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Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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कार्तिक मास में ऋषिकेश से निकलते वक्त मन में तसल्ली थी क्योंकि दर्शन के लिये ज्येष्ठ सुद पांचम का दिन मिल चुका था । थोडा रंज भी था की जयेष्ठ महिने को अभी वक्त है और तब तक माँ के मुखारविंद का दर्शन नहीं होगा, माँ की वाणी सुनने का अवसर नहीं मिलेगा । मगर इन्तजार करने के अलावा मेरे पास और कोई चारा भी कहाँ था ?

गीता में कर्मसिद्धि के लिये जिन पाँच चिजो को जिम्मेवार ठहराया गया है, उनमें दैव यानि प्रारब्ध एक है । कोई उसे वक्त या काल का नाम देता है । प्रत्येक कर्म की सिद्धि का एक सुनिश्चित समय होता है । वक्त आने पर ही कर्म का फल मिलता है । बीज बोने के तुरन्त बाद अंकूर नहीं निकलते, उसके लिये धैर्य धारण करके प्रतीक्षा करनी पडती है । साधना का यही नियम है । साधना की सिद्धि के लिये किया गया पुरुषार्थ फल अवश्य देता है, मगर उसके लिये इन्तजार करना पडता है ।

वक्त का पहिया निरंतर चलता रहता है । आदमी चाहे या न चाहे, दिन, महिने और साल बीतते रहते है । आखिरकार वो दिन आ गया जिसका मुझे बेसब्री से इन्तजार था ।

सांईबाबा जैसे समर्थ पुरुष ने जाग्रत अवस्था में मुझे यह दिन बताया था, इसलिये मुझे भरोंसा था की इस बार मेरा काम हो जायेगा । फिर भी पाँचम की पूर्व रात्री को मन में चिंता बनी रही । रात को सांईबाबा ने आंतरजगत में अनुभूति देते हुए कहा : 'आज पाँचम थोडी है ? पाँचम तो कल है । कल माँ का साक्षात दर्शन हो जायेगा, तुम्हारा काम बन जायेगा ।'

मेरे साथ सांईबाबा भी बदरीनाथ आये है और मुझे ये बता रहे है की मेरा काम बन जायेगा, तो इस बार जरूर काम बन जायेगा । फिर भी मैंने सांईबाबा को प्रार्थना की, ‘आपने साधना-सिद्धि का जो दिन बताया है, वो मिथ्या नहीं होना चाहिये । वरना आपके वचनों पर कौन विश्वास करेगा ? कृपा करके मेरी मनोकामना पूर्ण करो ।’

बदरीनाथ भगवान को प्रार्थना करके कहा, ‘हे प्रभु, मैं आपके द्वार पर बडी उम्मीद लेकर आया हूँ । अगर आप में सच है, तो मेरी इच्छा पूर्ण करो । एसा करने से आपकी ही महिमा होगी । मैं आपका अतिथि हूँ, महेमान हूँ । अगर आप अपने अतिथि को संतुष्ट करना चाहते हो तो मेरी बात रख लो । माँ की पूर्ण कृपा के अलावा मुझे अन्य किसी चिज की कामना नहीं है ।’

ज्येष्ठ सुद पाँचम के दिन सुबह में बारिश हुई । सूर्यनारायण के दर्शन नहीं हुए । ठंड कुछ ज्यादा थी । गर्म पानी के कुण्ड पर नहाते हुए मन में विचार आया की अगर ये न होते तो क्या होता ?

मेरा मन माँ की कृपा के लिये तरस रहा था । कितने सालों से मैं माँ की पूर्ण कृपा के लिये प्रार्थना कर रहा था । आज शायद उसकी सुखद पूर्णाहूति होनेवाली थी । हे माँ, आज मेरी प्रार्थना सफल कर दो । आप मेरे सामने प्रगट हो जाओ । बदरीनाथ के पवित्र धाम में मुझे आपकी पूर्ण कृपा का दान दे दो । फिर मैं सारे संसार में आपकी महिमा का गान करूँगा, संसार को शांति और उजाले का मार्ग दिखाउँगा । बस, आज के दिन आपका मधुमंडित मुखकमल दिखा दो, आपके प्यार से मुझे परिप्लावित कर दो, मुझे धन्य और कृतार्थ कर दो । मैं आपका बालक हूँ और आप मेरी माँ है । आप मेरे स्नेही, स्वजन, सखा – सबकुछ है । आपका दर्शन किये बिना मुझे चैन और आराम नहीं मिलेगा । अब देर मत करो, जल्दी से आकर मेरा दर्द दूर करो ।

दिन मिथ्या हुआ
रात तक मैं आतुर हृदय से प्रार्थना करता रहा मगर माँ की मरजी कुछ और थी । दिन खत्म हो गया मगर माँ का दर्शन नहीं हुआ ! सांईबाबा जैसे सिद्ध पुरुष ने मुझे ये दिन सूचित किया था, मगर हाय, मेरा काम नहीं बना । मेरा हृदय आक्रंद करने लगा । पिछले छे सालों से मेरे साथ एसा होता आया था । आखिर कब तक एसा चलेगा ? हालात कुछ एसे थे की किसी साधारण साधक की श्रद्धा न रहें, धीरज तूट जाय । डूबते आदमी को तिनके का सहारा बहुत होता है । शायद मुझे श्रद्धावान बनाये रखने के लिये एसे दिन दिये जाते थे । मगर अब तो हद हो गयी । फिर भी साधना की यात्रा को जारी रखने के अलावा कोई विकल्प नहीं था । मुझे पूरी आशा, श्रद्धा और हिम्मत से आगे बढना था । तभी तो मैं अपने गंतव्य स्थान तक पहूँच पाउँगा ।

छठ का सूर्योदय हुआ । सूरज की गर्मी से लोग ठंड भगाने की कोशिश करने लगे । मगर मेरे नसीब में सिद्धि का सूर्योदय नहीं था । मेरा तन, मन, अंतर कृपा-कीरण की उष्मा से अब भी वंचित थे ।

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