मद्रास, कन्याकुमारी तथा मदुराई की यात्रा समाप्त करके हम देवप्रयाग लौट आये । देवभूमि हिमालय में विभिन्न प्रकार के साधक, सिद्ध तथा महात्मा निवास करते हैं । इस भूमि की महिमा से आकर्षित होकर देशविदेश के लोग यहाँ खींचे चले आते है । इन कुछ चित्रविचित्र लोग भी आते है । देवप्रयाग में हमारी भेंट एक एसे-ही विचित्र पुरुष से हुई ।
इस्वी सन १९४९ के जून महिने की बात है । मैं और माताजी शाम को कुटिया में बैठे थे । वहाँ एक भगवा वस्त्रधारी साधुपुरुष आये । उनकी दाढी लंबी और हाथ में दंड था । लालघूम आँखोवाले उस साधुपुरुष को देखकर मुझे आश्चर्य हुआ । मैंने उनको बैठने के लिये कहा ।
उन्होंने अपनी गौशाला के लिये चंदा माँगा । मेरे साथ बातचीत करके उन्हें लगा की मुझसे पैसा उगलना आसान नहीं होगा, इसलिये उन्होंने एक तरकीब सोची । मेरे हाथ में एक धागा देकर उसके नौ टुकडे करने को कहा । मुझे यकीन हो गया की साधु अपनी जादुगरी विद्या से मुझे प्रभावित करना चाहता है । मैं चुपचाप तमाशा देखता रहा ।
नौ टुकडा करने के बाद उसने कहा सभी टुकडे हाथ में बन्द कर लो ।
मैंने वैसा किया, जैसा उसने कहा ।
फिर उसने कहा, 'अगर धागा पहले की माफिक हो जाता है तो मेरा प्रयोग सफल ।'
उसके कहने पर जब मैंने मुठ्ठी खोली तो नौ के बजाय केवल एक टुकडा था । बाकी के सभी टुकडे अपने आप जुड गये थे ।
यह देखकर साधु के मुख पर प्रसन्नता की लहर दौड गयी ।
उसने कहा : 'बाकी बचा एक टुकडा किसी आपत्ति का संकेत कर रहा है । अगर आपको इससे मुक्ति पानी है तो एक मार्ग है ।' यह कहकर उसने अपनी झोली-से एक रुपये का सिक्का निकाला और कहा 'इसे पास रखने से आपके सभी विघ्न दूर हो जायेंगे । ये आपके पास रक्खो और मुझे एक रूपया दे दो ।'
साधु का मन पैसे में था, ये मैं जानता था । मैंने एक रुपया देने से मना किया ।
उसने कहा, 'कुछ और तरकीब देखना चाहोगे ? आपको कौन-सा मंत्र अधिक प्यारा है ?'
मैंने उत्तर दिया, 'मुझे तो सभी मंत्र अच्छे लगते है ।'
'ॐ कार प्यारा लगता है ?'
'हाँ ।'
'तो अपने बाँयें हाथ के पीछे देखो, वहाँ ये मंत्र लिखा होगा ।'
मैंने देखा मगर कुछ नहीं था ।
'नहीं है ?' उसने कहा, 'ठीक है, दाहिने हाथ पर देखो ।'
वहाँ सचमुच काले रंग का ॐ कार था । हथेली और उसके पीछे – दोनों जगह पर था ।
फिर उसने कहा, 'अब एक रुपया दे दो ।'
मुझे उसके खेल में मजा आने लगा ।
मैंने कहा, 'दूँगा, मगर कोई और तरकीब दिखाओ ।'
उसने प्रसन्न होकर मेरी ओर देखा और कहने लगा 'आपने अब तक बहुत कष्ट सहें है मगर श्रावण मास से आपके जीवन में सुख-ही-सुख है । आपकी सभी ईच्छाएँ पूर्ण हो जायेगी । आपको यश मिलेगा । भाद्रपद में आप यहाँ से बंबई जायेंगे ।'
मैंने उसको दो आने दिये, वो भी उसकी जादुगरी के लिये नहीं मगर वो साधु था और माँग रहा था इसलिये । उसे एक रुपये की अपेक्षा थी मगर सिर्फ दो आने मिले, इसलिये तंग आकर चलता बना । जाते-जाते कहने लगा : 'मैंने आपसे दो आने तो उगलवाये ना !'
अब मैं उसको क्या कहूँ ?
मैंने कहा, 'आपने तो सिर्फ दो आने उगलवाये मगर मैंने आपकी याचकवृत्ति, लोभ और क्रोध खुला कर दिया, ये क्या कम है ? मेरे तो सिर्फ दो आने गये, और वो भी मैंने अपनी मरजी से दिये, मगर आपकी साधुवृत्ति गयी, इसका आपको पता है ?'
वो क्या कहता ? वो आगबबूला होकर चलता बना ।
साधु में एक-दो करामत करने की कुशलता थी मगर इससे क्या होता है ? उसमें साधुता नहीं थी । काश, पैसे के लिये लोगों को ठगने के बजाय उसने इश्वर को प्रसन्न करने का प्रयास किया होता । तो शायद उसका दुःख दूर हो जाता, वो सच्चा साधु बन पाता । मगर एसा करना हरकिसी के लिये संभव नहीं होता । गीता में कहा गया है की हजारों में से कोई एक इसके लिये प्रयास करता है और सच्चा साधक बन पाता है ।

