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Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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भारत संतो की खान है । जितने इश्वरकृपा प्राप्त और इश्वरतुल्य महापुरुष भारत में हुए है, इतने संसार में कहीं नहीं हुए । भारतभूमि में कुछ संत एसे भी हुए है, जो मरणोपरांत लोगों को दर्शन देकर उनकी सहायता करते है । एसे लोकोत्तर संतपुरुषों की श्रेणी में वीरपुर के जलाराम बापा का नाम शामिल है । सन १९५६ में मैंने वीरपुर की मुलाकात ली । जलाराम बापा के बारे में विशेष जानकारी प्राप्त करके मुझे लगा की वो एक लोकोत्तर संतपुरुष है । उनके लिये मेरे मन में आदरभाव पैदा हुआ ।

उनके प्रति मेरी श्रद्धा और आदर का परिणाम कहो या कुछ और, मगर १० अगस्त, १९५७ को शनिवार रात साडे ग्यारह बजे मुझे उनका दर्शन हुआ । तब मैं ऋषिकेश में था । उनका स्वरूप अत्यंत गौर, सौम्य और तेजोमय था । उनके साथ जो बातचीत हुई, वो गोपनीय होने के कारण यहाँ बताना ठीक नहीं समजता । जलाराम बापा के भक्त तथा उनमें विश्वास रखनेवाले भक्तों की श्रद्धा दृढ करने तथा उन्हें यकीन दिलाने के लिये मैंने इस अनुभव का उल्लेख किया है ।

ऋषिकेश में हमारे दिन चैन से कट रहे थे । अब नवरात्री निकट थी । आप सोच रहे होंगे की नवरात्री है तो अनशन की बात होगी मगर एसा जरूरी नहीं है । मैंने हर साल नवरात्री में व्रत करने का प्रण नहीं लिया है । एसा करने में मुझे कोई दिलचस्पी नहीं है । मैं केवल करने के लिये कोई व्रत नहीं करता हूँ, ना ही एसा करने में विश्वास रखता हूँ । किसी अन्य व्यक्ति को एसा करना पसंद हो, तो मेरा विरोध नहीं है मगर मैं एसा नहीं करता । मेरे लिये व्रत-अनशन-उपवास एक साधन है जिसका उपयोग मैं आत्मिक उन्नति या परमात्मा की परमकृपा को प्राप्त करने के लिये करता हूँ ।

मेरी आत्मकथा के पाठकों को अब ये बताने की जरूरत नहीं है की माँ की प्रेरणा मिलने पर ही मैं व्रत या उपवास का आधार लेता हूँ । व्रत-उपवास करने के पीछे मेरा एक ही मकसद होता है - माँ की पूर्ण कृपा की प्राप्ति । यह ध्येय सिद्ध हो जाने के बाद, या फिर माँ की एसी प्रेरणा मिलने पर मुझे उसकी आवश्यकता नहीं रहेगी । मेरा मानना है की व्रत-उपवास एक साधन है, जिसकी जरुरत किसीको हो सकती है, किसीको नहीं । इसका निर्णय प्रत्येक साधक को खुद करना होगा । मैं सिर्फ ये बताना चाहता हूँ की मैंने अपने साधनात्मक जीवन में माँ की प्रेरणा से एसा किया है । इसका ये मतलब कतई नहीं है की ईश्वरकृपाभिलाषी प्रत्येक साधक को एसा करना चाहिये ।

इस वर्ष नवरात्री में मैंने माँ की प्रेरणा मिलने पर केवल पानी लेकर अनशन शुरु किये । एसा मैं पहले कई दफा कर चूका था । पीछले आठ साल से मेरी साधना मुख्यतः अनशन पर निर्भर रही है । पीछले साल मेरे अनशन तीन महिने से ज्यादा चले थे, फिर भी मेरा लक्ष्य सिद्ध नहीं हुआ था । मुझे निराश होकर, हाथ धरकर बैठना नहीं आता । जब तक मेरी इच्छानुसार सिद्धि न मिले, मुझे साधनापथ पर चलते रहेना था । इस प्रयास के भागरूप मैंने माँ की मरजी से अनशन का प्रारंभ किया ।

 

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