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Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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भगवान श्री कृष्ण के समय में मथुरा कैसा होगा इसकी हम केवल कल्पना कर सकते हैं, मगर आज का मथुरा इतना आकर्षक नहीं है । प्राचीन और एतिहासिक तीर्थ होने के कारण तथा विशेषतः भगवान श्री कृष्ण की लीलाभूमि होने के कारण देशविदेश से यात्री यहाँ आते है ।

मथुरा हम पंद्रह दिन रहें मगर यहाँ भी पेट की बिमारी ने हमें नहीं बक्षा । फिर भी हमने जो कुछ देखने लायक था, देखा । यहाँ का विश्रामघाट अत्यंत मनोहर है । शाम की आरती के वक्त उसकी शोभा देखते ही बनती है । हरिद्वार में हरिकी पौडी पर गंगाजी की आरती के दर्शन से हमें अलौकिक आनंद मिलता है । वैसे ही यहाँ जमुनाजी के विश्रामघाट पर होनेवाली आरती आँख और अंतर दोनों को पावन करती है । उसे एक बार देखने से मन नहीं भरता, और बार-बार देखने को मन करता है ।

विश्रामघाट सचमुच विश्रांति का घाट है । संसार के तापों से तप्त और शांति की कामना से आये हुए भाविकों को यहाँ परम शांति का अनुभव होता है । आदमी यहाँ आकर अपनी सारी मुसीबतों को भूल जाता है । प्रबल आध्यात्मिक संस्कारवाले मनुष्य यहाँ उन्नति की प्रेरणा पाते हैं ।

विश्रामघाट से नाव में बैठकर जमुना के दुसरे छोर पर जाने से दुर्वासा ऋषि का स्थान आता है । यह स्थान एकांतिक तथा दर्शनीय है । इस स्थान का दर्शन करते वक्त हमारे मन में महात्मा दुर्वासा की मूरत सामने आयी । हमारे विभिन्न सरितातट पुरातन काल से लेकर अद्यतन काल पर्यंत संत-महात्माओं के निवास से गौरवान्वित होते आयें हैं । तीर्थों का आकर्षण महापुरुषों से बना रहेता है । आजकल तीर्थस्थलों में तपस्वी संतपुरुष भले कम रहते हैं मगर उनका पूर्णतया लोप नहीं हुआ है । आज भी जो श्रध्धा से जाता है उसे उनके दर्शन हो जाते हैं ।

मथुरा से हम गोकुल गयें । जमनातट पर एक गुजराती संन्यासी महात्मा रहते थे, हम उनके साथ रहें । गोकुल श्री कृष्ण की लीलाभूमि है । नंद और यशोदा के घर रहकर उन्होंने गोकुल को पूरे संसार में अमर कर दिया । वैसे तो गोकुल छोटा-सा गाँव है मगर हमें अत्यंत मनभावन लगा । भगवान कृष्ण की लीलाभूमि के दर्शन करके हम मथुरा वापस लौटे ।

मथुरा की यात्रा वृंदावन के दर्शन बगैर अधुरी मानी जाती है । कुछ दिनों के बाद हम वृंदावन गये । वृंदावन को लोग वैकुंठ-तुल्य मानते हैं । चैतन्य महाप्रभु, वल्लभाचार्य, तुलसीदास, सुरदास, मीरां ने रामकृष्णदेव जैसे कई संतपुरुष यहाँ आये थे । वृंदावन के दर्शन करके हमें बडी प्रसन्नता हुई ।

वृंदावन के मंदिरो की शोभा देखते ही बनती है । भगवान कृष्णने जहाँ रासलीला की थी वो जगह देखने लायक है । राधा तथा अन्य गोपीओं की प्रेमगाथा यहाँ की मिट्टी से जुडी हुई है । प्रेमी भक्तों के हृदय यहाँ प्रसन्नता का अनुभव करते हैं ।

ज्यादातर लोग केवल यात्रा के लिये तीर्थधामों में जाते है, कुछ लोग पुण्य की प्राप्ति हेतु जाते हैं, तो कुछ केवल कूतुहल से जाते है । यात्रा सही मायने में तभी सार्थक मानी जायेगी जब लोग यात्रा करके अपने जीवन को सुधारने का, उसे ओर बहेतर बनाने का प्रयास करें । यात्रा केवल शौक से नहीं मगर भावना से होनी चाहिए । वृंदावन आदि यात्राधामों में जानेवाले सभी यात्री अगर अपने दुर्गुणों से मुक्त होने का संकल्प करें, अपने व्यसनों को त्यागने का निश्चय करें तो उनका जीवन अवश्य उज्जवल होगा । यात्रीओं को चाहिए की कम-से-कम यात्रा के दौरान संसार की आसक्ति छोडकर, भगवान की कृपा के लिये विशेष प्रयास करें, तथा यात्रा खत्म होने पर भी साधना के नियम बनायें रखें । यात्रा-प्रवास तभी उनके लिये लाभदायी सिद्ध होंगे ।

ज्ञानदृष्टि से देखा जाय तो समस्त संसार वृंदावन है । एसी एक भी जगह नहीं जहाँ ईश्वर का निवास न हो । जड और चेतन – सभी जगह वह रहेता है मगर अहंकार, ममता और अज्ञान की वजह से हम उन्हें देख नहीं पाते । अज्ञान का पर्दा हटने से हमें उनके दर्शन होंगे । फिर हमारे लिये सभी जगह वृंदावन, काशी और अयोध्या होगी । किसी कवि ने इसीलिये कहा है की 'घट घट में नाथ समाये'

जो बहार है वो अंदर भी है, हमारे तन, मन, अंतर में वो ही रास ले रहा है, वो ही बंसरी बजा रहा है । जैसे वृंदावन बहार है, उसी तरह हमारे अंदर भी है । वहाँ पर भी प्रभु की लीला अनवरत रूप से चल रही है, उनकी शक्ति वहाँ भी कार्यान्वित है । जीवनरूपी यात्रा की फलश्रुति हमारे अंदर तथा बाहर प्रभु के दर्शन करनेमें है । तीर्थयात्रा हमें यह संदेश प्रदान करती है ।

वृंदावन में हमने जो दृश्य देखा वह अभी भी मानसपट पर अंकित है । किसी महंत का शरीर शांत होने पर संकीर्तन के साथ स्मशान लिया जा रहा था । महंत की मुखाकृति आकर्षक व तेजस्वी थी । उनके मुख पर गहरी शांति छायी हुई थी । उनको देखकर मुझे स्मरण हुआ की आखिरकार सबको इसी तरह संसार से जाना पडेगा । मगर जाते-जाते अगर हमारे मुख पर शांति और स्मित रहें तो हमारा जीवन सार्थक कहा जायेगा ।

मथुरा से हम बडौदा के लिये चल पडे । तकरीबन पोने दो साल पूर्व मैंने बडौदा छोडा था । आज फिर मैं वहाँ माताजी के साथ आ पहूँचा । हमने माताजी के भाई रमणभाई के घर पर विश्राम किया । बडौदा में डाक्टर वेणीभाई के पास सारवार कराने से कुछ ही दिनों में माताजी को पूर्ण स्वास्थ्य की प्राप्ति हुई ।

 

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