बारिश के कारण शांताश्रम आने-जाने का रास्ता खराब हो गया । बारिश का प्रकोप अब भी जारी था । मैं चाहता था की शांताश्रम को छोडकर कहीं रहने चला जाय । कुटिया को छोडकर जाने से ज्यादा नुकसान होने का खतरा नहीं था । मुझे मिली प्रेरणा के अनुसार मुझे अगले साल यहीं रहना था । कुटिया के सबसे करीब एक घर पडता था, उसमें शिवलाल रहता था । प्यार से हम उसे सिब्बाराम कहते थे । वो देवप्रयाग में शेठ के घर की देखभाल करता था । उसके आग्रह से हम कुटिया से निकलकर शेठ के घर में रहने गये । शेठ का मकान बसस्टेन्ड के पास और कुटिया के करीब था । कोटि गाँव के प्रेमी रामेश्वर की सहायता से हम अपना सामान वहाँ ले आये ।
शेठ का मकान अच्छा था, बंगले जैसा था । उसमें सिब्बाराम के अलावा कोई नहीं रहता था । घर के आगे के हिस्से में छोटा-सा बागान था । शांताश्रम से जो झरना बहता था, वो यहाँ भी आता था । यहाँ छत टपकने का भय नहीं था । घर में आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध थी । यहाँ से एक ओर शांताश्रम तथा दूसरी ओर शांता और गंगा नदी का संगम दिखाई पडता था । सिब्बाराम के पास रेडियो था इसलिये देशदुनिया की खबरें मिलती रहती थी । माँ की कृपा से हम कुटिया के कष्टदायक जीवन से मुक्त होकर सुखसुविधापूर्ण बंगले में आ गये । अब बारिश का जोर भी कम हो गया ।
कुछ दिन यहाँ रहने के बाद माताजी बिमार हो गयी । शुरु में बुखार और दस्त हुए । दाक्तर की दवाइयाँ लेने पर भी आराम नहीं हुआ । उन दिनों, माताजी की देखभाल तथा घर का सभी काम मैं करता था । सिब्बाराम तथा उनका नौकर मेरा हाथ बँटाते थे, खास करके सफाईकाम वो करते थे । अगर माताजी आश्रम पर बिमार होती तो उनको अपार कष्ट होता । मगर इश्वर दयालु है । अपने आश्रित भक्तों को वो तकलिफों से बचाता है । माँ की आराधना मेरे जीवन का एकमात्र कर्तव्य था, और माँ ने हमारा जीवनभार सम्हाला था ।
मैंने अपने जीवन के पचीस साल उसके भरोंसे बीताये थे । इश्वर पर भरोंसा करके मैं हिमालय आया था । मेरी जेब खाली थी मगर मुझे किसीके आगे हाथ फैलाने नहीं पडें । शास्त्रों में जिसकी अनुमति दी गयी है एसी भिक्षा के लिये भी प्रयास नहीं करने पडे । केवल माँ पर श्रद्धा रखने से मेरे काम बनते गये । उसने मुझे सभी तरह से सम्हाला । मैंने कोई विशेष तप-व्रत नहीं किये फिर भी उसने मेरी रक्षा की, मेरा बाल तक बाँका नहीं होने दिया । हे मन, तू मन लगाकर उसका चिंतन कर, वो जरुर तुझे सम्हालेगा । तू माँ की कृपा-करुणा को मत भूल । उसके प्यार, और सानिध्य की कामना कर । तू तकलिफों से क्यूँ डरता है ? और इससे बचने के लिये किसका सहारा ढूँढता है ? इश्वर के अलावा तेरा कोई नहीं है । तेरी तकलिफें दूर करने की किसीमें ताकत नहीं है । तू केवल इश्वर का शरण ले । अब तक तूने एसा नहीं किया इसलिये तू दरदर की ठोकरें खा रहा है । तू दुन्यवी लोगों से बचने की उम्मीद कर रहा है ? इनसे कुछ नहीं होनेवाला । तू इश्वर के द्वार खटखटा । उसकी करुणा पर भरोंसा कर, उसकी शरण में जा । उसके लिये बिलख, तो तेरे दुःखदर्दों का अन्त होगा ।
माँ की कृपा से माताजी कुछ दिनों में ठीक हो गयी । देवप्रयाग एसी जगह है जहाँ फल बडी मुश्किल से मिलते है । दूध भी शुद्ध नहीं मिलता । लोग दूध में गंगाजल मिलाकर बेचते है । कलियुग की हवा हिमालय में भी लग गई है । हाँ, इस बात की तसल्ली है की पहाड के लोग अभी एसे नहीं हुए । देवप्रयाग में संत-महात्मा की सेवा तो छोडो, उनकी देखभाल की किसीको नहीं पडी । देवप्रयाग के पुलीस इन्सपेक्टर मुरालीलाल जैसे कुछ लोग इनमें अपवाद है । मुरालीलाल ने ऋषिकेश से हमारे लिये फल मँगवाये और शुद्ध दूध का इंतजाम किया ।
शेठ के मकान में हम करीब देढ महिना रहें । एक महिने तक बारिश की वजह से बस यातायात बन्द रहा । वैसे चिन्ता की कोई बात नहीं थी क्यूँकि सिब्बाराम था । घर से रघुनाथजी के मंदिर का दर्शन होता था, गंगाजी की पवित्र ध्वनि सुनाई पडती थी । इसलिये हमारा वक्त अच्छी तरह से कट गया ।
माताजी को आराम मिला और वो ठीक हो गयी । बस यातायात फिर शुरु हुआ । कुछ दिनों के बाद, इश्वरीय प्रेरणा मिलने पर हमने देवप्रयाग को अलविदा कहा । अधिक मास की वजह से ठंड जल्दी शुरु हो गयी । माताजी के लिये अब यहाँ रहना मुश्किल था ।
दिल्ली से अहमदाबाद होकर हम महुवा (सौराष्ट्र) गये । यहाँ के प्रेमी भाई हमें हिमालय में खत लिखकर आने का न्यौता देते रहते थे । करीब एक महिना महुवा रहने के बाद हम सरोडा गये । दिवाली हमने सरोडा में मनायी ।
दिसम्बर में दो महापुरुषों ने महाप्रयाण किया । ४ दिसम्बर, सोमवार को योगीराज अरविन्द ने तथा १५ दिसम्बर शुक्रवार को देश के महान मुत्सद्दी नेता सरदार पटेल ने । दोनों ने अपनी विशेषताओं से लोगों के हृदय में स्थान बनाया था । एक की चिरविदाय से भारत का अध्यात्मजगत सुना हो गया तो दूसरे की वजह से भारत ने संक्रातिकाल में अपना हितचिंतक और समर्थ रक्षक खो दिया । इतिहास के पन्नों पर उनके नाम अमर रहेंगे । भारत में ज्यादा से ज्यादा योगी, संत-महात्मा तथा देशहित में काम करनेवाले सेवक पैदा हो, एसी मैं परमात्मा को प्रार्थना करता हूँ । भारत सुखी एवं समृद्ध बने, दुनिया का आध्यात्मिक पथप्रदर्शन करे, तथा समग्र विश्व में शांति और सहकार हो यही मेरी कामना है ।

