ऋषिकेश से हम मसूरी गये । मसूरी के लिये दहेरादून से बस चलती है । मसूरी समुद्रसतह से करीब ६५०० फीट की उँचाई पर है । यहाँ गर्मी का नामोनिशान नहीं है । चौडे रास्ते, आकर्षक दुकानें, पानी तथा लाइट की सुविधा से सज्ज मसूरी पहली नजर में अत्यंत मनोहर लगता है । साधना के लिये भी यह स्थान अच्छा लगा मगर कोई यहाँ रहने दे तब न ?
मसूरी आकर हमारा सबसे पहेला काम था रहने का इन्तजाम करना । इसके लिये हमारे पास सिफारीश की तीन चिठ्ठीयाँ थी । पहली चिठ्ठी कुलडी बाजार स्थित इन्द्र रेस्टोरन्ट के मालिक के नाम थी । हमें 'प्रथम ग्रासे मक्षिका' जैसा हुआ । जब हम उन्हें मिलने गये तो वो कहीं बाहर गये थे । उनके छोटे भाई ने हमारी सहायता करने की यथायोग्य कोशिश की । उन्होंने तपास करके बताया की उनके मित्र का मकान उपलब्ध है । इसका किराया २४० रूपये प्रतिमाह होगा । हमारे पास जो दूसरी चिठ्ठी थी वो उन्ही के नाम थी मगर वो भाईसाहब बाहर गये थे । कुछ इन्तजार करने पर वो आये । उन्होंने किराये में १०-२० रूपया कटौती करने की बात की । फिर भी ये हमारी पहूँच के बाहर था । बात को वहाँ विराम देकर हमने स्वतंत्र रूप से तपास करना प्रारंभ किया ।
तीसरी चिठ्ठी बडौदा हाउस के चौकीदार के नाम थी । कुलडी बजार से बडौदा हाउस का रास्ता डाकघर तथा कपूरथला के राजा के घर होकर गुजरता है । वहाँ तक पहूँचने के लिये हमें काफि चलना पडा, थोडे थक गये । यहाँ आकर देखा तो ना कोई चौकीदार था, ना कोई और । मन में धारणा थी की मकान सुंदर होगा मगर एसा कुछ नहीं था । बाहर से मकान देखकर लगा की लंबे अरसे से इसमें कोई रहता नहीं होगा । एसा उज्जड मकान रहने के लिये ठीक नहीं होगा एसी धारणा से चौकीदार को ढूँढने की कोशिश नहीं की । स्थान का निरीक्षण करके लौट आये ।
रात होने पर वातावरण शांत हो गया । एसी शांति एकाग्रता के लिये उद्दीपक का काम करती है । शायद यही कारण है की पहाडों पर साधक तथा सिद्ध निवास करना पसंद करते है । लोग कहते हैं की मसूरी राजसी नगरी है । अगर रास्तें, मकान, दुकानों की सजावट, पानी की सुविधा तथा सडक पर लगी बत्तीओं से कोई उसे राजसी कहें तो भले कहें, मुझे एसा नहीं लगा । किसी भी स्थान को राजसी या सात्विक बनाना व्यक्ति पर निर्भर होता है । मुझे तो मसूरी का वातावरण अच्छा लगा ।
मसूरी में पैदल-रीक्षा चलती है । रीक्षा चलानेवाले ज्यादातर लोग गढवाली या नेपाली है । मसूरी के वैभवी वातावरण में ये लोग महेनत मजदूरी करके अपना पेट पाल रहे थे । भारत के किसी भी कोने में चले जाओ, आपको अच्छाई साथ बुराई दिख ही जायेगी । मसूरी इसमें अपवाद नहीं था ।
अगले दिन हम आसपास के स्थानों को देखने गये । रहने के लिये कुछ स्थानों की तलाश की । एक-दो पसंद आये मगर उसका किराया हमारी हेसियत के बाहर था । जिस वक्त हम मसूरी गये थे, वो पर्यटकों का मौसम था । अन्य मौसम में रहने का खर्च इतना ज्यादा नहीं होता ।
मसूरी हमे पसंद आया फिर भी हम यहाँ रह नहीं पाये । शायद इश्वर की यही इच्छा थी । हम वापिस ऋषिकेश लौट आये । ऋषिकेश में गर्मी काफि थी, मगर हमने खुशीखुशी इसका स्वीकार किया ।
ऋषिकेश आकर पुलिस इन्स्पेक्टर मुरालीलाल को चिठ्ठी लिखी और उनको परिस्थिति से वाकिफ किया । मसूरी में जो हुआ इससे उनके दिल को चोट पहूँची । उन्होंने खत में लिखा: 'आपको मसूरी में रहने की ठीक जगह न मिली ये जानकर मुझे बडा दुःख हुआ । लोग सिर्फ अपना स्वार्थ देखते है । बहुत कम लोग सेवाभावना से भरे होते है । तभी तो दुनिया में पाप और दुःख फैलता जा रहा है । मुझे उन लोगों पर तरस आता है जो आपकी इतनी सेवा भी ना कर सके । मैं यहाँ था, इसलिये आपके किसी काम में न आ सका, माफि चाहता हूँ ।'
मैंने लिखा: 'जैसी प्रभु की मरजी । आपको दुःखी होने की जरूरत नहीं है । आपका प्रेम हमेशा याद रहेगा ।'

