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Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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मैं बिमार हुआ उसके ठीक एक साल पहले पंजाबी दाक्तर बिमार हुए थे । उनके सगेसंबंधीओं ने उनके बचने की उम्मीद छोड दी थी । न जाने क्यूँ, उनके मन में खयाल आया के उन्होंने मेरे दर्शन नहीं किये इसलिये वो बिमार हुए है । मेरे पास न आने से कोई व्यक्ति बिमार कैसे होगा ? मगर दाक्तर के मन में एसा खयाल आया और जोर पकडता गया । आखिरकार उन्होंने अपनी लडकी को मुझे बुलवाने भेजा । मैं उनको देखने देवप्रयाग उनके घर गया ।

जब मैं गया तो वो बिस्तर में लेटे थे । मुझे देखकर वो रो पडे । उनकी धर्मपत्नी को इश्वर में आस्था थी । वो गुरु ग्रंथ साहिब का पाठ करके उन्हें हिंमत देने की कोशिश करती थी । बच्चे रो रहे थे । दाक्तर ने मुझे कहा, 'मेरे बचने की उम्मीद कम है । मुझे बच्चों की फीक्र होती है, मेरे बाद उनका क्या होगा । अन्य दाक्तरों ने मुझे दहेरादून जाकर ओपरेशन कराने की सलाह दी है । आप मुझे आशीर्वाद दो तो आपकी बडी कृपा होगी ।'

मैं उनको पहली दफा मिल रहा था, मगर उनकी श्रद्धा देखकर मुझे ताज्जुब हुआ । वो गिडगिडाते मेरे पैरों में गिर गये । घर के अन्य लोग रोने लगें । बिमारी, दुःख और मौत से आदमी हिम्मत हार जाता है । बिमारी और मौत जीवन का अविभाज्य अंग है, इसलिये समजदार आदमी को ममता नहीं करनी चाहिये । हाँ, जीवन से लगाव का एक कारण ये हो सकता है की इससे हम पूर्णता पा सकते है । दुःख, दर्द और मृत्यु की निश्चितता के बावजूद हम शरीर के माध्यम से ईश्वर के दर्शन कर सकते है, मुक्ति पा सकते हैं, दुसरों की सेवा कर सकते हैं । महापुरुषों ने शरीर को मोक्ष का द्वार कहा है वो बिना वजह नहीं है । शरीर को बंधन या मोक्ष का द्वार करना यह व्यक्ति पर निर्भर है ।

मेरे मन में एसे खयाल उमड पडे मगर इस वक्त दाक्तर को फिलसूफी की नहीं मगर आशीर्वाद की जरूरत थी । मैंने उन्हें शांति और धीरज से कहा :

'मुझमें कोई चमत्कारिक शक्ति नहीं है जिससे मैं आपको ठीक कर सकूँ । हाँ, आपको धीरज के दो शब्द कह सकता हूँ । मुझे लगता है की ईश्वर की कृपा से आपको आराम हो जायेगा । आप दहेरादून जाकर अपना उपचार करवाओ । मुझे विश्वास है की अगले साल जब मैं देवप्रयाग आउँगा तब आप पूरी तरह से ठीक हो जायेंगे । अब चिंता छोडो और प्रभु का स्मरण करो ।'

बस, उसके बाद जब अगले साल मैं हिमालय गया तो दाक्तर ठीक हो गये थे । वो सहकुटुंब मुझे कुटिया पर मिलने आये । और उसके करीब तीन महिने बाद मुझे टाइफोईड हुआ । अब मेरी सेवा करने की बारी दाक्तर की थी । उन्होंने बडी प्रसन्नता से मेरी सेवा की । उनका नम्र और मायालु स्वभाव मुझे हमेशा याद रहेगा ।

दाक्तर ने एम.बी.बी.एस. किया था । वो अपने विषय में निष्णात थे । भारत-पाकिस्तान के विभाजन के बाद जो असंख्य लोग बेघर हुए थे, उनका परिवार उनमें एक था । ईश्वर उनका भला करे !

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