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Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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नर्मदा का महिमा शास्त्रों में बताया गया है । नर्मदातट पर जाने की मेरी लंबे अरसे से इच्छा थी । सरोडा में साडे तीन मास रहने के बाद इश्वरकृपा से नर्मदायात्रा का संयोग उपस्थित हुआ ।

सबसे पहले हम करनाली गये । वहाँ दामोदर मठ में रुके । नर्मदा का दर्शन करने से गंगाजी की स्वाभाविक स्मृति होती है । करनाली के पास नर्मदा का तट गंगाजी की तरह स्वच्छ और सुविशाल है । तट पर कई मंदिर तथा धर्मशालाएँ है । हमें स्वामी विद्यानंदजी महाराज की गीताज्ञान गुफा, कुबेर भंडारी तथा हंसारुढ स्वामी का आश्रम विशेष पसंद आया । करनाली का प्रदेश थोडा सूखा है । यहाँ मच्छरों का भारी उपद्रव है, इसकी खबर हमें रात होने पर हुई । जब गर्मी की मौसम में इतने मच्छर थे तो बारिश के वक्त कैसा हाल होगा इसका अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं था । जीवन में सुख के साथ दुःख, हर्ष के साथ शोक तथा धूप के साथ छाया चलती है । यहाँ सबकुछ ठीक था, लेकिन मच्छरों ने हमें रातभर सोने नहीं दिया । किसी योगी की तरह ये अपनी साधना में लगे रहे । शायद वे चाहते थे की एसे उत्तम तीर्थस्थान में आकर कोई व्यक्ति सोने के बजाय सुमिरन या आत्मचिंतन करे । मगर एसा करना भी आसान नहीं था । थोडी देर बैठने में दिक्कत हो रही थी तो इश्वरस्मरण में मग्न होना बहुत दूर की बात थी । हाँ, जिसका मनोबल दृढ हो या जो किसी भी परिस्थिति में चैन से सो सकें उसकी बात और है । साधारण आदमी का यहाँ काम नहीं था ।

नर्मदातट सिद्धि प्राप्त करने की ईच्छावाले साधकों के लिये उत्तम माना गया है । इसी कारण से यहाँ कई साधक, संत तथा ज्ञानीपुरुष आते है, अपनी पसंदीदा जगह पर निवास करते है, तथा सिद्धि प्राप्त करने का प्रयास करते है । नैसर्गिक सौन्दर्य, एकांत तथा स्थान की पवित्रता के कारण भारत के ज्यादातर संतपुरुषों ने सरिता या पहाडों की पसंदगी की है । आर किसी भी सरितातट या पर्वत पर चले जाओ, आपको किसी-न-किसी साधुसंत या सिद्ध महापुरुष के बारे में अवश्य सुनने मिलेगा ।

करनाली और चांदोद की बीच, तट के उस पार एक महात्मा तपश्चर्या कर रहे थे । उनका नाम बुद्धदेव था । स्थानिक लोगों से हमें उनके बारे में जानकारी मिली । उनका स्थान मार्ग में पडता था, इसलिये हम उनको मिलने गये ।

बुद्धदेव सरितातट पर रहते थे । उन्होंने लकडी के चार खंभे लगाकर, उपर बोरीयाँ बिछायी थी, जिससे बारिश और ताप से रक्षण हो सके । उनकी उम्र करीब चालीस साल होगी । उन्होंने व्याघ्रचर्म पहना था । जब हम उनको मिलने गये तो वो भगवान श्रीकृष्ण की तसवीर के आगे माला लेकर जाप कर रहे थे । पीछले बारह सालों से वो नर्मदातट के विविध स्थानों में निवास कर रहे थे । वैसे तो महापुरुषों के दिल की गहराई का अंदाजा लगाना मुश्किल होता है, फिर भी बुद्धदेव की मुखाकृति देखकर लगा की वो साधना की प्रारंभिक अवस्था में है । उन्होंने मौन धारण किया था । वो किसीसे कुछ लेते नहीं थे । किसी दर्शनार्थी को अपने पास ज्यादा देर तक बैठने नहीं देते थे । उनकी दृढता और लगन देखकर लगा की वो अपने प्रयास जारी रखते है तो निश्चित उच्च अवस्था पर पहूँच पायेंगे ।

आत्मिक पथ के सभी प्रवासीओं को यह बात लागु होती है । अपने ध्येय और आदर्श के लिये उन्हें सच्ची लगन और निष्ठा से पुरुषार्थ करते रहेना है, तभी भगवान की कृपा होगी । आज तक एसा नहीं हुआ है की किसी साधक ने प्रामाणिक रूप से साधना की हो, अपनी सारी चिंता इश्वर के चरणों में रख दी हो और उसे शांति, सिद्धि या पूर्णता न मिली हो । न जाने कितने साधकों ने नर्मदातट पर तपश्चर्या करके अपनी मंझिल पायी होगी । लोग भले एकाद नारायण स्वामी या ब्रह्मानंदजी को जानते है, मगर एसे कई महापुरुष यहाँ से लाभान्वित होकर गये होंगे । या फिर ‘गोपनीयं गोपनीयं गोपनीयं प्रयत्नतः’ का अनुसरण करके काल के महोदधि में विलुप्त हो गये होंगे । इनकी कहानी या तो धीरगंभीर रूप से बहनेवाली नर्मदा बता सकती है, किनारे पर चूपचाप खडी भेखडें बता सकती है, आकाश, सूर्य, चंद्र, तारकगण बता सकता है, या फिर धूप-छाँव और फरफराती हवा बता सकती है । इनके अलावा भारत के इन जवाँमर्दों की कहानी हमें कौन बतायेगा ? जिनका नाम इतिहास में दर्ज हुआ है, जिन्हें हम जानते है वे बेशक महान है, मगर जिसके बारे में कुछ लिखा नहीं गया, जिससे दुनिया आजतक बेखबर रही है, एसे कितने महापुरुष होंगे ? जब हम उनके बारे में सोचते है तो हमें अपनी अल्पता का अहेसास होता है । जैसे विख्यात वैज्ञानिक न्यूटन ने बताया था, हम अपने आपको समंदर के तट पर छीप इकट्ठे करते हुए बच्चे-से लगते है ।

बुद्धदेव की भेंट स्मृतिपट हमेशा के लिये बनी रहेगी । साधना में मग्न एसे साधु आजकल कहाँ देखने को मिलते है ? अब तो ये हाल हो गया है की विद्वान कहे जानेवाले साधु भी धन, प्रतिष्ठा तथा लोकरंजन के कार्य में लगे हुए है । साधुजीवन का मतलब साधना करके शांति तथा मुक्ति पाना है, लोगों की निष्काम सेवा करना है । हमारे शाश्त्र तथा संतपुरुष एसा सिखाते है । मगर आजकल यही बात साधुसमाज से गायब हो रही है । वे शास्त्रों का प्रमाण देकर अच्छी-अच्छी बातें तो कर लेते है मगर खुद इसका अनुसरण नहीं करते । और यही कारण है की आज तपश्चर्या या साधना का उद्देश नजरअंदाज हो गया है । एसे समय में, इश्वर के लिये दिनरात कोशिश करनेवाले साधक को देखकर किसका मन प्रसन्न नहीं होगा ? भले ही बुद्धदेव सिद्ध नहीं थे, साधक थे, शायद अध्यात्म पथ के प्रारंभिक पथिक, फिर भी उनका जीवन प्रशस्य और प्रेरणादायी था, इसमें कोई संदेह नहीं है ।

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