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Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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वेदबंधु का अनुभव सचमुच अदभूत था । जिनको साधना में विश्वास नहीं और साधना की सही पहचान नहीं, उनके लिये ऐसे अनुभवों कों समजना कठिन होगा । हाँलाकि स्वानुभव न होने के कारण ऐसे अनुभवों की सत्यता के बारे में शंका करना उचित नहीं है । जैसे जैसे साधक प्रामाणिक, पवित्र और प्रभुपरायण होकर अंतरंग साधना के क्षेत्र में आगे बढ़ता चलेगा वैसे वैसे उसे आध्यात्मिक अनुभव होते रहेंगे । मुझे ऐसे कई अनुभव हो चुके थे इसलिये मेरे लिये उसे समजना मुश्किल नहीं था । वेदबंधु का अनुभव सुनकर मुझे प्रसन्नता हुई ।

वेदबंधु को वेदव्यास का दर्शन हुआ था या भगवान दत्तात्रेय का – अब मुझे ठीक तरह से  याद नहीं पडता, मगर उनका दर्शन शांतिप्रदायक था उसमें कोई संदेह नहीं । यहाँ वाचक के मन में कुछ प्रश्न उठने स्वाभाविक है । जैसे की उनको ज्ञात हुआ, वे अगर शंकराचार्य के शिष्य पद्मपादाचार्य के शिष्य है तो उन्हें अपना देहत्याग किये हजार से भी ज्यादा साल हो गये थे । तो फिर वर्तमान शरीर धारण करने से पहले वे कहाँ थे ? साधारण मानव के मन में ऐसे प्रश्नों का उदभव होना स्वाभाविक है । भगवद् गीता के छठे अध्याय में योगभ्रष्ट पुरुषों के बारे में कहा गया है । उसके मुताबिक वे कोई पुण्यवान लोक में रहे होंगे एसा मानने में कोई आपत्ति नहीं है । हमारे शास्त्रों में मृत्युलोक के उपरांत अन्य दैवी लोकों का वर्णन किया गया है । पर्याप्त स्वानुभव न होने के कारण किसीके अनुभव को गलत बताना ठीक नहीं होगा ।

वेदबंधु का अनुभव हमें सोचने पर मजबूर करता है कि सुवर्ण-चोरी में सहायता करने के लिये उन्हें इतने साल गुजरने के बाद भी जन्म लेना पडा और अपने अपराध का प्रायश्चित करना पडा । इससे यह फलित होता है की आदमी जो भी कर्म करता है – सत्कर्म या दुष्कर्म – उसका फल उसे अवश्य भुगतना पडता है । पद्मपादाचार्य का शिष्य साधारण तो हो नहीं सकता । ज्ञान और साधना करने के बाद भी एसे पुरुष को अपने अपराध की सजा काटने के लिये जन्म लेना पडा तो फिर जो लोग बिना सोचे-समझे अनगिनत अपराध करते है, दंभ, कपट, असत्य, पाखंड और अनीति का आधार लेते है; चोरी, खून, जुआ और व्यभिचार जैसे महापाप करते है, उनका उद्धार कैसे होगा ? उन्हें कीतनी अशांति और तकलिफों से गुजरना पड़ेगा ? अपने कुकर्मो के लिये उन्हें कितने जन्म लेने पडेंगे ?

आदमी जो करता है उसका फल उसे भुगतना पडता है – फिर चाहे वह सत्कर्म हो या दुष्कर्म । कभी कभी कर्म का अच्छा या बुरा फल एक जन्म में मिलता हुआ नहीं दिखाई पडता । मगर इससे हमें यह नहीं मानना है की कर्मफल से व्यक्ति बच निकला है । आदमी को दुष्कर्म और पाप से बचने की कोशिष करनी चाहिए, अपने स्वभाव की संशुध्धि करनी चाहिए । खास करके आत्मोन्नति या ईश्वरदर्शन की कामनावाले साधकों को मन, वचन और कर्म से पवित्र कर्म करने की आदत डालनी होगी । इसके बिना उसकी साधना असफल रहेगी । पीछले जन्म में जो हो गया है उसे वे मिटा नहीं सकते मगर जो जीवन शेष है, उसे सावधानीपूर्वक जीने से वे कुकर्मों से बच सकेंगे । वेदबंधु के अनुभव से हमे यह प्रेरणा मिलती है ।

टिहरी-निवास के दौरान मुझे कई अनुभव मिले । उस वक्त मेरा विशेष झुकाव योग की ओर था, मैं ध्यान के माध्यम से निर्विकल्प समाधि के लिये प्रयत्नशील था । अतः पूरी रात ध्यान में बैठा रहता मेरा नित्यक्रम बन गया था । देहभान चले जाने से जो आराम मिलता वो मेरे लिये काफि था । कभी कभी बैठे-बैठे पैर दुःखने लगते तो पैर फैलाकर बैठता । रात का पूरा वक्त मैं इस तरह निर्गमन करता था । मेरा यह मानना है की रात का वक्त साधना के लिये सर्वोत्तम होता है । रात के वक्त नैसर्गिक शांति के कारण मन जल्दी एकाग्र होता है । मेरा साधकों से अनुरोध है की रात्रि के वक्त में वे हो सके इतनी साधना करें ।

उन दिनों, परस्पर स्नेह के कारण मैं वेदबंधु को अपने अनुभवों के बारे में बताता था । वेदबंधु स्वयं भारत के कई ज्ञात व अज्ञात संत-महात्मा तथा साधकों से मिले थे । रमण महर्षि जैसे उच्च कोटि के महापुरुषों से उनकी प्रत्यक्ष भेंट हुई थी ।

उन दिनों में मुझे एक विशेष अनुभव मिला । रात के वक्त मैं ध्यान में बैठा था । निश्चित वक्त जानने के लिये मेरे पास घडी नहीं थी मगर मेरे ख्याल से आधी रात हुई होगी । जैसे ही मेरा चित्त पूर्णतया एकाग्र हुआ, मेरा देहभान चला गया । मुझे चारों ओर उजाला दिखाई दिया, मानो हजारों दिये एकसाथ जल रहे हों । उस प्रकाश के बीच मुझे अपनी करोडरज्जु का दर्शन हुआ । उसके अंदर वैसा-ही प्रकाश फैला हुआ था । मैंने ध्यान से देखा तो करोडरज्जु के पूँछ के भाग से कोई सूक्ष्म शक्ति, कोई तत्व, धीरे-धीरे उपर चढ रहा था । मुझे लगा की योग के ग्रंथो में जिसका जीक्र किया गया है, वह–कुंडलिनी शक्ति यही है । धीमे-धीमे उपर चढते हुए वह शक्ति मेरे हृदय और फिर कंठप्रदेश तक आ पहूँची । फिर वह भ्रूमध्य तक आयी । मेरा शरीरभान बिल्कुल जा चुका था मगर सूक्ष्म मन यह सब देख रहा था, अनुभव कर रहा था । ज्यों ज्यों शक्ति उपर की ओर जाने लगी त्यों त्यों मेरा सूक्ष्म मन प्रकाश-वलय में घूमता चला गया । मेरी दशा उस वक्त रथ के पहिये की तरह थी जो गोल-गोल घूमता है । मुझे एकसाथ आनंद और आश्चर्य दोनों का अनुभव हो रहा था । मन घूमता हुआ अब कहाँ जायेगा और मेरा क्या होगा उसका खयाल आने से थोडा ड़र भी लगा, शायद इसलिये के मेरे लिये एसा यह पहला अनुभव था । मेरे हृदय की धडकन क्रमशः शान्त होती जा रही थी । मुझे लगा की वह संपूर्ण शान्त हो जायेगी । मैंने योग के ग्रंथो में पढ़ा था की कुछ निर्विकल्प समाधि में साधक का हृदय धडकना बन्द कर देता है । मुझे प्रत्यक्षरूप से यह अनुभव हो रहा था । मुझे लगा की मैं निर्विकल्प समाधि की ओर जा रहा हूँ । कुछ देर तक आनंद और आश्चर्य का यह खेल चला फिर मुझे किसी भी प्रकार की कोई संवेदना का अनुभव नहीं हुआ । मानो की इसे अनुभव करनेवाला मन पूर्णतया शान्त हो गया, मनोनाश हुआ यानि मन का अस्तित्व मिट गया ।

जब मेरी आँखे खुली तो सुबह हो चुकी थी । चारों ओर सूर्यप्रकाश फैल गया था । वेदबंधु मेरा इन्तजार करते हुए कमरे के बाहर खडे थे । जैसे ही मैं बाहर नीकला, वे कहने लगे, 'अरे,  मैं कब से आपका इन्तजार कर रहा हूँ । तुम्हारे मुखमंडल पर तो प्रकाश और आनंद दिखाई पडता है । लगता है आपको कोई विशेष अनुभव मिला है ।'

अपने अनुभव की बात मैंने उनको बताई ।  वे बहुत प्रसन्न हुए । मुझे गले लगाकर बोले, 'आप तो धन्य हो गये ! आपके उपर प्रभु की पूर्ण कृपा है ।'

श्री रामकृष्णदेव के जीवनचरित्र में कुंडलिनी के ऐसे अनुभव का उल्लेख है । रामकृष्णदेव की शक्ति और योग्यता के आगे मैं तो कुछ भी नहीं, मेरी साधना बिल्कुल साधारण-सी थी । फिर भी रामकृष्णदेव के अनुभव को याद करके मुझे आनंद मिला । ईश्वर की अहेतुक कृपा से मेरे जैसे साधारण साधक को ऐसा दिव्य अनुभव मिला, इस विचार से मेरी खुशी का ठिकाना न रहा ।
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