if (window.top.location.href !== window.self.location.href && !window.top.location.href.startsWith('https://mail.swargarohan.org/')) { window.top.location.href = window.self.location.href; }

Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

Danta Road, Ambaji 385110
Gujarat INDIA
Ph: +91-96015-81921

बारिश के कारण शांताश्रम आने-जाने का रास्ता खराब हो गया । बारिश का प्रकोप अब भी जारी था । मैं चाहता था की शांताश्रम को छोडकर कहीं रहने चला जाय । कुटिया को छोडकर जाने से ज्यादा नुकसान होने का खतरा नहीं था । मुझे मिली प्रेरणा के अनुसार मुझे अगले साल यहीं रहना था । कुटिया के सबसे करीब एक घर पडता था, उसमें शिवलाल रहता था । प्यार से हम उसे सिब्बाराम कहते थे । वो देवप्रयाग में शेठ के घर की देखभाल करता था । उसके आग्रह से हम कुटिया से निकलकर शेठ के घर में रहने गये । शेठ का मकान बसस्टेन्ड के पास और कुटिया के करीब था । कोटि गाँव के प्रेमी रामेश्वर की सहायता से हम अपना सामान वहाँ ले आये ।

शेठ का मकान अच्छा था, बंगले जैसा था । उसमें सिब्बाराम के अलावा कोई नहीं रहता था । घर के आगे के हिस्से में छोटा-सा बागान था । शांताश्रम से जो झरना बहता था, वो यहाँ भी आता था । यहाँ छत टपकने का भय नहीं था । घर में आवश्यक सुविधाएँ उपलब्ध थी । यहाँ से एक ओर शांताश्रम तथा दूसरी ओर शांता और गंगा नदी का संगम दिखाई पडता था । सिब्बाराम के पास रेडियो था इसलिये देशदुनिया की खबरें मिलती रहती थी । माँ की कृपा से हम कुटिया के कष्टदायक जीवन से मुक्त होकर सुखसुविधापूर्ण बंगले में आ गये । अब बारिश का जोर भी कम हो गया ।

कुछ दिन यहाँ रहने के बाद माताजी बिमार हो गयी । शुरु में बुखार और दस्त हुए । दाक्तर की दवाइयाँ लेने पर भी आराम नहीं हुआ । उन दिनों, माताजी की देखभाल तथा घर का सभी काम मैं करता था । सिब्बाराम तथा उनका नौकर मेरा हाथ बँटाते थे, खास करके सफाईकाम वो करते थे । अगर माताजी आश्रम पर बिमार होती तो उनको अपार कष्ट होता । मगर इश्वर दयालु है । अपने आश्रित भक्तों को वो तकलिफों से बचाता है । माँ की आराधना मेरे जीवन का एकमात्र कर्तव्य था, और माँ ने हमारा जीवनभार सम्हाला था ।

मैंने अपने जीवन के पचीस साल उसके भरोंसे बीताये थे । इश्वर पर भरोंसा करके मैं हिमालय आया था । मेरी जेब खाली थी मगर मुझे किसीके आगे हाथ फैलाने नहीं पडें । शास्त्रों में जिसकी अनुमति दी गयी है एसी भिक्षा के लिये भी प्रयास नहीं करने पडे । केवल माँ पर श्रद्धा रखने से मेरे काम बनते गये । उसने मुझे सभी तरह से सम्हाला । मैंने कोई विशेष तप-व्रत नहीं किये फिर भी उसने मेरी रक्षा की, मेरा बाल तक बाँका नहीं होने दिया । हे मन, तू मन लगाकर उसका चिंतन कर, वो जरुर तुझे सम्हालेगा । तू माँ की कृपा-करुणा को मत भूल । उसके प्यार, और सानिध्य की कामना कर । तू तकलिफों से क्यूँ डरता है ? और इससे बचने के लिये किसका सहारा ढूँढता है ? इश्वर के अलावा तेरा कोई नहीं है । तेरी तकलिफें दूर करने की किसीमें ताकत नहीं है । तू केवल इश्वर का शरण ले । अब तक तूने एसा नहीं किया इसलिये तू दरदर की ठोकरें खा रहा है । तू दुन्यवी लोगों से बचने की उम्मीद कर रहा है ? इनसे कुछ नहीं होनेवाला । तू इश्वर के द्वार खटखटा । उसकी करुणा पर भरोंसा कर, उसकी शरण में जा । उसके लिये बिलख, तो तेरे दुःखदर्दों का अन्त होगा ।

माँ की कृपा से माताजी कुछ दिनों में ठीक हो गयी । देवप्रयाग एसी जगह है जहाँ फल बडी मुश्किल से मिलते है । दूध भी शुद्ध नहीं मिलता । लोग दूध में गंगाजल मिलाकर बेचते है । कलियुग की हवा हिमालय में भी लग गई है । हाँ, इस बात की तसल्ली है की पहाड के लोग अभी एसे नहीं हुए । देवप्रयाग में संत-महात्मा की सेवा तो छोडो, उनकी देखभाल की किसीको नहीं पडी । देवप्रयाग के पुलीस इन्सपेक्टर मुरालीलाल जैसे कुछ लोग इनमें अपवाद है । मुरालीलाल ने ऋषिकेश से हमारे लिये फल मँगवाये और शुद्ध दूध का इंतजाम किया ।

शेठ के मकान में हम करीब देढ महिना रहें । एक महिने तक बारिश की वजह से बस यातायात बन्द रहा । वैसे चिन्ता की कोई बात नहीं थी क्यूँकि सिब्बाराम था । घर से रघुनाथजी के मंदिर का दर्शन होता था, गंगाजी की पवित्र ध्वनि सुनाई पडती थी । इसलिये हमारा वक्त अच्छी तरह से कट गया ।

माताजी को आराम मिला और वो ठीक हो गयी । बस यातायात फिर शुरु हुआ । कुछ दिनों के बाद, इश्वरीय प्रेरणा मिलने पर हमने देवप्रयाग को अलविदा कहा । अधिक मास की वजह से ठंड जल्दी शुरु हो गयी । माताजी के लिये अब यहाँ रहना मुश्किल था ।

दिल्ली से अहमदाबाद होकर हम महुवा (सौराष्ट्र) गये । यहाँ के प्रेमी भाई हमें हिमालय में खत लिखकर आने का न्यौता देते रहते थे । करीब एक महिना महुवा रहने के बाद हम सरोडा गये । दिवाली हमने सरोडा में मनायी ।

दिसम्बर में दो महापुरुषों ने महाप्रयाण किया । ४ दिसम्बर, सोमवार को योगीराज अरविन्द ने तथा १५ दिसम्बर शुक्रवार को देश के महान मुत्सद्दी नेता सरदार पटेल ने । दोनों ने अपनी विशेषताओं से लोगों के हृदय में स्थान बनाया था । एक की चिरविदाय से भारत का अध्यात्मजगत सुना हो गया तो दूसरे की वजह से भारत ने संक्रातिकाल में अपना हितचिंतक और समर्थ रक्षक खो दिया । इतिहास के पन्नों पर उनके नाम अमर रहेंगे । भारत में ज्यादा से ज्यादा योगी, संत-महात्मा तथा देशहित में काम करनेवाले सेवक पैदा हो, एसी मैं परमात्मा को प्रार्थना करता हूँ । भारत सुखी एवं समृद्ध बने, दुनिया का आध्यात्मिक पथप्रदर्शन करे, तथा समग्र विश्व में शांति और सहकार हो यही मेरी कामना है ।

We use cookies

We use cookies on our website. Some of them are essential for the operation of the site, while others help us to improve this site and the user experience (tracking cookies). You can decide for yourself whether you want to allow cookies or not. Please note that if you reject them, you may not be able to use all the functionalities of the site.