Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

Danta Road, Ambaji 385110
Gujarat INDIA
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मेरी माला गुम हुई

उन दिनों घटी ओर एक घटना मुझे याद आती है । ऋषिकेश में मैंने जाप करने के लिये माला का प्रयोग शुरू किया था । दशरथाचल पर्वत पर गये कुछ दिने हुए थे की एक अजीब घटना घटी । रात को बिस्तर में मेरे पास माला थी, मगर सुबह होने पर बहुत ढूँढा फिर भी माला नहीं मिली । अब एक रात में माला कहाँ गुम हो गई ये मेरी समज के बाहर था । कमरा बन्द था, अंदर से कमाड बन्द था, इसलिये कोई आदमी या जानवर का अंदर आना नामुमकिन था । पर्वत पर चुहे हो सकते थे मगर हमने अभी तक एक भी चुहा देखा नहीं था । माला के साथ जो चिजें रक्खी हुई थी, सब जैसे-की-तैसी थी, केवल माला ही गायब थी । तो फिर माला गई कहाँ ? चंपकभाई को यह बात सुनकर हैरानी हुई । अंदर-बहार सब जगह ढूँढा मगर माला नहीं मिली । मुझे यह बात कुछ अजीब लगी । मुझे लगा, ईश्वरेच्छा से माला गुम हुई है । यह ईश्वरीय संकेत है की मुझे माला के बिना जप या ध्यान करना चाहिए ।

चंपकभाइ के पास अपनी माला थी मगर मैंने उसका उपयोग नहीं किया । ईश्वरकी ईच्छा को शिरोधार्य मानकर मैंने अपना साधनाकार्य जारी रखा । आश्चर्य की बात है की जिस माला से मुझे बहुत लगाव था, उसकी गैरमोजूदगी मुझे बिलकुल नहीं लगी । इश्वर की इच्छा सदैव मंगलमय होती है, एसा मानकर चलने से हमेशा लाभ होता है ।

भालु से भेंट

दशरथाचल के जंगल में वाघ और भालु भी रहते थे, इसका जीक्र मैंने पूर्व कर दिया है । ईश्वरकृपा से अभी तक हमारी उनसे भेंट नहीं हुई थी । शायद उनको लगा होगा की ये लोग पर्वत पर रहकर आत्मोन्नति की साधना में लगे हुए है, और हमें किसी भी तरह से परेशान नहीं करते, तो फिर हम उनकी साधना में भला क्यूँ बाधा डाले ? मगर कुछ ही दिनों में भालु से हमारी आकस्मिक भेंट हुई ।

उन दिनों हम शाम को जंगल में घूमने जाते थे । मैंने हररोज की तरह केवल लंगोटी पहनी थी और हाथ में डंडा था । चंपकभाई ने कोट-पतलून पहेने थे । पगदंडी के रास्ते चलते-चलते हम थोडे दूर निकल गये । मैं आगे था और चंपकभाई पीछे । तब चंपकभाइ ने मुझे सुचित किया की एक भालु सामने से आ रहा है । मैंने देखा तो सचमुच भालु हमारी ओर आ रहा था मगर मैं चलता ही रहा । चंपकभाइ को आगे जाने में खतरा लगा फिर भी मैंने उनको ईश्वर पर भरोंसा रखते हुए मेरे पीछे-पीछे आनेको कहा । वे हिंमतवान और साहसी प्रकृति के थे, मगर हालात एसे थे की अच्छे-अच्छों की हिंमत छूट जाय । पगदंडी का छोटा-सा रास्ता और उसके दोनों और फैली गहरी खाई । कहीं जाना चाहे तो भी जानेकी गूँजाईश नही थी । भालु हमारी तरह आ रहा था और चलते-चलते काफि करीब आ गया । जब भालु तकरीबन पंद्रह फिट की दूरी पर रहा होगा, मैं रुक गया और पत्थर पर जोर से डंडा पिटकर ॐकार का उच्चार किया । अचानक हुए ॐकार से धबराकर भालु कुदता हुआ खाई में नीचे चला गया । हम उसे भागता हुए देखते रहे । भालु से हुई रक्षा से चंपकभाई बहुत प्रसन्न हुए । अंधरा होने पर हम वापिस लौट आयें । ईश्वर ने हमारी परीक्षा के साथ हमारी रक्षा भी की ।

पर्वत के निवासी वाघ से ज्यादा भालु से डरते है । हफ्ते में एक बार हमारे लिये आवश्यक सामग्री लेकर जो लडका आता था वो झरने से हमारे लिये पानी ले आता । जब वो पानी भरने जाता, तो जंगली पशुओं को भगाने के लिये टीन के डिब्बे को बजाते-बजाते जाता था । हम पर्वत पर अकेले रहते थे इससे उसको बहुत आश्चर्य होता था । हम उसे कहते की, 'एकांत में रहनेवाले को डरने की क्या जरूरत है ? इश्वर हमारी सदैव रक्षा करता है । इसलिये भय का त्याग करके उसका सुमिरन करो ।' पता नहीं उसको हमारी बात ठीक तरह से समज में आती थी या नहीं, मगर वो हमें अपने साहस के लिये धन्यवाद देता था, और कोई बडा साहस कर रहें हो एसी नजरों से हमे देखता था । हमारा दशरथाचल निवास सचमुच लोगों के लिये आश्चर्यजनक था ।