपत्ति हो सकती है ? हाँ, इसके लिये अगर हम आश्रम के पुस्तकों का इस्तमाल करते है, तो बात अलग है । मैंने महर्षि के जीवन पर लिखना जारी रक्खा । मुझे विश्वास था की अगर महर्षि की ईच्छा है तो यह किताब अवश्य लिखी जायेगी और प्रकाशित भी होगी ।

भगतभाई ने मुझे रमणाश्रम को स्वतंत्र रूप से चिठ्ठी लिखने की सलाह दी । मैंने प्रार्थना करके महर्षि का संपर्क किया और उन्हें परिस्थिति से वाकिफ किया ।
महर्षि ने कहा, आप आश्रम के ट्रस्टीओं को खत लिखो । आपको उनकी अनुमति मिल जायेगी, मैं आपको दिलाउँगा । मेरी इच्छा है की आप मेरे जीवन पर किताब लिखो । मैंने इसके लिये आवश्यक भूमिका का निर्माण किया है ।

महर्षि की प्रेरणा मिलने पर मैंने रमणाश्रम के ट्रस्टीमंडल के नाम चिठ्ठी लिखी । ट्रस्टीमंडल के अध्यक्ष और महर्षि के छोटे भाई स्वामी निरंजनानंद के सुपुत्र वेंकटरामन ने चिठ्ठी का उत्तर दिया । इसमें लिखा था की आप जैसे व्यक्ति एसा सर्वोपयोगी सत्कर्म करें इसमें हमें कोई आपत्ति नहीं है, बल्कि हमें इस बात की खुशी होगी । आप निःसंकोच होकर लेखन करो ।

मैंने उनका अंतःकरणपूर्वक आभार माना ।

महापुरुषो की अदृष्ट अचिंत्य आत्मशक्ति किस तरह से कार्य करती है, और कैसे नामुमकिन को मुमकिन करती है, इसका मुझे स्वानुभव हुआ ।

मैंने महेसूस किया की महर्षि की इच्छा, प्रेरणा और कृपा से यह कार्य हो रहा है । ग्रंथ लिखते वक्त मुझे महर्षि की सुखद संनिधि का सतत अहेसास होता रहा । मुझे लगा की वो मेरे पास और साथ है, तथा मेरी गतिविधि का निरीक्षण कर रहे है । मुझे सर्व प्रकार से सहायता कर रहे है ।

महर्षि के जीवन पर जब मैं किताब लिख रहा था, उन्हीं दिनों की बात है । तारीख ९ जुलाई, १९६९ को सुबह करीब साडे चार बजे ध्यानावस्था में महर्षि का दर्शन हुआ । उन्होंने केवल कौपीन धारण किया था ।

मैंने कहा: 'मैं आपके जीवन पर किताब लिख रहा हूँ, क्या आपको यह अच्छा लगता है ?'
उन्होंने कहा, 'हाँ, बहुत अच्छा लगता है । आप इतने प्यार से जो लिख रहे हो ।'
'मैंने पुस्तक का नाम 'भगवान रमण महर्षि: जीवन और कार्य' रक्खा है, ये ठीक है ?'
'हाँ, बिल्कुल ठीक है ।'
फिर उनके साथ कुछ अन्य मसलों पर बात हुई ।

किताब लिखते वक्त उनके दिव्य दर्शन का लाभ मिलता रहा । इससे मुझे जो आनंद मिला इसका वर्णन करने के लिये मेरे पास शब्द नहीं है ।

सितम्बर महिने में महर्षि की आध्यात्मिक प्रश्नोत्तरी का लेखनकार्य चल रहा था । इसकी परिसमाप्ति के बाद महर्षि के पत्रसाहित्य के बारे में लिखना शेष रहा था । मैंने आर. आर. शेठ कंपनी से महर्षि की कुछ किताबें मंगवाई थी । मगर उन्हें 'letters from Ramanashram' नहीं मिली । जब तक यह किताब मुझे नहीं मिलती, महर्षि के पत्रसाहित्य के बारे में लिखना असंभव था । मैंने रमणाश्रम के श्री वेंकटरामन को खत लिखा । उनका प्रत्युत्तर आया की ये पुस्तक अभी उपलब्ध नहीं है, उसका पुनःमुद्रण हो रहा है । तीन महिने के बाद जब उसका पुनःमुद्रण हो जायेगा, हम आपको उसकी प्रत भेज देंगे ।

मगर जब तक किताब पुनःमुद्रित नहीं हो जाती, मैं क्या करूँगा ? मैंने महर्षि का मार्गदर्शन माँगा । उन्होंने मेरी प्रार्थना का प्रत्युत्तर देते हुए कहा की मैं आपको यह किताब एक सप्ताह में दिला दूँगा । आपका कार्य नहीं रुकेगा ।

महर्षि के इस अनुभव के बाद वेंकटरामन का खत आया जिसमें उन्होंने लिखा था की लायब्रेरी में तपास करने पर पुस्तक की एक प्रत मिली है, इसे हमने वी.पी. से रवाना की है । आप उसे छुडा लेना ।

महर्षि की सुचनानुसार एक सप्ताह के अंदर वो किताब मुझे मिल गयी । मैं प्रश्नोत्तरी का विभाग पूर्ण करके अगले दस दिन तक निरीक्षण करता रहा । फिर मैंने महर्षि के खतों के बारे में लिखना प्रारंभ किया । मेरी भावना के मुताबिक मुझे एक दिन भी निरर्थक नहीं बैठना पडा ।

महर्षि के इन अनुभवों से एक बात स्पष्ट होती है की वो देश और काल से पर थे । आज भी, जो उनका सच्चे दिल से इनका शरण लेता है, उनके अनुग्रह के लिये प्रार्थना करता है, वो निराश नहीं होगा । मेरे अनुभवों से किसी श्रद्धाभक्तिसंपन्न साधक को मदद मिलती है, तो मेरा परिश्रम सार्थक होगा, मुझे प्रसन्नता होगी ।

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