सन १९६३ में मसूरी की थियोसोफीकल सोसायटी की और से हर बुधवार को मेरे प्रवचन आयोजित किये गये । फिर गांधीनिवास सोसायटी की और से संस्था के मध्यवर्ती होल में मेरे प्रवचन आयोजित किये गये । जब गांधीजी मसूरी आते थे, तो वो बिरला हाउस में रहते थे । एक दफा उन्होंने इच्छा जतायी की मसूरी में गरीबो की सेवा के लिये कोई संस्था होनी चाहिये । एसी संस्था, जो दीनदुःखीयों की मदद करें, समाजकल्याण का काम करें, और जब मैं मसूरी आउँ तो वहाँ रह सकूँ । गांधीजी की इच्छा से मसूरी में गांधी निवास सोसायटी की स्थापना हुई । एक मकान खरीदा गया । हालाकि गांधीजी अपनी इच्छा को पूरी करने मसूरी नहीं आ सके । उनका देहांत हो गया । ईश्वर की कोई मंगलमयी योजना के तहत मैं गांधी निवास सोसायटी के संपर्क में आया और वहाँ रहने लगा । गांधीनिवास सोसायटी का मेरा निवास एतिहासिक सिद्ध हुआ, मुझे मसूरी की सत्संगप्रेमी जनता का बेहद प्यार मिला ।
नवभारत होटल में छे साल रहने के बाद मैं माताजी के साथ रामा होटल में अगले दो साल रहा । वहाँ मेरी भेंट दिल्ली के सुप्रसिद्ध उद्योगपति श्री एच. एस. दास से हुई । वो मेरे व्याख्यानों मे नियमित रूप से आने लगे । उनका प्रेमभाव अनन्य था । उन्होंने अन्य भाविकजनों से विचारविमर्श करके यह निर्णय लिया : ‘योगेश्वरजी होटेल का कमरा किराये पर लेकर हमें प्रवचनों का लाभ देते है । वो ग्रीष्म ऋतु में यहाँ आकर रह सके और उन्हें होटल का किराया न भरना पडे इसके लिये हमें उनके रहने की व्यवस्था करनी चाहिये ।’
इसके मुताबिक गांधी निवास सोसायटी का उपरी हिस्सा, जो की जीर्णावस्था में था, उसे ठीक करने तथा उसे शौचादि सुविधा से संपन्न बनाने का निर्णय लिया गया । दास साहब ने इसके लिये पाँच हजार रुपये की सहायता की और बाकी की रकम एकत्र करने का प्रस्ताव रक्खा ।
२८ अगस्त १९६५ के दिन गांधी निवास सोसायटी की शासक समिती की बैठक में सर्वसम्मति से संबंधित प्रस्ताव पारित किया गया: 'वर्तमान होल के उपर के कमरे को स्नानगृह, शौच, रसोईघर आदि आवश्यक सुविधा के साथ निवासस्थान में तबदील किया जायेगा । उसके लिये आवश्यक नक्शा श्री महावीरप्रसादजी बनायेंगे । श्री योगेश्वरजी महाराज के व्याख्यानों से सोसायटी को लाभ होता है, इसलिये इस निवासस्थान में रहने के लिये उनको बिना शुल्क अग्रिम पसंदगी दी जायेगी । इस संशोधन और संवर्धन के लिये आवश्यक रकम एकत्रित करने का प्रयास किया जायेगा ।'
यह प्रस्ताव पारित होने के बाद सन १९६६ से हर साल करीब पाँच महिने हम गांधी निवास सोसायटी में रहने लगे । इसमें से तकरीबन चार महिने मेरे व्याख्यान होते थे । इसके कारण लोगों का ध्यान सोसायटी तथा उसकी प्रवृत्ति की और आकर्षित हुआ । लोग उसमें जुडते गये, उसकी सदस्यता में भारी इजाफा हुआ और संस्था की कायापलट हो गयी । मेरे प्रवचन इसमें सुखद निमित्त हुए ।
प्रवचनों के फलस्वरूप देश के विभिन्न भागों से मसूरी आनेवाले लोगों से मेरा संपर्क हुआ । इससे भारत के विविध भागों में प्रवचन के निमंत्रण मिलने लगे । जब सर्दीयों में मसूरी रहना नहीं होता था तो दहेरादून, ऋषिकेश, मेरठ, मुझफ्फरपुर, दिल्ली, आगरा, वृंदावन, अलीगढ, कानपुर, इलाहाबाद, कोलकता, कोटा, देवबन्द, जगाधरी, अमृतसर, कपूरथला आदि कई जगहों पर स्कूल-कोलेजों में मेरे प्रवचन आयोजित किये गये । इतना ही नहीं, बंबई, पूना, नागपुर और गुजरात में बडौदा, सुरत, वलसाड, अतुल, भरुच, झगडीया, नडीयाद, आणंद, धोलका, भावनगर, राजकोट, पोरबंदर, मोरबी, जूनागढ, मांगरोल, जामनगर आदि कई शहरों में मेरे कार्यक्रम आयोजित किये गये । प्रवचनों की प्रवृत्ति इस तरह फैलती गयी ।
मसूरी में गरीब विद्यार्थीओं के लिये सेवाकार्य का आरंभ हुआ । सन १९६९ से लेकर सन १९७६ के बीच आमजनता से चालीस हजार रूपया इकट्ठा किया गया । इन पैसों से मसूरी की अलग-अलग छे स्कूल के छेसौ से ज्यादा छात्रों को शिष्यवृत्ति तथा अन्य सहायता दी गयी ।
९ जुलाई, १९७२ के दिन गांधी निवास सोसायटी की सामान्य सभा में विशेष प्रस्ताव पारित किया गया: 'पीछले कुछ सालों से संत श्री योगेश्वरजी सोसायटी के प्रेरणास्त्रोत बने है । सोसायटी के होल में उनके व्याख्यानों के दौरान इकट्ठे हुए चंदे से जरुरतमंद छात्रों की सहायता होती है । इससे आमजनता की नजर में सोसायटी की प्रतिष्ठा बढी है । योगेश्वरजी के मार्गदर्शन से सोसायटी भविष्य में अनेकविध सामाजिक प्रवृत्ति करना चाहती है तथा मौजूदा प्रवृत्ति का व्याप बढाना चाहती है । इसके लिये सोसायटी अपने 'मेमोरन्डम ओफ एसोसियेशन' में आवश्यक सुधार का प्रस्ताव रखती है । संत श्री योगेश्वरजी आज से सोसायटी के साथ मार्गदर्शक की हेसियत से जुडेंगे तथा सोसायटी का सभी महत्वपूर्ण विषयों में मार्गदर्शन करेंगे ।' मेरे लिये सोसायटी का यह प्रस्ताव अभूतपूर्व था ।

