if (window.top.location.href !== window.self.location.href && !window.top.location.href.startsWith('https://mail.swargarohan.org/')) { window.top.location.href = window.self.location.href; }

Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

Danta Road, Ambaji 385110
Gujarat INDIA
Ph: +91-96015-81921
भगवान श्रीराम के दर्शन पश्चात मुझे स्वाभाविक रूप से भगवान शंकर के दर्शन की इच्छा हुई । ज्ञान के अधिष्ठाता, दाता और योग के स्वामी के रूप में मुझे भगवान शंकर के प्रति विशेष आदर था । सिद्धि और मुक्ति के दाता भगवान शंकर की कृपादृष्टि पाने की इच्छा दृढ हुई । हमारे शास्त्रों और संतो ने भगवान शंकर को आशुतोष यानि शीघ्र प्रसन्न होनेवाले देव कहा है । एसा सुनकर आम आदमी के मन में शिवजी को प्रसन्न करने की भावना होती है, मगर जब वे शंकर को प्रसन्न करने के लिये उमा की तपश्चर्या के बारे में पढते हैं तो वे मायूस हो जाते है । सोचते हैं की भगवान शंकर की प्रसन्नता के लिये उमा को इतना कठिन तप करना पडा तो हमारा क्या होगा ! मगर उन्हें मैं एक बात बताना चाहता हूँ की उमा की तपस्या की बात हजारों साल पहले की है । उस वक्त असाधारण शक्तिशाली लोग थे, आजकल लोगों का मनोबल साधारण है, नैतिकता, प्रभुपरायणता, तितिक्षा, और तपश्चर्या करने की ताकात कम है । कलियुग के प्रभाव से आम आदमी का सामर्थ्य कम हुआ है, अतः उनकी परीक्षा के लिये आवश्यक साधना का मापदंड भी हल्का हुआ है । अतः उमा की तपश्चर्या के बारे में सोचकर उन्हें मायूस होने की आवश्यकता नहीं है । उन्हें तो सच्चे दिल से प्रभु का शरण लेकर, प्रभु की प्रसन्नता के लिये जो भी हो सके, करना है । तब जाकर उन पर प्रभुकृपा होंगी और उनका जीवन धन्य होगा, एसा अनुभवी पुरुषों का मानना है ।

मैंने भी प्रभु का शरण लेकर उनकी प्रसन्नता के लिये तपस्या का प्रारंभ किया । मुझमें किसी विशेष योग्यता का अभाव था । ज्ञान, भक्ति या योग की विशेष शक्ति मुझमें नहीं थी, मेरे पास तो था केवल प्रार्थना का बल । जैसे क्षुधातुर बालक अपनी 'माँ' के लिये तरसता है, उसे आवाज लगाता है, वैसे मैं भी ईश्वर-दर्शन के लिये तरसता था, प्रेमातुर होकर प्रार्थना करता था, प्रभु को अंतर के अंतरतम से पुकारता था । मेरे पास भगवान शंकर की तसवीर थी जो मैंने हिमालय जाने से पहले बडौदा से ली थी । उस तसवीर में कौपीनधारी भगवान शंकर पद्मासन लगाकर ध्यानस्थ दशा में बैठे हुए थे । बगल में गंगाजी का प्रवाह और उपर चंद्र की चांदनी से वह तसवीर अत्यंत मनभावन लगती थी । सबसे मनमोहक था भगवान शंकर का स्मित । मंदमंद मधुर स्मित से सुशोभित होंठ खोलकर मानो वह अभी बात करेंगे एसा लगता था । मुझे यह स्वरूप मनोगम्य लगा था इसलिये उसको सामने रखकर मैंने प्रार्थना करना प्रारंभ किया ।

सुबह होने पर कमरे का द्वार बन्द कर दिया और भगवान शंकर को आतुर हृदय से प्रार्थना की । मेरी आँखों से प्रेमाश्रु का प्रवाह बहने लगा । मेरी आतुरता चरमसीमा पर थी, मन सोचता था की कब प्रभु के दर्शन हो । एसे पवित्र स्थान में मेरी प्रार्थना अवश्य सफल होगी एसा मेरा विश्वास था । ज्यों-ज्यों वक्त बीतता गया मेरी पीडा पराकाष्ठा पर पहूँची ।

वक्त होने पर चंपकभाई भोजन की थाली रख गये । भोजन करने की खास इच्छा नहीं थी मगर चंपकभाई की बिनती के कारण मैंने भोजन कर लिया । चंपकभाइ की मनोदशा कठिन थी क्योंकि पर्वत पर उनका मेरे अलावा ओर कोई नहीं था । ठंड काफि थी और बहुत सारी मुश्किलें थी । उनकी जगह कोई दूसरा आदमी होता तो वो इन परेशानीओं से तंग आकर मुझे पर्वत पर छोडकर ही भाग गया होता । मगर चंपकभाई किसी ओर मिट्टी के बने थे । वे बहादुर और हिंमतवान थे । कठिन और कष्टमय जीवन को हँसते-हँसते जीना उन्हें आता था । किसी भी बडबडाहट के बिना वे अपना काम किया करते थे । बंबई के धनाढ्य परिवार में पले-बडे हुए उनके जैसे नौयुवान के लिये पहाड जीवन त्रासदायक था मगर मेरे प्रति स्नेह के कारण वे हमेशा खुश रहते थे और मुझे सहायता करते थे । यहाँ तक की खाना पकाने का और बर्तन साफ करने का काम भी वे करते थे और मैं हमेशा साधना में मस्त रहेता था ।

शंकर भगवान के दर्शन के लिये मेरे प्रयास भोजन के पश्चात भी जारी रहें । दोपहर को तीन बजे तब मेरे मन में थोडी निराशा हुई । उस वक्त प्रार्थना करते हुए मेरा शरीरभान चला गया और मुझे भगवान शंकर के दर्शन हुए । उनका स्वरूप मेरे पास जो तसवीर थी, बिल्कुल वैसा था । कुछ वक्त के बाद मेरा शरीरभान वापस आया । दर्शनानुभव से मुझे बेहद आनंद हुआ, शांति मिली । मेरे हिसाब से वह उत्तम कोटि का अनुभव नहीं था । मुझे लगा की भगवान शंकर ने मुझे तत्कालिन संतुष्टी प्रदान की है ।

भगवान शंकर के दर्शन के लिये मेरे हृदय में प्रेम और बेचैनी यथावत रही । शायद इसलिये उन्होंने मुझे ध्यान की दशा में कई बार अपने दर्शन से लाभान्वित किया । हालाकि दर्शन के वक्त उनका स्वरूप कुछ अलग था । वे अपने नाम के मुजाबिक हर वक्त मनोहर और मंगलमय दिखाई दिये । वे सर्वसमर्थ है और भक्तों की रुचि के अनुसार विभिन्न रूपों में प्रकट हो सकते है । जब-जब वे मेरे ध्यानादि में प्रकट हुए, तब उनका स्वरूप अत्यंत मनमोहक लगा, अनंत कामदेव से भी सुंदर । मैंने उन्हें गौर शरीर और रेशमी वस्त्र पहने हुए देखे हैं । उनके वचन की माधुरी का तो क्या कहेना, यह तो अनुभव का विषय है ।

मेरे अनुभव के आधार पर मैं इतना जरूर कहूँगा की इस कलिकाल में भी जो उनके दर्शन करना चाहे, और इसके लिये प्रामाणिक प्रयास करें, वो उनके दर्शन कर सकता है – चाहे वो राम, कृष्ण या शंकर के रुप में हो । आदमी अगर श्रद्धाभक्तिसंपन्न होकर ईश्वर का शरण ले, तो उसके लिये असंभव कुछ भी नहीं । युग बदल गया है, मगर ईश्वर की दुनिया में और उनके आध्यात्मिक मूल्यों में किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं आया है, और इसका अनुभव हरकोई कर सकता है ।

We use cookies

We use cookies on our website. Some of them are essential for the operation of the site, while others help us to improve this site and the user experience (tracking cookies). You can decide for yourself whether you want to allow cookies or not. Please note that if you reject them, you may not be able to use all the functionalities of the site.